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नरेन्द्र मोदी के समर्थकों से आहत हुए वरिष्ठ पत्रकार अवधेश कुमार

 शिव कुमार मिश्र |  2018-06-02 21:30:19.0  |  दिल्ली

नरेन्द्र मोदी के समर्थकों से आहत हुए वरिष्ठ पत्रकार अवधेश कुमार

अवधेश कुमार

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के सोशल मीडिया पर व्याप्त समर्थकों में ऐसे लोगों की भरमार है जो बिना गहराई से सोचे-विचारे कभी किसी के बारे में कुछ भी लिख सकते हैं। आप आम के अंचार की बात करिए तो वे पूछेंगे कि क्यों आपने इमली की बात क्यों नहीं की? कोई बात आप संकेत में कहिए तो ये उसे समझने के लिए तैयार नहीं। कई बार समझाकर कहिए कि ऐसा व्यवहार न करिए तो आप पर ही हमला करने लगेंगे। कई बार इनकी प्रतिक्रिया ऐसी होती है कि स्थिरचित्त व्यक्ति भी तिलमिला जाए और कुछ गुस्सैल प्रतिक्रिया दे दे। ये हमारी पूरी सहनशीलता की परीक्षा ले लेते हैं।

अभी मैंने किसी व्यक्ति के बारे में हमारे एक मित्र के ट्विट पर टिप्पणी की कि वो न तो किसी पार्टी में है, न समाज के लिए कुछ करता है, न किसी आंदोलन से जुड़ा हुआ है लेकिन टीवी चैनल उसको बुलाते हैं। क्यों? उन मित्र को तो जो जवाब देना था उन्हांेने दिया। लेकिन मोदी जी के समर्थक लोग मेरे उपर बरस गए, क्योंकि वो व्यक्ति आजकल भाजपा और सरकार का समर्थन कर रहे हैं। इनमें से ज्यादातर लोग जानते भी नहीं होंगे कि वो सज्जन वास्तव में हैं क्या? एक मित्र ने तो ट्वीट्टर से मेरे प्रोफाइल को स्कैन कर यह लिखा कि आप न तो वर्सेटाइल हो न एक्टिविस्ट हो और न फ्री माइंड थिंकर हो, आप झूठ का आडम्बर फैला रहे हो। मेरे पूरे व्यक्तित्व को ही पांखडी बता दिया। जैसे वे मुझे बचपन से आज तक के जीवन और कार्यों को जानते हों। मैं वैसे तो कम ही लोगों की प्रोफाइल देखता हूं, उनका देखा तो लिखा था मोदी समर्थक। फिर मैंने कोई जवाब देना मुनासिब नहीं समझा।

भाई लोगों से मैं ये कहना चाहता हूं कि कोई आपका समर्थन कर रहा है इसका यह मतलब नहीं कि वह आपका समर्थक ही है। सरकार होेने, बड़ा संगठन होने के कारण अनेक निहित स्वार्थी तत्व, दलाल, विकृत महत्वाकांक्षी समर्थन में आ जाते हैं। उनकी बोलने की शैली प्रभावित करने वाली होती है। उनको अपना स्वार्थ साधना है। ऐसे ही लोग तो ईमानदार, निष्ठावान कार्यकर्ताओं और समर्थकों को पीछे धकेले जाने का कारण होते हैं। नेताओं के निकट पहुंचकर तर्कों के साथ गलत सुझाव देकर निर्णय करवाते हैं। मैं जहां बैठा हूं ऐसे लोगों को जानता हूं जिनका अपना कोई जमीर नही, कोई चरित्र नहीं। आज आपके साथ हैं... कल कांग्रेस के साथ थे, उसके पहले किसी और के साथ थे और आगे किसी और के हो सकते हैं। कुछ ऐसे लोग हैं जिनको भाजपा चुनाव आदि में काफी काम देती है और उनको इतनी मोटी आमदनी हो जाती है जिसकी कल्पना उनने जीवन में नहीं की। वो भी भाजपा और संघ के पक्ष में पूरा आक्रामक होकर ऐसे बोलते हैं जैसे कोई भाजपाई और संघी भी नहीं बोलते और टीवी चैनल के माध्यम से अपना बाजार बनाए रखते हैं।

मैं किसी व्यक्ति पर पोस्ट सामान्यतः नहीं लिखता। लेकिन रवीश कुमार का मामला ऐसा हो गया था कि मैंने एक ट्वीट काफी सोच-समझकर किया कि गाली देना, जान से मारने की धमकी देना गलत है, विचार का विरोध विचार से करिए। ऐसा लगा कि मैं सबसे बड़ा खलनायक हो गया हूं। ताबड़तोड़ गोलियों की तरह हमला होने लगा। कोई सीधे गोली मारने की बात कर रहा है तो कोई कुछ। हालांकि सोशल मीडिया के इन शब्दवीरों में शायद ही किसी ने अपने हाथों में कभी पिस्तौल, बंदूक या तलवार, छूंड़ा आदि लिया हो। इन्होंने ऐसे कितने लोगों को पीटा है इसकी भी छानबीन की जाए तो नतीजा शून्य ही आएगा। किंतु ऐसा लग रहा था सब हत्या करने या मार पिटाई करने के विशेषज्ञ या अभ्यस्त हैं। इन्हीं में से एक सज्जन थे जिन्होंने पहले मारने की धमकी दी और जब लगा कि उनके खिलाफ पुलिस कार्रवाई हो जाएगी तो वीडियो जारी कर माफी मांग रहे थे। एनडीटीवी से चला रहा था। बता रहा था कि इतना डरपोक चरित्र वाले लोग हैं इन संगठनों में। ऐसा काम ही क्यों करना कि कल पुलिस आपको ढूंढने लगे और आपके पास बचाव का कोई रास्ता नहीं हो। आप गिड़गिड़ाने लगें। यह भी जान लीजिए उस समय आपको बचाने आपका संगठन भी नहीं आने वाला। फिर ऐसा करने से आप खलनायक बन जाते हो और रवीश कुमार को सहानुभूति मिल जाती है। मैंने सोचा है कि रवीश कुमार पर अलग से एक पोस्ट कभी लिखूंगा। हालांकि वो अपना विचार रखें उसमें मुझे कोई आपत्ति नहीं है। उसका जवाब विचार से दिया जाएगा। यहां इतना ही कहना चाहंूगा कि रवीश कुमार बहुत ही चालाक किस्म के व्यक्ति हैं। आप जो गालियां या धमकियां दे रहे हो वह उनके पक्ष में जाता है। वो अपने को पीड़ित बनाकर ही नहीं पेश कर रहे, यह भी स्थापित कर रहे कि मोदी समर्थकों तथा संघ परिवार में लंपटों,गुण्डो की भरमार है और उनने डटकर इनके खिलाफ झंडा उठाया है इसलिए वे सब इनके पीछे पड़े है। वो इसे भुना रहे हैं। यह आप सबकी नासमझी के कारण। सभ्य भाषाा में आप उनकी बातों को तथ्यों और तर्कों से काटेंगे तो उनके पास ऐसा करने का अवसर ही नहीं रहेगा। मैंने यही समझाने की कोशिश की तो मित्र लोगांें ने मेरी बखिया उधेड़ दी। मेरे पास चुपचाप सब सहने करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था।

एक पोस्ट मैंने डाला आजकल किसी पार्टी के प्रवक्ता चैनल पर नहीं आते तो राजनीतिक विश्लेषक के नाम से उसके ऐसे लोगों को बिठा दिया जाता है जिनकी विश्वसनीयता संदिग्ध है। वे उस पार्टी का पक्ष लेते हैं और कहलाते राजनीतिक विश्लेषक हैं। मैंने इसका विरोध किया है तथा सुझाव दिया है कि चैनल उस पार्टी से बातकर गलतफहमी दूर करें तथा वहां से मान्य प्रवक्ताओं को बुलाएं। राजनीतिक विश्लेषक की गरिमा को न गिराए। जरा उस पर प्रतिक्रिया देख लीजिए। एक मित्र ने पत्रकारों की एक पूरी सूची डाल दी और उनके नाम के साथ लिख दिया कि वो किस पार्टी का समर्थन करते हैं। मैंने इस पर पोस्ट लिखा ही नहीं था। उनमें से कई हमारे मित्र हैं। वो मेरे वाल पर अपना नाम पढ़ेंगे तो यही समझेंगे कि मैं जानबूझकर लिखवा रहा हूं। इतने लोगों से संबंध खराब और नई दुश्मनी। जबकि कोई पत्रकार किसी पार्टी का विरोध या समर्थन करता है इससे मुझे कोई समस्या नहीं। यह उसका अधिकार है। मोदी जी के समर्थक लोग उनकी बातों का तार्किक जवाब देने की जगह गाली-गलौज इस्तेमाल करते हैं। एक चैनल पर मैं नियमित जाता था। मेरे ही वाल पर वहां के लोगों के बारे मंें तो कभी उस चैनल के बारे इतना अनाप-शनाप लगातार लिखा गया कि वहां के मेरे विरोधियों ने एकजुट होकर मेरे खिलाफ माहौल बनाया और मेरा वहां जाना बंद हो गया। ऐसे लोगों को क्या कहें?
आज ही एक ट्वीट मैंने आधार को रेल आरक्षण के लिए अनिवार्य करने की खबर पर किया। वह फेसबुक पर भी है। उसमें एक सज्जन ने पहले लिखा कि अब अवधेश जी को भी अमेरिकी डॉलर का लालच मिल गया है इसलिए ऐसा लिख रहे हैं। मिनट में मेरा चरित्र इतना गिर गया कि मैं बिकाउ हो गया। मुझे आज तक ऐसा कोई व्यक्ति नहीं मिला जिसे फेसबुक पर मोदी के विरोध या पक्ष में लिखने पर कहीं से कोई धन मिला हो या धन मिलने का ऑफर भी आया हो। लेकिन भाई लोगों के पास विशेष सूचना तंत्र हैं जहां से उनको विशेष जानकारियां मिलतीं रहतीं हैं! कुछ समय बाद उस पोस्ट पर लिखा गया कि यहां जेएनयू वाले ही भरे-पड़े हैं। मित्र, अगर सरकार का कोई निर्णय जनता को परेशान करने वाली है, गलत है तो उसका विरोध करना ही चाहिए। अगर नहीं करोगे तो सरकार तक सच्ची बात नहीं पहुंचेगी उसमें बदलाव नहीं होगा तो फिर चुनाव में उसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा।

कुछ लोग जिन्ना और गांधी की तुलना कर रहे थे विभाजन के संदर्भ में। मैंने इतिहास की जानकारी के अनुसार एक छोटा पोस्ट लिखा यह बताने के लिए जिन्ना एक खलनायक था उससे गांधी जी की तुलना गलत है। जिन्ना विभाजन चाहता था और गांधी उसके पक्ष में नहीं थे। यह मैंने काफी सोच-समझकर लिखा था। समझिए कि मेरा जीना मुहाल कर दिया गया। इतिहास के ऐसे-ऐसे महान ज्ञाता वाल पर आ गए और ऐसे-ऐसे तथ्य देने लगे जो मैंने इतिहास में कभी पढ़ा ही नहीं। फिर गांधी जी के समम्पूर्ण जीवन की बात करने लगे। वह पोस्ट केवल विभाजन के संदर्भ मंें था और बिल्कुल सच था। उसमें पटेल के साथ गांधी जी ने क्या किया, पहले क्या किया इसकी न चर्चा थी और न उसकी जरुरत थी। गांधी हत्या को लेकर संघ को बदनाम करने का जितना दुष्प्रचार हुआ है उसे मित्रगण सही साबित कर रहे थे। वे गोडसे द्वारा हत्या का समर्थन कर रहे थे। यही तो विरोधी आरोप लगाते हैं जो झूठ है और संघ आज तक इससे जूझ रहा है। आपने जो लिखा उसे मान लिया जाए तो विरोधियों का आरोप सही साबित हो जाता है। इनको नहीं पता कि गांधी हत्या के बाद संघ के कार्यकर्ताओं की क्या हालत थी। पूरे देश मंें उनका कहीं बाहर निकलना संभव नहीं था। आम लोगों ने जगह-जगह उन पर हमले किए। संघ का पूरा काम ठप्प हो गया। दुनिया भर में संघ बदनाम हो गया। संघ के पास उस समय ऐसी शक्ति नहीं थी कि मुकाबला कर सके। हजारों लोगों ने भय से संघ को छोड़ दिया। कोई प्रचारक जो जेल जाने से बच गया वह अगर किसी पहचान के स्वयंसेवक के घर जाता तो उसे लोग अपने यहां रहने नहीं देते थे। ऐसे संकट का काल था। बना-बनाया पूरा कारवां बिखर गया। संघ से प्रतिबंध हटने के बाद उसे नए सिरे अपना काम आरंभ करना पड़ा। संघ की पूरी कोशिश रही है कि इस झूठ और बदनामी से उसे मुक्ति मिले। गोडसे से उसका कोई संबंध नहीं था। और आप गोडसे को जैसे हत्यारे को महान बनाने पर तुल जाते हो। उनके समर्थकों द्वारा पुस्तकों के माध्यम से फैलाए गए गलत तथ्यों को सही मानकर उसे प्रस्तुत करते हों।

अगर गांधी जी आपकी नजर में इतने ही खराब थे तो आपके प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उनकी बार-बार माला क्यांें जपते हैं? मैंने तो इसके पूर्व किसी प्रधानमंत्री को गांधी जी का इतनी बार नाम लेते नहीं सुना। उनके नाम पर स्वच्छता अभियान आरंभ हुआ। उनकी 150 वीं जयंती मनाने के लिए प्रधानमंत्री ने खुद बैठक की अध्यक्षता की। करोड़ों रुपए के फंड आपकी सरकार दे रही है। हालांकि उसमें भी शामिल होने वालों में फिर पाखंडियों की संख्या ज्यादा है जो स्वयं को गांधीवादी बताते हैं। गांधी आपकी नजर में इतने बुरे थे तो संघ ने अपने प्रातः स्मरण तथा एकात्मता स्तोत्र में उनका नाम क्यों शामिल किया है? जरा प्रधानमंत्री और संघ के अधिकारियों से इस पर पूछिए।
आप लोगों का व्यवहार किसी भी सभ्य और संतुलित व्यक्ति को विचलित कर देता है। कुछ कुंठित नासमझ विरोधी भी हैं जो मुझे बिना जाने कुछ भी टिप्पणी कर देते हैं। मैंने लंबे समय तक फेसबुक पर लिखना बंद किया था उसके कई कारणों में से यह भी एक था। लेकिन मैं रवीश कुमार नहीं कि अपने को पीड़ित साबित कर इसे भुनाउं। हालांकि मोदी समर्थकों में ऐसे अनेक लोग हैं जो सभ्य भाषा में अपनी बात रखते हैं। मैं श्योदानसिंह लोधीजी का पोस्ट पढ़ता हूं। मेरे वाल पर उनकी प्रतिक्रिया देखता हूं। जिससे वे सहमत नहीं होते प्रतिक्रिया नहीं देते। मीरा सिंह जी की पोस्ट और उनकी प्रतिक्रियाएं पढ़ता हूं। आकाश चौधरी हैं। अच्छा लिखते हैं। प्रतिक्रिया देते हैं वो सही हो या गलत लेकिन कभी असभ्य भाषा का प्रयोग नहीं करते। ऐसे अनेक नाम हैे जिनसे कोई परेशानी नहीं।

मेरे से ही नहीं किसी से भी आपको असहमत होने का अधिकार है। आप उसे सभ्य भाषा में आराम से लिख सकते हैंं। सभ्य भाषा में अपने शब्दों से आप किसी का पसीना छुड़ा सकते हैं। किंतु किसी को मिनट में दलाल, भडुंआ, दल्ला, कमीना आदि लिखना उसकी मां और पिता को गाली देना ....इससे उनका पक्ष ही मजबूत होता है और आपका कमजोर।

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