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जानिए 'महाभारत' में 18 की संख्या का महत्व

 Special News Coverage |  2015-09-29 12:13:41.0

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महाभारत में कई घटना, संबंध और ज्ञान-विज्ञान के रहस्य छिपे हुए हैं। महाभारत का हर पात्र जीवंत है, चाहे वह कौरव, पांडव, कर्ण और कृष्ण हो या धृतदुमन्य, शल्य, शिखंडी और कृपाचार्य हो। महाभारत सिर्फ योद्धाओं की गाथाओं तक सीमित नहीं है। महाभारत से जुड़े शाप, वचन और आशीर्वाद में भी रहस्य छिपे हैं।

कहते है कि महाभारत कथा में 18 (अठारह) संख्या का बड़ा महत्व है। महाभारत की कई घटनाएँ 18 संख्या से सम्बंधित है। कुछ उदहारण आपके सामने प्रस्तुत है.....


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1: महाभारत की पुस्तक में कुल 18 पर्व (अध्याय) हैं।
आदि पर्व, सभा पर्व, वन पर्व, विराट वरव, उद्योग पर्व, भीष्म पर्व, द्रोण पर्व, अश्वमेधिक पर्व, महाप्रस्थानिक पर्व, सौप्तिक पर्व, स्त्री पर्व, शांति पर्व, अनुशाशन पर्व, मौसल पर्व, कर्ण पर्व, शल्य पर्व, स्वर्गारोहण पर्व तथा आश्रम्वासिक पर्व।
2: कृष्ण ने कुल 18 दिन तक अर्जुन को ज्ञान दिया।
3: महाभारत का युद्ध कुल 18 दिनों तक हुआ था।
4: श्रीमद् गीता में भी कुल 18 अध्याय हैं।
5: कौरवों और पांडवों की सेना भी कुल 18 अक्षोहिनी सेना थी जिनमें कौरवों की 11 और पांडवों की 7 अक्षोहिनी सेना थी।
6: इस युद्ध के प्रमुख सूत्रधार भी 18 हैं।
धृतराष्ट्र, दुर्योधन, दुह्शासन, कर्ण, शकुनी, भीष्मपितामह, द्रोणचार्य, कृपाचार्य, अश्वस्थामा, कृतवर्मा, श्रीकृष्ण, युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव, द्रौपदी एवं विदुर।
7:
महाभारत के युद्ध के पश्चात् कौरवों के तरफ से तीन और पांडवों के तरफ से 15 यानि कुल 18 योद्धा ही जीवित बचे।
8: महाभारत को पुराणों के जितना सम्मान दिया जाता है और पुराणों की संख्या भी 18 है।

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