Home > राज्य > मायावती महिला हैं तो दयाशंकर की मां, पत्नी, बेटी कौन?

मायावती महिला हैं तो दयाशंकर की मां, पत्नी, बेटी कौन?

 Special Coverage News |  2016-07-28 04:29:45.0  |  New delhi

मायावती महिला हैं तो दयाशंकर की मां, पत्नी, बेटी कौन?

अवधेश कुमार वरिष्ठ पत्रकार

अगर मायावती महिला हैं तो उमाशंकर की मां, पत्नी, बेटी, बहन भी महिला हैं। अगर मायावती के साथ नारी का सम्मान लागू होता है तो फिर दयाशंकर के परिवार के साथ यह कारक क्यों लागू नहीं हो सकता है। खैर, दयाशंकर की पत्नी स्वाति सिंह के सामने आने से पासा पलटा है और मायावती को रक्षात्मक होना पड़ा है। भाजपा को भी लगा कि अब उस परिवार के साथ खड़ा होने में ही राजनीतिक हित है तो वे खड़े हो गए। दयाशंकर की पत्नी और मां ने भी प्राथमिकी दर्ज करा दी है, लेकिन उसमें कार्रवाई की संभावना कम है। सपा सरकार चुनाव के पूर्व ऐसा करके मायावती को मुद्दा नहीं देना चाहती।


दयाशंकर सिंह भाजपा से छः साल के लिए निकाले जा चुके हैं। उनके खिलाफ अनुसूचित जाति कानून के तहत मुकदमा भी दर्ज हो चुका है। यानी उनने जो गलती की पार्टी की ओर से उसकी राजनीतिक सजा मिल चुकी है तथा शासन की ओर से कानूनी सजा दिलाए जाने का कदम उठा लिया गया है। इससे ज्यादा ऐसी एक गलती की क्या सजा हो सकती है? पार्टी से निकाले जाने का अर्थ है लंबे समय के लिए राजनीतिक कैरियर का अंत। अगर उनकी जुबान ठीक चली होती तो अभी भी वे उत्तर प्रदेश भाजपा के उपाध्यक्ष होते तथा हो सकता है कि आगामी विधानसभा चुनाव में कहीं से पार्टी के उम्मीदवार भी हो जाते। वर्तमान राजनीति में किसी नेता के लिए राजनीतिक कैरियर से बड़ा क्या हो सकता है। अगर उसी पर तत्काल विराम लग गया है तो यही अपने आपमें बहुत बड़ी सजा है।


हालांकि उनकी पंक्ति को देखें तो उन्होंने मायावती को वेश्या नहीं कहा, केवल उनकी तुलना की लेकिन यह भी बड़ी गलती थी। किंतु इसके बाद उन्होंने अपनी गलती मान ली, माफी भी मांगी…। एक सामान्य राजनीतिक माहौल में किसी की जुबान से गलत बात निकल जाए और वो अपनी गलती स्वीकार कर माफी मांग ले तो विवाद को यही खत्म कर दिया जाना चाहिए। जिनके लिए अभद्र भाषा का प्रयोग किया गया है उन्हें भी थोड़ा उदार ह्रदय से क्षमा कर देना चाहिए। हां, अगर दोबारा वो इसी प्रकार का शब्द प्रयोग करता है तो उसके खिलाफ पार्टी कड़ी कार्रवाई अवश्य करे।

बसपा के लोगों को इतने से संतोष हो जाना चाहिए था। लेकिन नहीं। बसपा के नेताओं ने उनकी मां, पत्नी से लेकर नाबालिग बच्ची तक को जिस शर्मनाक तरीके से निशाना बनाना आरंभ किया उसके सामने तो दयाशंकर की गलती कुछ है ही नही। अगर दयाशंकर सिंह के लिए राजनीतिक सजा और कानूनी कार्रवाई तो उनके लिए क्या जो उनके परिवार की महिलाओं के लिए ऐसे अश्लील और अपमानजक भाषा का प्रयोग कर रहे हैं।



वैसे मायावती पर मोटी रकम लेकर टिकट बेचने का आरोप हर ओर से लगा है। हाल में उनकी पार्टी से जितने नेताओं ने नाता तोड़ा है या जिन्हें उन्होंने निकाला है सबने खुलेआम यह आरोप लगाया है कि वो बोली के आधार पर टिकट वितरण कर रही हैं। उनके अनुसार जिसने बड़ी बोली लगाई उसे टिकट मिला। हमारे पास इसके प्रमाण नहीं हैं, इसलिए इस बारे में हम दावे के साथ कुछ नहीं कह सकते। हालांकि उनकी पार्टी से पहले उम्मीदवार बने लोगों से अकेले में बात करिए तो वो भी इसे सच बताते हैं। वैसे भी अगर चारों ओर से ये बातें कहीं जा रहीं हैं तो ये एकदम गलत कैसे हो सकतीं हैं?

दयाशंकर सिंह ने यही बातें कहीं थीं और यहां तक वे एक विरोधी नेता की सीमा में थे। लेकिन जैसे ही उन्होंने कहा कि ऐसा तो कोई वेश्या भी नहीं करती। एक बार वेश्या के साथ सौदा तय हो गया तो वो नहीं बदलती, लेकिन मायावती तो एक बार सौदा तय हो जाने के बाद अगर किसी और ने ज्यादा धन दे दिया तो उसे टिकट दे देतीं है। यहीं उन्होंने मर्यादा का उल्लंघन कर दिया।

हालांकि उनकी पंक्ति को देखें तो उन्होंने मायावती को वेश्या नहीं कहा, केवल उनकी तुलना की लेकिन यह भी बड़ी गलती थी। किंतु इसके बाद उन्होंने अपनी गलती मान ली, माफी भी मांगी…। एक सामान्य राजनीतिक माहौल में किसी की जुबान से गलत बात निकल जाए और वो अपनी गलती स्वीकार कर माफी मांग ले तो विवाद को यही खत्म कर दिया जाना चाहिए। जिनके लिए अभद्र भाषा का प्रयोग किया गया है उन्हें भी थोड़ा उदार ह्रदय से क्षमा कर देना चाहिए। हां, अगर दोबारा वो इसी प्रकार का शब्द प्रयोग करता है तो उसके खिलाफ पार्टी कड़ी कार्रवाई अवश्य करे।


किंतु हमारे देश का राजनीतिक माहौल सामान्य नहीं है। मुद्दों और तथ्यों से ज्यादा भावनाओं पर चुनाव जीतने और राजनीति करने की स्थापित दुष्प्रवृत्ति ने राजनीति से मनुष्यता और एक दूसरे के प्रति उदारता का लगभग अंत कर दिया है। यह स्थिति दलों के अंदर और दलों के बीच भी एक दूसरे के प्रति है। मायावती अपनी हर आलोचना को दलित कारक से जोड़ देतीं हैं और फिर दूसरे के सामने जवाब देने की स्थिति नहीं रहती। इस मामले में भी यही हुआ है।

हालांकि कोई भी निष्पक्ष व्यक्ति मानेगा कि दयाशंकर सिंह जब उन पर हमला कर रहे थे तो कहीं से भी उनके मन में यह नहीं रहा होगा कि वो दलित होने के कारण मायावती की तुलना में अभद्रता की सीमा तक चले गए हैं। मायावती की जगह कोई सवर्ण नेत्री होतीं तो भी शायद उनकी भाषा यही होती। सच कहा जाए तो इस पूरे मामले में दलित कारक है ही नहीं। इसको जबरन दलित चश्मे से देखने की कोशिश की जा रही है। भाजपा के सामने अगला चुनाव है। वह नहीं चाहती कि बसपा इसे दलितों का मुद्दा बनकार चुनावी लाभ उठाए। गुजरात में दलितों की पिटाई ऐसे ही मुद्दा बना हुआ है। उसमें क्यों कोई जोखिम उठाई जाए। इसलिए बसपा के आक्रामक रुख को देखते ही उसने अपने एक पुराने कार्यकर्ता-नेता को मिनट में बाहर कर दिया। उसका गलती स्वीकारना और माफी मांगना व्यर्थ चला गया। सपा ने भी देखा कि उसके लिए यही मौका है मायावती के इस आरोप का जवाब देने का कि वो दलित विरोधी है, इसलिए आनन-फानन में अनुसूचित जाति कानून के तहत मुकदमा दर्ज कर दिया गया। यह बात अलग है कि कानूनी जानकार इस मामले के न्यायालय में न ठहरने की भविष्यवाणी कर रहे हैं।

और मायावती एवं बसपा के लिए तो चुनाव के पूर्व इससे बेहतर मुद्दा भाजपा को दलित विरोधी साबित करने का कुछ हो ही नहीं सकता। मायावती कहती हैं कि भाजपा को स्वयं दयाशंकर के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करानी चाहिए थी। वो कह रहीं हैं कि उन्होंने कार्यकर्ताओं को प्रदर्शन करने के लिए नहीं कहा था, वो स्वयं कर रहे है। बात ठीक है। लेकिन वो प्रदर्शन न करने के लिए तो कह सकतीं थीं। या प्रदर्शन करने वालों को किसी प्रकार की अभद्र भाषा प्रयोग न करने का निर्देश दे सकतीं थीं। ऐसा उन्होंने नहीं किया, बल्कि उनके नेताओं-कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शनों में दयाशंकर के परिवार की महिलाओं के लिए जिस तरह की गंदी भाषा का प्रयोग किया उसे तो लिखा भी नहीं जा सकता।

उसकी आलोचना करने की जगह मायावती उनका समर्थन कर रही हैं। वो कह रहीं हैं कि जब उसकी मां बहन के बारे में कहा गया तब उसे पता चला कि क्या गुजरती है। तो यह है उनका व्यवहार। उनकी एक महिला नेता ने कहा कि दयाशंकर का जुबान काटकर लाओ और 50 लाख ले जाआ। कोई दयाशंकर को दोगला कहकर बयान दे रहा है। मायावती से पूछा जाना चाहिए कि भाजपा के नेता ने आपके लिए अभद्र भाषा का प्रयोग किया तो उसके खिलाफ पार्टी ने कार्रवाई कर दी, आपके नेताओं ने जिस तरह की भाषा प्रयोग की उनके खिलाफ आप कार्रवाई क्यों नहीं करतीं? इसका जवाब वो नहीं देंगी, क्योंकि उन्होंने इसका समर्थन किया है।

वास्तव में यह पूरा प्रकरण समय का दुर्भाग्य और राजनीति के पतन का प्रमाण है। विरोधियों की आलोचना करते समय भी भाषा की मर्यादा का पालन राजनीति की न्यूनत अर्हंता होनी चाहिए। दयाशंकर सिंह ने उस मर्यादा का पालन नहीं किया जिससे यह पता चलता है कि भाजपा में भाषा संयम का जो संस्कार था उसका छीजन हुआ है। बसपा की जवाबी उग्र अभद्रता तो सारी सीमाएं ही लांघ गईं हैं। राजनीति का पतन इसलिए कि सब केवल भावी चुनाव को ध्यान में रखकर अपना कदम उठा रहे हैं। अगर राजनीति के लिए चुनाव जीतना यानी सत्ता में जाना सर्वस्व हो जाएगा तो उसकी यही परिणति होगी। भारतीय राजनीति से सच और झूठ, विवेक-अविवेक, धैर्य और संतुलन का अंत हो रहा है, अन्यथा यह मामला इतना तूल पकड़ता ही नहीं। पूरे मामले पर नेताओं और पार्टियों की प्रतिक्रिया बिल्कुल अलग होतीं।

Tags:    
Share it
Top