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शहीद दिवस पर भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को देश कर रहा याद, इसलिए याद किया जाना चाहिए 23 मार्च

तीनों क्रांतिकारियों की इस शहादत को आज पूरा देश याद कर रहा है।

 Arun Mishra |  2018-03-23 05:08:41.0  |  दिल्ली

शहीद दिवस पर भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को देश कर रहा याद, इसलिए याद किया जाना चाहिए 23 मार्च

नई दिल्ली : 23 मार्च, 1931 को अंग्रेजी हुकूमत ने भारत के तीन सपूतों- भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी पर लटका दिया था। शहीद दिवस के रूप में जाना जाने वाला यह दिन यूं तो भारतीय इतिहास के लिए काला दिन माना जाता है, पर स्वतंत्रता की लड़ाई में खुद को देश की वेदी पर चढ़ाने वाले यह नायक हमारे आदर्श हैं। इन तीनों वीरों की शहादत को श्रद्धांजलि देने के लिए ही शहीद दिवस मनाया जाता है।

तीनों क्रांतिकारियों की इस शहादत को आज पूरा देश याद कर रहा है। लोग सोशल मीडिया पर इन क्रांतिकारियों से जुड़े किस्‍से, इनके बयानों को शेयर कर रहे हैं।
भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को जिस लाहौर षड़यंत्र केस में फांसी की सजा हुई थी, उसके अनुसार उन्हें 24 मार्च 1931 को फांसी दी जानी थी। शायद भगत सिंह व उनके क्रांतिकारी साथियों का डर ही था कि अंग्रेजी सरकार ने उन्हें 11 घंटे पहले 23 मार्च 1931 को शाम करीब साढ़े सात बजे ही फांसी पर लटका दिया। रिपोर्ट के अनुसार जिस समय इन तीनों क्रांतिकारियों को फांसी दी गई उस वक्त वहां कोई मजिस्ट्रेट नहीं था, जबकि कानूनन उन्हें मौजूद रहना चाहिए। बताया जाता है कि फांसी देने के बाद जेल के अधिकारी जेल की पिछली दीवार का हिस्सा तोड़कर उनके पार्थिव शरीरों को बाहर ले गए और गंदा सिंह वाला गांव के पास अंधरे में उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया। इसके बाद इन तीनों की अस्थियों को सतलुज नदी में बहा दिया गया।
भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 को हुआ था। यह कोई सामान्य दिन नहीं था, बल्कि इसे भारतीय इतिहास में गौरवमयी दिन के रूप में जाना जाता है। अविभाजित भारत की जमीं पर एक ऐसे शख्स का जन्म हुआ जो शायद इतिहास लिखने के लिए ही पैदा हुआ था। जिला लायलपुर (अब पाकिस्तान में) के गांव बावली में क्रांतिकारी भगत सिंह का जन्म एक सामान्य परिवार में हुआ था। भगत सिंह को जब ये समझ में आने लगा कि उनकी आजादी घर की चारदीवारी तक ही सीमित है तो उन्हें दुख हुआ। वो बार-बार कहा करते थे कि अंग्रजों से आजादी पाने के लिए हमें याचना की जगह रण करना होगा।
1923 में भगत सिंह ने लाहौर के नेशनल कॉलेज में दाखिला लिया। कॉलेज के दिनों में उन्होंने कई नाटकों राणा प्रताप, सम्राट चंद्रगुप्त और भारत दुर्दशा में हिस्सा लिया था। वह लोगों में राष्ट्रभक्ति की भावना जगाने के लिए नाटकों का मंचन करते थे। भगत सिंह रूस की बोल्शेविक क्रांति के प्रणेता लेनिन के विचारों से काफी प्रभावित थे। भगत सिंह महान क्रांतिकारी होने के साथ विचारक भी थे। उन्होंने लाहौर की सेंट्रल जेल में ही अपना बहुचर्चित निबंध 'मैं नास्तिक क्यों हूं' लिखा था। इस निबंध में उन्होंने ईश्वर की उपस्थिति, समाज में फैली असमानता, गरीबी और शोषण के मुद्दे पर तीखे सवाल उठाए थे।

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