Home > व्यवसाय > भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक ओर बुरी खबर, विश्व बैंक ने कम किया भारत के विकास दर का अनुमान

भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक ओर बुरी खबर, विश्व बैंक ने कम किया भारत के विकास दर का अनुमान

इस रिपोर्ट का कहना है कि ग़रीबी कम होने की दर में गिरावट जीएसटी और नोटबंदी कारण आई. इसके साथ ही ग्रामीण भारत में अर्थव्यवस्था में मंदी और युवाओं में बढ़ती बेरोज़गारी के कारण भी गति धीमी पड़ी.

 Special Coverage News |  14 Oct 2019 3:34 AM GMT  |  दिल्ली

भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक ओर बुरी खबर, विश्व बैंक ने कम किया भारत के विकास दर का अनुमान

इस वित्त वर्ष में हाल की तिमाहियों में कई सेक्टर में जारी गिरावट के बाद विश्व बैंक ने भी भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर का अनुमान 6 फ़ीसदी से नीचे कर दिया है. 2018-19 में भारत की वृद्धि दर 6.9 फ़ीसदी थी.

हालांकि विश्व बैंक ने दक्षिण एशिया इकनॉमिक फ़ोकस के हाल के संस्करण में कहा है कि भारत 2021 तक 6.9 फ़ीसदी की वृद्धि दर को हासिल कर लेगा और 2022 में 7.2 फ़ीसदी तक जाने का अनुमान है.

विश्व बैंक ने यह रिपोर्ट तब जारी की है जब इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड की वार्षिक बैठक होने वाली है. भारत की वृद्धि दर लगातार दूसरे साल भी सुस्त रही.

2018-19 में वृद्धि दर 6.9 फ़ीसदी थी और इससे पहले 2017-18 में यह दर 7.2 फ़ीसदी थी. इस अवधि में इंडस्ट्रियल आउटपुट ग्रोथ में 6.9 फ़ीसदी की बढ़ोतरी थी. कृषि में 2.9 और सर्विस सेक्टर में 7.5 फ़ीसदी की वृद्धि दर थी.

2019-20 की पहली तिमाही में सर्विस सेक्टर और इंडस्ट्री दोनों में गिरावट रही. मांगों में कमी रहने के कारण यह गिरावट आई. विश्व बैंक की रिपोर्ट में चालू खाता घाटा भी 2018-19 की जीडीपी के 2.1 फ़ीसदी हो गया है.

इसके पहले यह 1.8 फ़ीसदी था. इससे साफ़ साबित होता है कि भारत का व्यापार घाटा बढ़ा रहा है. यानी भारत का आयात बिल बढ़ रहा है और निर्यात कम हो रहा है.

विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार इस साल 2018 की तुलना में निवेश में भी कमी आई है. पिछले वित्तीय वर्ष के आख़िर तक विदेशी मुद्रा भंडार 411 अरब डॉलर था. हालांकि इसी अवधि में 2018 मार्च से अक्टूबर के बीच डॉलर की तुलना में रुपए में 12 फ़ीसदी की गिरावट आई थी.

विश्व बैंक के अनुसार भारत में ग़रीबी में कमी आ रही है लेकिन पहले की तुलना में इसकी गति धीमी हुई है. 2011-12 और 2015-16 में ग़रीबी में कमी की दर 21.6 से 13.4 फ़ीसदी थी.

इस रिपोर्ट का कहना है कि ग़रीबी कम होने की दर में गिरावट जीएसटी और नोटबंदी कारण आई. इसके साथ ही ग्रामीण भारत में अर्थव्यवस्था में मंदी और युवाओं में बढ़ती बेरोज़गारी के कारण भी गति धीमी पड़ी.

विश्व बैंक ने कहा है कि पहली तिमाही में आई गिरावट के बाद ही सुस्ती के संकेत मिल गए थे. इस रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीण भारत में आय में कमी के कारण मांग में कमी रहेगी और इससे ग्रोथ की दर प्रभावित होगी.

विश्व बैंक की रिपोर्ट में कहा गया है, ''निर्यात में बहुत वृद्धि की उम्मीद नहीं है. चीन और अमरीका के बीच जारी ट्रेड वॉर और वैश्विक ग्रोथ में सुस्ती के कारण विदेशी मांग भी कम रहेगी.''

आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने भी शुक्रवार को कहा कि एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भारत ख़तरे में है. उन्होंने कहा कि राजस्व घाटा जितना दिखाया जा रहा है उससे कही ज़्यादा है.

अमरीका के ब्रॉन यूनिवर्सिटी में ओपी जिंदल लेक्चर में बोलते हुए रघुराम राजन ने कहा कि मोदी सरकार के पास आर्थिक दृष्टिकोण नहीं है. उन्होंने कहा कि जिस भारत की अर्थव्यवस्था 2016 की पहली तिमाही में नौ फ़ीसदी पर थी वो आज पाँच पर पहुंच गई है.

भारत की वृद्धि दर अप्रैल-जून की तिमाही में पाँच फ़ीसदी पर पहुंच गई जो पिछले 6 सालों में सबसे निचले स्तर पर है.

विश्व बैंक से पहले मूडी ने भारत की वृद्धि दर का अनुमान 6.2 फ़ीसदी से कम कर 5.8 फ़ीसदी कर दिया था. रघुराम राजन का कहना है कि मोदी सरकार का नोटबंदी का फ़ैसला घातक साबित हुआ है और जीएसटी को भी ठीक से लागू नहीं किया गया.

इससे पहले पिछले हफ़्ते ग्लोबल कॉम्पिटिटिव इंडेक्स में भी भारत पिछड़ गया था. पिछले साल भारत 58वें नंबर पर था लेकिन अब वह 68वें नंबर पर पहुंच गया है.

इस इंडेक्स में सबसे ऊपर सिंगापुर है. उसके बाद अमरीका और जापान जैसे देश हैं. ज़्यादातर अफ़्रीकी देश इस इंडेक्स में सबसे नीचे हैं.

भारत की रैंकिंग गिरने की वजह दूसरे देशों का बेहतर प्रदर्शन बताया जा रहा है. इस इंडेक्स में चीन भारत से 40 पायदान ऊपर 28वें नंबर पर है, उसकी रैंकिंग में कोई बदलाव नहीं आया है.

संगठित क्षेत्रों पर जीएसटी का असर हुआ है. पिछले ढाई साल से जब से जीएसटी लागू हुआ है तब से 1400 से अधिक बदलाव किए गए हैं. इससे संगठित क्षेत्र के लोगों में उलझन बहुत बढ़ी है.

क़रीब 1.2 करोड़ लोगों ने जीएसटी के लिए रजिस्ट्रेशन करवाया है, लेकिन सिर्फ़ 70 लाख लोग जीएसटी फाइल करते हैं और एनुअल रिटर्न सिर्फ़ 20 प्रतिशत लोगों ने फाइल किया है.

अर्थव्यवस्था में मंदी या फिर सुस्ती के चलते सरकार के टैक्स कलेक्शन में कमी आई है. पिछले साल जीएसटी में 80 हज़ार करोड़ की कमी आई और डायरेक्ट टैक्स में भी इतने की ही कमी आई.

Tags:    
स्पेशल कवरेज न्यूज़ से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें न्यूज़ ऐप और फेसबुक पर ज्वॉइन करें, ट्विटर पर फॉलो करे...
Next Story

नवीनतम

Share it
Top