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मेरे खानदान में 'बाबू' नहीं पैदा होते, 'बाबा' पैदा होते हैं, लेकिन एक है बाबा राम-रहीम - विकास मिश्र

'Babu' is not born in my family, 'Baba' is born, but one is Baba Ram-Rahim

 विकास मिश्र |  2017-08-25 04:16:20.0

मेरे खानदान में बाबू नहीं पैदा होते, बाबा पैदा होते हैं, लेकिन एक है बाबा राम-रहीम - विकास मिश्र

'बाबा' ये वो नाम है, जो जन्म के साथ ही मेरे खानदान से जुड़ जाता रहा है। मेरे खानदान में 'बाबू' नहीं पैदा होते, 'बाबा' पैदा होते हैं। पिताजी से लेकर हम लोगों की पीढ़ी..उसके बाद भी खानदान में नई पीढ़ी में जिन बच्चों का जन्म हुआ, आसपास के गांवों में उन्हें 'बाबा' ही कहा जाता है। एक तो पंक्तिपावन ब्राह्मण का घर, ऊपर से पुरानी जमींदारी के साथ लंबी गुरु-शिष्य परंपरा के तहत ये तमगा खानदानी रूप से हम लोगों के साथ जुड़ा हुआ है।


संयोग देखिए, गांव छूटा, बनारस में तो सब ठीक रहा, इलाहाबाद विश्वविद्यालय में बीए के तीसरे साल के दौरान पता नहीं किसने शुरू किया, लेकिन प्यार से तमाम जूनियर मुझे बाबा कहने लगे। मैंने एतराज भी नहीं जताया, बचपन से ही आदत जो पड़ी थी। दिल्ली आया, तो बाबा जी छूटे रहे, लेकिन लखनऊ में मेरे फोटोग्राफर ज्ञान प्रकाश Gyan Swami ने 'स्वामी' का ऐसा तमगा दे दिया कि वहां से दिल्ली तक 'स्वामी' नाम चिपक गया। 'स्वामी' शब्द का इस्तेमाल ज्ञान दरअसल किसी प्रिय इंसान या फिर अपने बड़े और सम्माननीय के लिए करता था, जाने कब मैं भी लोगों के लिए 'स्वामी' का प्रयोग करने लगा। आज तमाम लोगों को मैं 'स्वामी' कहता हूं और वो मुझे। दिल्ली में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में जब आया तो कुछ महीने बाद ही कुछ साथियों ने 'बाबा' कहना शुरू कर दिया। यहां फिर नाम के साथ बाबा जुड़ गया। मेरठ में तो हमारे एक वरिष्ठ सहकर्मी थे, जिन्हें लोग 'बाबा' कहते थे।

गजब तो तब हुआ जब मैंने न्यूज 24 ज्वाइन किया, वहां पता चला कि लोग अजीत जी Ajit Anjum को 'बाबा' कहते हैं। आजतक से आए एक मित्र ने कहा कि कोई बात नहीं, वो बड़े बाबा रहेंगे और आप छोटे बाबा। मैंने सोचा नहीं गुरु, यहां बाबा नहीं कहलाना। मैंने दोस्तों के बीच अजीत सर को 'बड़े स्वामी' और सुप्रिय को 'छोटे स्वामी' कहना शुरू कर दिया। फिर तो बाबा की जगह अजीत सर हम लोगों के बीच ' बड़े स्वामी' ही हो गए। भड़ास वाले यशवंत Yashwant Singh ने अजीत सर के 'बड़े स्वामी' के नाम को और भी दूर तक पहुंचा दिया। अजीत सर भी जानते थे कि उन्हें लोग बड़े स्वामी कहते हैं।

आज बाबा, स्वामी जैसे शब्द मुहब्बत और श्रद्धा की गलियां पार करके कहीं और पहुंच चुके हैं। बाबा और स्वामी लोगों की भावनाओं के शोषण और पापाचार के जरिए अकूत दौलत कमा रहे हैं, अपना साम्राज्य खड़ा कर रहे हैं। समानांतर सरकार चला रहे हैं। बाबा ही क्यों..धर्म के नाम पर पाखंड करने वाले बाबाओं के साथ जुड़कर 'राम' का नाम भी बदनाम हो रहा है। फेहरिस्त देख लीजिए- बाबा आसाराम, बाबा रामपाल, बाबा राम-रहीम। ये तीनों 'राम' नामधारी बलात्कार के आरोपी हैं। तमाम अपराधों में इनका नाम है।

बात मैंने 'बाबा' से शुरू की थी, क बाबा राम-रहीम पर बलात्कार जैसा संगीन केस है, आज फैसला आना है, फैसले से पहले लाखों की तादाद में उनके भक्त पंचकुला और आसपास के इलाकों में जुट चुके हैं। दो-दो राज्यों की पुलिस के होश उड़े हैं। 64 हजार जवानों के साथ पैरामिलिट्री भी लगी है। सेना अलर्ट पर है। मामला बस इतना सा है कि एक अभियुक्त को अदालत पहुंचाना है, अदालत को फैसला सुनाना है। क्योंकि वो बाबा है, क्योंकि बाबा के लाखों भक्त हैं, तो इंसाफ के मंदिर से अगर बाबा के खिलाफ फैसला आया तो उनके भक्त सड़कों पर फैसला कर लेने पर आमादा हैं। तो क्या यही बाबागीरी है.. तो क्या देश, कानून अदालत से बड़े हो गए बाबा..? देश और सिस्टम की वो कौन सी कमजोरी है, जिसका फायदा उठाकर ये बन जाते हैं ऐसे बाबा..?

मैंने जब पोस्ट लिखनी शुरू की थी तो सोचा था कि कोई गंभीर बात नहीं करूंगा। भविष्य में बाबा बनने की जुगत लगाने की कोई बात लिखूंगा। आपको हंसाऊंगा। माफ कीजिएगा, दोस्तों मैं आपका मनोरंजन नहीं कर पाया।

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