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होली विशेष : VIDEO में जानिए- कैसे करें आमलकी एकादशी की पूजा और क्या हैं इसके लाभ

 Arun Mishra |  2017-03-09 14:55:04.0  |  New Delhi

फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी को आमलकी एकादशी कहते हैं। आमलकी यानी आंवला। आंवला को शास्त्रों में श्रेष्ठ स्थान प्राप्त है। विष्णु जी ने जब सृष्टि की रचना के लिए ब्रह्मा को जन्म दिया, उसी समय उन्होंने आंवले के वृक्ष को जन्म दिया। आंवले को भगवान विष्णु ने आदि वृक्ष के रूप में प्रतिष्ठित किया है। इसके हर अंग में ईश्वर का स्थान माना गया है।

सौ गायों को दान में देने के उपरान्त जो फल प्राप्त होता है। वही फल आमलकी एकादशी का व्रत करने से प्राप्त होता है। इस व्रत में आंवले के पेड़ का पूजन किया जाता है। आंवले के वृक्ष के विषय में यह मत है, कि इसकी उत्पति भगवान श्री विष्णु के मुख से हुई है। एकादशी तिथि में विशेष रूप से श्रीविष्णु भगवान की पूजा की जाती है। आंवले के पेड की उत्पत्ति को लेकर एक कथा प्रचलित है।

विष्णु पुराण के अनुसार एक बार भगवान विष्णु के मुख से चन्दमा के समान प्रकाशित बिन्दु प्रकट होकर पृथ्वी पर गिरा, उसी बिन्दु से आमलक अर्थात आंवले के महान पेड़ की उत्पत्ति हुई। भगवान विष्णु के मुख से प्रकट होने वाले आंवले के वृक्ष को सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। यही कारण है कि विष्णु पूजा में इस फल का प्रयोग होता है।

आंवला एकादशी अर्थात आमलकी एकादशी को इसी नाम से जाना जाता है। फाल्गुन शुक्ल पक्ष की एकादशी को किया जाने वाला यह व्रत व्यक्ति को रोगों से मुक्ति दिलाने वाला होता है। इस व्रत में आंवले के वृक्ष की पूजा करने का विधि-विधान है। इस व्रत के विषय में कहा जाता है, कि यह एकादशी समस्त पापों का नाश करने वाली है। इस व्रत में आंवले के पेड का पूजन किया जाता है। आंवले के वृक्ष के विषय में यह मत है, कि इसकी उत्पति भगवान श्री विष्णु के मुख से हुई है।

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