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#YogaDay: अंदर के द्वार टूटने के दर्द ने बार-बार बेहोश किया!

The pain of breaking the inside door repeatedly fainted

 शिव कुमार मिश्र |  2017-06-18 13:03:44.0  |  दिल्ली

#YogaDay:  अंदर के द्वार टूटने के दर्द ने बार-बार बेहोश किया!

मैंने तीन योगियों पर पुस्तक लिखी है-बाबा रामदेव, आशुतोष महाराज और आदित्यनाथ योगी। तीनों किताब के मूल में तो पतंजलि का योग सूत्र ही है, लेकिन तीनों में योग के अलग-अलग चरण का उल्लेख और अनुभव है।

मैं 1998 से ध्यानस्थ जीवन जी रहा हूं। मैं जानता हूं कि मैं कहां तक पहुंचा हूं और कहां से लौट आता हूं। इसलिए इन किताबों के लेखन से पहले मैंने इसे अनुभव में जीया और फिर लौट कर उस नि:शब्द को शब्द देने की कोशिश की है! पहली पुस्तक सरल थी, दूसरी थोड़ी कठिन, तीसरी, और अधिक कठिन।

गोरखनाथ के प्रयोगों में जब मैं उतरा तो नया ही धरातल मिला। आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं हुई, क्योंकि अंदर के द्वार टूटने के दर्द ने बार-बार बेहोश किया!

मेरी पत्नी जानती है कि मैं अकसर एक दर्द से छटपटा उठता हूं और घंटों सुन्न पड़ जाता हूं, लेकिन मैं उसे नहीं बताता कि वह दर्द कहां और कैसा है? फिर वो नहीं पूछती। यह उर्ध्वगमन है!
परिवार की जिम्मेदारी नहीं होती तो मैं इससे आगे छलांग लगा देता, लेकिन बार-बार उस स्वाद तक पहुंच कर मैं लौट आता हूं! गोरखनाथ सही कहते हैं कि पिंड ही ब्रह्मांड है! इस शरीर में ही वह महासुख है। कहीं जाने की जरूरत नहीं!

यह सब योगा नाम से जो चल रहा है, सच मानिये वह सब एक कसरत है, इससे ज्यादा नहीं। यह भी जरूरी है। मैंने बाबा रामदेव से पूछा था, बाबा आप आखिरी चरण में पहुंचे हैं? उन्होंने ईमानदारी से कहा नहीं। मेरी किताब में इस बातचीत का जिक्र है।

मुझे लगता है कि आधुनिक काल में आखिरी चरण में शायद ही कोई पहुंचता होगा। लेकिन कोशिश कीजिए तो वह अलख अपनी स्वाद तो प्रारंभ में ही करा देता है। हां बिना गुरू के कुछ मत कीजिए, क्योंकि 'बिनु गुरू मिले न ज्ञान।' और यह तो महाज्ञान है!

संदीप देव वरिष्ठ पत्रकार की वाल से

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शिव कुमार मिश्र

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