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शिवसेना से अलग होकर बीजेपी ने क्या बिहार की राजनीति के लिए भी दिया यह 'खास' संदेश!

 Special Coverage News |  14 Nov 2019 4:57 PM GMT  |  बिहार

शिवसेना से अलग होकर बीजेपी ने क्या बिहार की राजनीति के लिए भी दिया यह

पटना. महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन (President Rule in Maharashtra) लागू होने के बाद भी शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी (Shivsena, Congress and NCP) में सरकार बनाने को लेकर बातचीत जारी है. वहीं, बीजेपी के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष अमित शाह (Amit shah) ने यह साफ कर दिया है कि शिवसेना (Shiv sena) जो मांग रख रही है उसे मानना पार्टी के लिए संभव नहीं था. दूसरी तरफ, झारखंड (Jharkhand) में लोक जन शक्ति पार्टी (LJP) की मांगों को नहीं मानकर भी बीजेपी (BJP) ने अपना रुख साफ कर दिया है कि वह सहयोगियों की हर मांग के आगे नहीं झुकेगी.

हालांकि, सहयोगियों ने भी अपनी-अपनी जिद को ऊपर रखा और बीजेपी नेतृत्व के लिए भी संदेश दिया कि उन्हें भी अपना हक चाहिए. इसके बावजूद बीजेपी ने महाराष्ट्र में शिवसेना जैसे पुराने सहयोगी के दबाव के बावजूद उसे मनाने की कोशिश नहीं की. तो क्या बीजेपी ने इस बहाने अपने सहयोगियों को मैसेज दे दिया है कि अब पहले वाली बात नहीं रही?

बिहार को लेकर भी कयासबाजी शुरू

जाहिर है महाराष्ट्र में शिवसेना, झारखंड में आजसू और बिहार में लोजपा जैसी सहयोगियों के सामने BJP के न झुकने की खबरों के बीच बिहार की राजनीति को लेकर भी कयासबाजी शुरू हो गई है. राजनीतिक जानकारों की नजर में बिहार में भी इस राजनीति का असर पड़ सकता है. वरिष्ठ पत्रकार रवि उपाध्याय कहते हैं कि बीजेपी का शिवसेना जैसे 30 साल पुराने सहयोगी से अलग हो जाना एक तरह से उनके सहयोगियों के लिए खास मैसेज है. यह जेडीयू और एलजेपी जैसे बिहार के मजबूत सहयोगियों के लिए भी संदेश है कि बीजेपी एक हद तक समझौता तो कर सकती है, लेकिन अगर बात सीमा से बाहर जाएगी तो बीजेपी कोई भी फैसला ले सकती है.

...तो सहयोगी दलों पर बढ़ेगा दबाव

बकौल रवि उपाध्याय ये मैसेज खास तौर पर बिहार में जेडीयू और एलजेपी जैसे सहयोगियों पर भी दबाव बढ़ सकता है जो सीट बंटवारे और विवादित मुद्दों पर बीजेपी से दो-दो हाथ करने को तैयार रहते हैं. खास तौर पर यह इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि वर्ष 2020 में बिहार में विधानसभा चुनाव होने वाला है. बीजेपी-जेडीयू के बीच यहां भी 50-50 की नौबत न आए इसके लिए बीजेपी ने मैसेज देने का काम किया है.

PK पर भी रहेगी नजर

दूसरी तरफ, वरिष्ठ पत्रकार प्रेम कुमार इसके दूसरे पहलू की बात करते हैं. वे कहते हैं, जैसी चर्चा है कि है कि शिवसेना-बीजेपी के अलगाव के पीछे जेडीयू के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और नीतीश कुमार के बेहद करीबी प्रशांत किशोर का भी हाथ है. उन्होंने ही शिवसेना को सीएम पद की कुर्सी का सपना दिखाया था. अगर ऐसा है तो पीके के दिमाग में बिहार को लेकर भी कोई न कोई योजना चल रही होगी.

बकौल प्रेम कुमार एलजेपी ने झारखंड और दिल्ली में अकेले लड़ने का फैसला कर बीजेपी को एक तरह से चेतावनी दी है कि अगर वह मनमानी करेगी तो उनके लिए भी विकल्प खुले हैं. यही बात झारखंड में आजसू ने भी जताने की कोशिश की है कि बीजेपी बड़ी पार्टी है तो उसे बड़ा दिल दिखाना चाहिए न कि सहयोगियों के साथ बारगेनिंग करना चाहिए.

BJP-JDU गठबंधन पर खतरा नहीं?

हालांकि] रवि उपाध्याय बिहार में बीजेपी-जेडीयू गठबंधन पर किसी तरह के खतरे से इनकार करते हैं. वे कहते हैं कि कि बिहार में तब तक गठबंधन रहेगा, जब तक नीतीश कुमार इसके साथ बने रहेंगे. इसके पीछे वजह यही है कि स्वयं अमित शाह ने ही बिहार में नीतीश कुमार के लिए ग्रीन सिग्नल दे दिया है. हालांकि, सीटों के बंटवारे के समय अगर अधिक जिद होती है तो राजनीति में कुछ कहा नहीं जा सकता है.

सहयोगियों में अविश्‍वास

प्रेम कुमार बताते हैं कि बीजेपी ने जिस अंदाज में शिवसेना से किनारा किया और अपनी महत्वाकांक्षा को तरजीह दी, इससे सहयोगी दलों में अविश्वास उभरा है. जेडीयू तो पहले से फूंक-फूंक कर कदम रख रही है और कई विवादित मुद्दों पर अपना रुख बार-बार जाहिर कर यह बताती भी रही है कि वह बीजेपी के एजेंडे में नहीं आने वाली है.

महाराष्‍ट्र में थम नहीं रहा उथल-पुथल

बहरहाल महाराष्ट्र की राजनीति में फिलहाल उथल-पुथल जारी है. वहां एनसीपी-कांग्रेस की शिव सेना से बातचीत चल रही है और हो सकता है कि आने वाले समय में वहां गठबंधन की सरकार भी बन जाए. ऐसे में बीजेपी-शिवसेना की 'टूट' के बाद अब देखना दिलचस्प होगा कि बिहार राजनीति में इन घटनाक्रम का क्या असर होता है.

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