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ये नेत्रहीन महिला बनी आईएएस, रचा इस बहन ने इतिहास

नेत्रहीन होना कभी भी मेरे लिए समझौते की वजह नहीं बन सका. बगैर आंखों के मैंने ख्वाब देखे और उन्हें पूरा किया.

 शिव कुमार मिश्र |  2018-06-08 06:12:51.0  |  दिल्ली

ये नेत्रहीन महिला बनी आईएएस, रचा इस बहन ने इतिहास

प्रांजल पाटिल ने इन्हीं इरादों के साथ मुंबई से केरल का सफर तय किया और एक नेत्रहीन लड़की से देश की पहली महिला आईएएस अफसर तक का. 30 साल की प्रांजल ने हफ्ताभर पहले केरल के एर्नाकुलम में बतौर असिस्टेंट कलेक्टर जॉइन किया है. तब से लगातार अलग-अलग विभागों के अफसरों से मुलाकात कर रही प्रांजल के सामने अब चुनौती है, काम में खरा उतरने की. लेकिन ये कोई पहली बार नहीं.

छह साल की थी जब एक हादसे में आंखों की रौशनी चली गई. जिस बच्चे ने मां का चेहरा, घर, बाग-बगीचे देखे हों, जो सब्जी को उसकी खुशबू के अलावा उसकी रंगत से भी जानता हो, उसके लिए एकाएक सब एक रंग का हो गया- अंधेरा रंग. नॉर्मल स्कूल छूटा. दोस्त छूटे. भाषा छूटी. नेत्रहीन बच्चों का ये स्कूल मराठी मीडियम था. मैं घबराई तो लेकिन फिर नए सिरे से सीखे हुए भूलना और तब नया सीखना शुरू किया.
12वीं में आर्ट में टॉप करने के बाद प्रांजल ने घर से दूर एक नामी कॉलेज में एडमिशन लिया. रोज आया-जाया करती. ये पढ़ाई से भी मुश्किल काम था, प्रांजल याद करती हैं. मुंबई में सुबह लोगों का रेला निकलता और शाम को लौटता है. कई बार दिक्कत होने पर अनजान हाथों ने मदद की. कभी-कभी कोई पूछ लेता कि इतनी दूर जाकर पढ़ने की क्या जरूरत! समझाइश के पीछे ये भाव रहता कि जो भी हो आखिर हो तो नेत्रहीन. मैंने इतने सालों में संवेदना के नाम पर इतने सवाल झेले कि फिर फर्क पड़ना बंद हो गया.
पढ़ाई के सिलसिले में दिल्ली आई और तभी से आईएएस बनने का सपना पलने लगा. 2015 में मैं एमफिल कर रही थी और साथ में यूपीएससी की तैयारी कर रही थी. इतने बड़े इम्तिहान के लिए लोग ब्रेक लेकर तैयारी करते हैं. मेरे पास वो गुंजाइश नहीं थी. मैंने कोचिंग भी नहीं ली. कोचिंग जाना एक अतिरिक्त दबाव बनाता. जाने-आने के बचे वक्त में मैं तैयारी करती. मॉक टेस्ट देती. खुद को जांचती. मेरे पास क्योंकि कोई प्रतिस्पर्धा नहीं थी इसलिए तैयारी और मुश्किल थी. हालांकि इससे इरादे में कोई फर्क नहीं आया.




पढ़ाई और तैयारी साथ कर रही थी. एक सॉफ्टवेयर लिया. ये एक ऐसा स्क्रीन रीडर प्रोग्राम है जो नेत्रहीनों को पढ़ने में मदद के लिए बनाया गया है. प्रांजल यूनिवर्सिटी से किताबें लेती., उन्हें स्कैन करतीं और फिर कंप्यूटर उन्हें पढ़कर सुनाता. 'लंबी प्रक्रिया थी. कई बार ऊब जाती. कभी झुंझला जाती. लेकिन फिर जुट जाती. दुनिया देखने का अब यही एकमात्र जरिया रह गया था', वे याद करती हैं.
एक और चुनौती थी परीक्षा में राइटर चुनने की. जो लिख नहीं सकते, उन्हें 3 घंटे के एग्जाम में 1 अतिरिक्त घंटा मिलता है. लेकिन इतने समय में भी पूरे जवाब लिखना आसान नहीं था. ऐसे साथी की तलाश शुरू की जो मेरे कहे को उतनी ही तेजी से लिख सके. जल्द ही ये कोशिश भी कामयाब रही. हालांकि इसे बाद एक नाकामयाबी मेरा इंतजार कर रही थी. 2016 में पहली ही कोशिश में यूपीएससी में 773 रैंक आए. मैं इंडियन रेलवे अकाउंट सर्विस के लिए चुनी गई थी लेकिन पूरी तरह से नेत्रहीन होने की वजह से मुझे रिजेक्ट कर दिया गया. मैंने दोबारा कोशिश की. अगले ही साल यानी 2017 में मेरी रैंक 124 रही.
मसूरी में लंबी ट्रेनिंग के बाद प्रांजल को बतौर असिस्टेंट कलेक्टर केरल के एर्नाकुलम में पोस्टिंग मिली. सप्ताहभर पहले जॉइन कर चुकी प्रांजल फिलहाल नए काम को समझने में व्यस्त हैं. कहती हैं, 'सीखे हुए को भूलकर दोबारा सीखने में जितनी मेहनत लगी, कोई भी काम उससे मुश्किल नहीं.'

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शिव कुमार मिश्र

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