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आखिर क्यों राष्ट्रकवि दिनकर के गांव सिमरिया के लोगों का नेताओं पर से उठ गया है विश्वास

 Special Coverage News |  2018-09-23 14:26:39.0  |  बेगुसराय

आखिर क्यों राष्ट्रकवि दिनकर के गांव सिमरिया के लोगों का नेताओं पर से उठ गया है विश्वास

सिमरिया से शिवानंद गिरि की विशेष रिपोर्ट

बेगूसराय:

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' की जयंती है। लेकिन विडंबना यह है कि उनके गांव सिमरिया को 1986 में आदर्श ग्राम और बाद में प्रधानमंत्री ग्राम विकास योजना के तहत स्थानीय सांसद डॉ भोला सिंह ने गोद लिया,बावजूद इसके गांव की ना तो सूरत बदली और ना ही सीरत।




दिनकर पुस्तकालय

बिहार के बेगूसराय जिले के सिमरिया में दिनकरजी का जन्म हुआ था। कृषिप्रधान गांव में लोगों की जीविका खेती पर ही आधारित रही। उधोगों के विकास के कारण लोगों ने हर ओर अपना घ्यान लगाया। सिमरिया को आदर्श गांव घोषणा के बाद स्थानीय लोगों को लगा कि अब गांव का न सिर्फ कायाकल्प होगा बल्कि रोजगार व विकास के मार्ग प्रशस्त होंगे लेकिन सरकार की बेरूखी से उनके उम्मीदों पर पानी फिर गया। दिनकर का गांव सिमरिया नेताओं व अधिकारियों के सब्जबाग का मंच बन गया है।यहां के बाशिंदों के लिए विकास की बात करना बेमानी सी लगने लगी है।




दिनकर का गांव सिमरिया की गली व मकान जिसपर दिनकर की रचनाएं लिखी हुई है।


सिमरिया आने पर ग्रामीणों की बात सुनना भी नेताओं व अधिकारियों को खराब लगते रही है। उदाहरण देखिए ,एक बार तत्कालीन केन्द्रीय उधोग राज्यमंत्री कृष्णा शाही एक समारोह में आयीं हुई थी,स्थानीय युवा साहित्यकार शशिधर ने गांव के हालात तथा अन्य मुद्दों को गर्मजोशी से क्या रखा ,मंत्री महोदया का चेहरा लाल हो गया ।




पंचायत भवन के पास दिनकर जी प्रतिमा


जैसे ही कृष्णा शाही भाषण शुरू की तो उन्होंने अपने भाषण में गांव व दिनकरजी की चर्चा कम यहां के लड़कों की अनुशासनहीनता की चर्चा ज्यादा की।समझा जा सकता है कि वो क्या सिमरिया के विकास के लिए पहल करेंगी? इसी तरह, सांसद राजो सिंह की भी रही।



जीरोमाइल में दिनकरजी की आदमकद प्रतिमा


एक बार तत्कालीन डीएम हरजोत कौर को भी एक समारोह में वहां के लोगों द्वारा गांव की समस्या की पीड़ा नागवार गुजरा और वो इतनी नाराज हुई कि सिमरिया में पैर नहीं रखने की बात तक कह डाली।और हुआ भी ऐसा ही।भला हो ऐसे अधिकारियों व नेताओं को जो नाराजगी(अहं) के कारण सिमरिया के विकास में रूचि दिखाना मुनासिब नहीं समझें। लेकिन ऐसे दर्जनों नेता व मंत्रियों फेहरिस्त है जो सिमरिया में "विकास की गंगा" बहा देने का दिवास्वप्न दिखा गए।


दिनकरजी के गर्भगृह को स्मारक बनाने की ब बरौनी रिफायनरी के तत्कालीन अधिकारी के़.पी़.शाही व आनंद कुमार के पहल पर की गई थी लेकिन सिमरिया में घटित एक घटना व जमीन संबंधी कानूनी दांवपेंच के बाद रिफाईनरी प्रबंधन ने मुहंमोड़ लिया ।हालांकि रिफाइनरी ने अपने स्त्तर से गांव में कई काम जरूर कराए हैं। गांव के इंटर हाईस्कूल टीचरों की कमी से जूझ रहा है।अस्पताल में डॉक्टर का दर्शन नहीं,चौबीस घंटे बिजली नहीं ,,सड़कें खस्ताहाल,किसान फटेहाल यहीं है आज सिमरिया की पहचान।



दिनकर सभागार जिसे बरौनी रिफाईनरी ने बनवाया


जहां मूलभूत सुविधाओं के लिए लोग जद्दोजहद में लगे हो वहां नेताओं द्वारा "दिनकर शोध संस्थान "खोलने की बात बेमानी लगती है। भला हो गांव के युवाओं का जिसने अपने बदौलत न सिर्फ दिनकर की यादों को संजोए रखा है बल्कि उनके समारोह को गांव के त्योहार की तरह वर्षों से मनाने में तल्लीन हैं।




गांव की खस्ताहाल सड़क


पत्रकार प्रवीण प्रियदर्शी कहते हैं कि अब हमलोगों का नेताओं पर से भरोसा उठ गया है लिहाजा गांव के लोगों व स्थानीय जनसहयोग से विकास सहित दिनकरजी के यादों को संजोंने में लगे हैं।कुछ इसी तरह की अवधारणा है गांव के साहित्यकार संजीव फिरोज की। वे बताते हैं कि दिनकर की धरती की मिट्टी को नमन करने बीबीसी सहित कई विदेशी व राष्ट्रीय स्तर के पत्रकार आकर न सिर्फ अपने आप को धन्य महसूस किए बल्कि दिनकर पुस्तकालय व ग्रामीणों की तन्मयता की प्रशंसा की ।बावजूद इसके शायद नेताओं को थोड़ी भी समझ होती तो सिमरिया बदहाल नहीं होता।




दिनकर जी पत्नी के साथ


दिनकर स्मृति विकास समिति के सचिव मुचकुंद कुमार कहते हैं कि हाल ही में दिनकर की दो रचनाओं केपचास साल होने के अवसर पर दिल्ली में,आयोजित एक समारोह में पीएम नरेन्द्र मोदी ने भी शिरकत की लेकिन न तो रचनाकार "दिनकर 'व उनके गांव की ही सुधि ली गई। सच तो यह हौ कि सरकार देश स्तर पर दिनकर के नाम पर जितनी राशि खर्च करती है उसका कुछ हिस्सा व सही देख रेख के लिए किसी प्रायोजक को दे दे तो न सिर्फ सिमरिया राष्ट्रीय मानचित्र पर सांस्कृतिक विरासत को समेटे एक पर्यटक स्थल बन जाएगा बल्कि साहित्यकारों व शोधार्थियों के लिए तीर्थस्थली बन सकता है।





बहरहाल,दिनकर के गांव सिमरिया के हालात व अधिकारियों व नेताओं के घोषणाओं से तो दिनकरजी द्वारा लिखित निम्न पंक्तियां सही साबित होती नजर आ रही है-

घातक है जो देवता सदृश दिखता है

कमरें में हुक्म लिखता है।

जिस पापी को गुण नहीं ,गोत्र प्यारा है

समझो,उसने ही हमें यहां मारा है।।"

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