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एक ऐसा सच जिसे सुनकर उड़ जायेंगे होश, "कभी कभी तो लगता है, साला अपुन ही भगवान है"

एक गैर गांधी, गैर हिंदी, सुपर पावरफुल,चाणक्य किस्म के पार्टी प्रेसिडेंट की कल्पना, हमारी पीढ़ी अमित शाह में करती है। कामराज का कैनवस उनसे बेहद बेहद बड़ा था।

 Shiv Kumar Mishra |  14 Oct 2020 6:19 AM GMT  |  दिल्ली

एक ऐसा सच जिसे सुनकर उड़ जायेंगे होश, कभी कभी तो लगता है, साला अपुन ही भगवान है
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मनीष सिंह

पिछली सदी के छठवें दशक में कोई भारतीय अगर ऐसा कहे, तो समझिए उसका नाम के. कामराज है। कामराज, द किंग मेकर, जिसने दो प्रधानमंत्री चुने, और तीसरे को जीतेजी पीएम न बनने दिया।

एक गैर गांधी, गैर हिंदी, सुपर पावरफुल,चाणक्य किस्म के पार्टी प्रेसिडेंट की कल्पना, हमारी पीढ़ी अमित शाह में करती है। कामराज का कैनवस उनसे बेहद बेहद बड़ा था।

सुदूर तमिलनाडु में 1903 में पैदा हुआ यह साधारण व्यापारी का बेटा कम उम्र में पिता को खो देता है। 12 बरस की उम्र में पढ़ाई छोड़ घर चलाने में माँ का साथ देता है। 18 की उम्र में स्वाधीनता आंदोलन में कूद जाता है। पार्टी की सीढियां चढ़ते चढ़ते एक दिन वह राज्य का मुख्यमंत्री हो जाता है यह 1954 है।

स्कूल ड्रॉप आउट यह मुख्यमंत्री मुफ्त शिक्षा,मिड डे मील का जो अभियान छेड़ता है, उसकी वह लेगेसी तमिलनाडु को समृद्ध स्टेट्स में शुमार करने वाली थी। ऐसे में यह मुख्यमंत्री पद छोड़कर, कांग्रेस का प्रदेश अध्यक्ष बनना चाहता हैं।

किसलिए..? भौचक्के नेहरू ने पूछा । इसलिए कि कांग्रेस का संगठन कमजोर हो रहा है। इस्तीफा हुआ, कामराज अध्यक्ष बने। तमिलनाडु कांग्रेस के नही, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के। यह कथा 2014 में दोहराई गयी जब गुजरात के एक छोटे लीडर को उठाकर, राष्ट्रीय पार्टी का अध्यक्ष बना दिया।

कामराज प्लान देश भर में लागू हुआ। नेहरू कैबीनेट और राज्यों के बड़े नामचीन सीएम पद से उतर कांग्रेस सन्गठन में लगे। कामराज नेहरू के विश्वस्त, और टफ आदमी थे। नियति उन्हें एक बड़ा काम देने वाली थी।


1964 में नेहरू का अवसान हुआ। मोरारजी ने इच्छा जाहिर कर दी। अक्खड़, रूखे वित्तमंत्री को पीएम बनने देना कामराज को मंजूर न था। उनकी चाभी घूमी, मोरारजी धराशायी हुए, और लाल बहादुर सिरमौर।

दो साल बाद फिर मौका आया। अबकी बार मोरारजी ने पक्की तैयारी कर ली थी। तो कामराज ने इंदिरा को आगे कर दिया। नेहरू की बेटी को साढ़े तीन सौ सांसदों ने वोट किया, मोरारजी दो सौ पर रह गए। देश की हॉट सीट पर इंदिरा का स्वागत कामराज ने किया। उन्हें लगा होगा, कि वही भगवान है। यह भ्रम टूटने वाला था।

शास्त्री के युग मे सरकार पर कामराज की मजबूत पकड़ थी। इंदिरा से भी यही उम्मीद थी। कामराज की मंडली सत्ता पर मजबूत पकड़ बनाये थी, इंदिरा कसमसा रही थी। मगर शांति बनी रही। अगला चुनाव सामने था।

नेहरू कभी साढ़े तीन सौ से नीचे नही गए। 1967 देश का पहला चुनाव था, जो नेहरू को चुनने के लिए नही था। इंदिरा के नेतृत्व में मात्र 285 सीटें आयी। सरकार तो बनी, मगर इंदिरा कमजोर थी। ऊपर से कामराज मण्डली की बैक सीट ड्राइविंग। वह पिंजरा तोड़ने के माकूल मौके की तलाश में थी। मौका राष्ट्रपति चुनाव का आया। कामराज ने चुना नीलम संजीव रेड्डी को। इंदिरा ने निर्दलीय वी वी गिरी को..

वोट के एक दिन पहले कहा- कांग्रेसजनों, अंतरात्मा की आवाज पर वोट करो। आत्मा की आवाज निर्दलीय को जिता गई। यह कामराज की सुप्रीमेसी का मख़ौल था। भन्नाए कामराज ने इंदिरा को पार्टी से निकाल दिया।


पीएम सांसद बनाते हैं, पार्टी नही। इंदिरा को अब भी 220 सांसदों का समर्थन था। बहुमत सिद्ध करना था। मदद किसने की- डीएमके ने ..जी हाँ, कामराज के होम स्टेट में कांग्रेस के विपक्ष डीएमके ने इंदिरा का साथ दिया। पीएम की कुर्सी बच गयी। ज्यादातर कांग्रेसी सत्ता की ओर आ गए। कांग्रेस (आई) बन चुकी थी। कामराज के हाथ खाली खोखा रह गया।

इधर इंदिरा ने धड़धड़ बड़े बड़े फैसले लिए। बंगलादेश युध्द जीता, और गरीबी हटाओ के नारे पर समय पूर्व इलेक्शन करवा दिया। तमिलनाडु लोकसभा में आधा दर्जन कामराज विरोधियों के लिए सीट रखी। बाकी खुला मैदान डीएमके के लिए छोड़ दिया। इंदिरा दुर्गा हो गयी, कामराज का वाटरलू हो गया।

अपने बिठाये प्यादे से मात खाने के बाद कामराज में वह जोर न बचा। खुद चुनाव हार गए। मगर फिर एक उपचुनाव जीतकर लोकसभा आये। इंदिरा ने कैबिनेट में जगह देने की पेशकश की। पर कामराज जैसा शेर बुढापे में फेंकी हुई कुर्सी नही उठाता।

भारत के दो प्रधानमंत्री तय करने वाले इस शख्स के जीवन की सांझ सूनी रही। निशान-ए-पाकिस्तान श्री मोरारजी देसाई ने जब अटल और आडवाणी के साथ सन 77 में पद और गोपनीयता की शपथ ली, वे भगवान को शुक्रिया अदा कर रहे होंगे। इसलिए तेरह साल तक उन्हें रोकने वाला कामराज अब कहीं नही था।

इसलिए कि 2 अक्टूबर 1975 को कुमारस्वामी कामराज इस दुनिया को छोड़ चुके थे।

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