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चले जावेद अख्तर "अनुपम खेर" बनने!

 Special News Coverage |  25 March 2016 9:20 AM GMT

javed and anupam

लेखक वसीम अकरम खान

जावेद अख्तर साहब , मुझे आपके "भारत माता की जय" बोलने पर कोई आपत्ति नहीं है , यह आपका कर्तव्य है या कि आपकी इच्छा या आपका अधिकार , वो आप समझिए पर जैसे आप बोलने के लिए स्वतंत्र हैं वैसे ही दूसरे के बोलने की स्वतंत्रता पर सवाल मत उठाईये और "अनुपम खेर" बनने के प्रयास में पैजामें से बाहर मत होईये क्युँकि मैंने अपने जीवन में आपको इस स्वतंत्रता का इस्तेमाल करते बहुत देखा है ।

आप उर्दू अदब की मशहूर हस्ती कैफी आज़्मी के दामाद हैं तो उसी उर्दू तहज़ीब की दो हस्तियाँ जानेसार अख्तर और सफिया अख्तर के बेटे भी हैं , ये तो छोड़िए आप उर्दू की शानदार शख्सियत मुज़्तर खैराबादी के पोते भी हैं जिन पर उर्दू गर्व करती है , फिर भी आपने अपनी आज़ादी का प्रयोग करके सीना ठोक ठोक कर कहा कि "आप नमाज़ नहीं पढ़ते"।


टीवी पर आपको मैने तमाम बार देखा है सीना ठोकते हुए कि आप "नास्तिक" हैं। तो किसी ने आज तक सवाल नहीं किया आपसे कि आप नमाज़ क्युँ नहीं पढ़ते या आप इमान क्युँ नहीं लाए , क्युँकि यह आपकी आज़ादी है कि आपका इमान क्या है और कितना है।

आप नमाज़ पढ़ें या चूल्हे भाड़ में जाएँ यह आपकी स्वतंत्रता है। किसी को आपसे पूछने का हक भी नहीं।

हाँ जब पहली बीवी हनी ईरानी से आपने विवाह किया था तब भी किसी ने आपसे नहीं पूछा था कि आपने उनसे किस धार्मिक पद्धति से विवाह किया, क्युँकि यह आपका व्यक्तिगत मामला था। आपकी गरीबी और मुफ्लिसी में जिस हनी ईरानी ने आपको सहारा दिया और अपनी बहन मेनका ईरानी के पति फरहान खान ( फरहा और साजिद खान के माता पिता ) के जूहू स्थित घर पर कमरा दिलवा कर मुंबई में आपको छत दिया उस पत्नी को आपने धोखा दिया।

उसे तलाक देकर शबाना आज़मी के साथ तब शादी कर ली जब आपका सितारा हिट फिल्मों शोले जंज़ीर के कारण चमक रहा था। तब भी किसी ने आपकी स्वतंत्रता और नीजता पर सवाल नहीं उठाया। तो आप होते कौन हैं भारत की संसद के तीन तीन बार चुने हुए एक सांसद को मुहल्ले का नेता कहने के लिए ? आपको पता भी है कि एक संसदीय क्षेत्र में कितने मुहल्ले होते हैं ? 20 लाख लोगों को संतुष्ट करना पड़ता है जिसका अपमान आपने उन सबके सांसद का अपमान करके किया है।

और वह तो एक बार नहीं तीन बार चुने हुए सांसद हैं पर आप तो एक निहायत अवसरवादी व्यक्ति हैं जो भारत के किसी मुहल्ले का चुनाव भी जीत नहीं पाए ,और राज्यसभा में भी मनोनीत सदस्य हैं। यहाँ तक की अपनी पत्नी के एहसान का भी आपने उपहार उन्हें उनके साथ एहसान फरामोशी कर के दिया और उस हनी ईरानी को बेसहारा छोड़ दिया जब उसके दो छोटे छोटे बच्चे फरहान और ज़ोया थे।

एक पत्नी को अपने पति की और 2-4 साल के बच्चों को अपने पिता की इसी समय सबसे अधिक आवश्यकता होती है पर तब तो आप शबाना आज़मी से इश्क लड़ा कर अपने भरे पूरे परिवार के साथ गद्दारी कर रहे थे , और आप हमें सिखाएँगे वतन से वफादारी ? वफादारी चरित्र होती है जो व्यक्तित्व में होती है और सबके लिए होती है । देश के लिए है तो पत्नी के लिए भी होनी चाहिए।

अवसरवाद आपका प्रमुख अस्त्र रहा है इसलिए राज्यसभा के विदाई भाषण में आपने फिर से राज्यसभा में आने के लिए जो अनुपम खेर बनने की कोशिश की , उस पर भी स्पष्ट हो जाएँ कि आप जावेद अख्तर हैं अनुपम खेर नहीं। और बहुत मुश्किल है आज के दौर में जावेद अख्तर सा नाम, हिन्दुस्तान में होना।

शाहरुख खान का नाम सुना होगा आपने ? उन्होंने अपने घर में मंदिर बनाया है और पूरे परिवार के साथ सपत्निक वहाँ पूजा करते सारा जीवन फोटो खिंचाते रहे हैं , पर क्या हुआ उनका ? देश की असहिष्णुता की लाखों लोगों ने आलोचना की पर शाहरुख खान का मात्र स्वीकार करना उनको समझा गया कि वह मुसलमान नाम के हैं।

आमिर खान ? याद है नाम ? ब्राह्मण पत्नी का डर बता देना आजतक भारी पड़ा हुआ है उनके लिए कि बराबर करते फिर रहे हैं क्युँकि वह मुसलमान नाम के हैं। जबकि उनसा "सरफरोश" और कोई फिल्म उद्योग में नहीं था।

खालिद उमर ? वह भी कम्युनिस्ट ही है आपकी ही तरह जिसे 10 साल बाद पता चला कि वह मुसलमान है।

सब तो छोड़िए, सलमान खान, देश के प्रधानमंत्री के साथ पतंगे उड़ाईं हैं, उनके सरकारी मेहमान रहे हैं। और जावेद अख्तर साहब ? जो आज आप कर रहे हैं ना वो वह बाप बेटे लोग सालों से करते रहे हैं, यहाँ तक कि "गणपति" को अपने घर में स्थापित करके "गणपति बप्पा मोरया" हर साल करते रहे हैं और विसर्जन करते रहे हैं ।उनको कभी नमाज़ पढ़ते नहीं देखा गया पर गणपति की पूजा करते और विसर्जित करते हर साल देखा गया।

याकूब मेनन के फाँसी का विरोध इस देश में करोड़ों ने किया पर "सलमान खान" होना उनको भारी पड़ गया, गालियाँ खाकर मजबूरी में ट्विट हटाने पड़े और सफाई देनी पड़ी।

जावेद अख्तर साहब जब यहाँ बिकाऊ और उन्मादी भीड़ "अखलाक" की तरह घेर लेती है ना ? तो वह यह नहीं देखती कि आप कम्युनिस्ट हैं या "भारत माता की जय" बोलने वाले, नाम मुसलमाँ होना बहुत है "अखलाक" की तरह कूँच देने के लिए।

आपको यकीन ना हो तो शाहरुख, सलमान, आमिर और खालिद उमर से पूछ लें जो आप की ही तरह बस नाम के ही मुसलमान हैं।

इसलिए बेहतर होगा कि अपने पजामे में रहिए और दूसरे को भारत के एक प्रदेश के एक जिले के एक मुहल्ले का नेता बनाकर अनुपम खेर बनने का प्रयास ना करिए , आपको भारत माता की जय बोलना है बोलते रहिए पर आप मुझे मेरे एक सवाल का जवाब जरूर दे दीजिएगा कि संसद के पहले आपने आखरी बार "भारत माता की जय" कब कहा था?

संभवतः कभी नहीं। ड्रामे का रचनाकार ड्रामा ही करेगा।

इस लेख से स्पेशल कवरेज न्यूज का कोई सम्बन्ध नहीं है ये लेखक की अपनी राय है।

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