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गाय, गंगा अब गधा तक पहुंची बात, क्या इसी से होगा यूपी का उद्धार!

 शिव कुमार मिश्र |  2017-02-22 10:04:03.0  |  लखनऊ

गाय, गंगा अब गधा तक पहुंची बात, क्या इसी से होगा यूपी का उद्धार!

संजय शर्मा 

लखनऊ: उत्तर प्रदेश में चुनाव रोमांचक मोड़ पर पहुंच चुका है। राजनीतिक दलों के चुनावी मुद्दे लिस्ट से गायब हो गए हैं। वोट हासिल करने के लिए अब नेताओं ने जाति-धर्म की राजनीति शुरू कर दी है। तीन चरण के मतदान तक तो हालात ठीक थे लेकिन अब न विकास की बात हो रही है न ही संचालित योजनाओं की। कोई किसी को गधा कह रहा है तो कोई किसी को चुल्लू भर पानी में डूबने की बात कर रहा है। भडक़ाऊ भाषण पर उतर आए नेता गाय, गंगा, श्मशान और कब्रिस्तान की राजनीति करने लगे हैं। उन्हें इससे कोई सरोकार नहीं कि उनके जुमले का समाज पर क्या फर्क पड़ रहा है। उन्हें सरोकार है तो बस वोट से।


उत्तर प्रदेश के चुनावी दंगल में सुचिता का दांव-पेच गायब है। नेताओं को सिर्फ जीत की दरकार है। जीत के लिए वे सारे हथकंडे अपना रहे हैं। सुचिता की दुहाई देने वाले नेता खुद अभद्र भाषा का प्रयोग खुलेआम कर रहे हैं। पद, प्रतिष्ठï का कोई लिहाज नहीं रह गया है। आलम यह है कि नेता एक-दूसरे पर व्यक्तिगत हमले कर रहे हैं। तीन चरणों के चुनाव तक विकास की बात हो रही थी लेकिन चुनावी समीकरण बदलते ही नेताओं के सुर भी बदल गए। व्यक्तिगत हमलों के साथ-साथ अब गाय और गंगा की भी बात होने लगी। देश के प्रधानमंत्री मोदी तो श्मशान और कब्रिस्तान का बयान देकर ध्रुवीकरण की राजनीति शुरू कर दी है।


लिहाजा भाजपा के जो नेता दबी जुबान से साम्प्रदायिकता फैला रहे थे, वह पीएम मोदी के फतेहपुर की रैली के बाद खुलकर बोलने लगे हैं। अब विकास के मुद्दों पर बात न होकर गाय और गंगा की बात होने लगी हैं। नेताओं की बढ़ती बेचैनी उनके भाषणों में दिखने लगी है। इसी का नतीजा है कि इस बार के चुनाव में गधे को भी जगह मिल गई है। इतना ही नहीं इस चुनाव में एक-दूसरे का नामकरण भी खूब हो रहा है।



सीधे-सीधे प्रधानमंत्री के लिए अभद्र भाषा का प्रयोग किया जा रहा है। बसपा सुप्रीमो मायावती प्रधानमंत्री मोदी को निगेटिव दलित मैन कह रही है तो प्रधानमंत्री उन्हें बहनजी सम्पत्ति पार्टी कह रहे हैं। न तो प्रधानमंत्री को अपनी गरिमा का ख्याल है और न ही अन्य नेताओं को। चौथे चरण का मतदान कल होना है। बुंदेलखंड सहित 53 विधानसभा सीटों पर मतदान होना है। जातिगत समीकरण को ध्यान में रखते हुए ही अब विकास की बात न करके गाय और गंगा की बात हो रही है। आगे जो चुनाव होने हैं वहां भी शायद यह ट्रिक काम आ जाए। अब देखना यह होगा कि जनता किसे अहमियत देती है।चुनाव से पहले तक भाजपा लगातार यह कहती आ रही थी कि यूपी में विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ा जायेगा।



बिहार चुनाव से सबक लेते हुए भाजपा यूपी में राम मंदिर, गाय और गंगा को दूर रखे हुए थी। पीएम मोदी के चेहरे पर चुनाव लड़ रही भाजपा अभी तक तो केन्द्र सरकार की योजनाओं के भरोसे ही वोटरों को अपने पक्ष में करने की कोशिश में लगी थी। प्रधानमंत्री मोदी से लेकर भाजपा के स्टार प्रचारक चुनावी रैलियों में केन्द्र सरकार की योजनाओं का ही गुणगान कर रहे थे लेकिन तीसरे चरण के मतदान के बाद से चुनावी समीकरण बदलते ही भाजपा की प्राथमिकता भी बदल गई। अब विकास को दरकिनार कर एक बार फिर भाजपा अपने पुराने मुद्देके सहारे वोट हासिल करने की जुगत में लग गई है।

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