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विकसित लोकतंत्र या विकृत लोकतंत्र!

 शिव कुमार मिश्र |  2017-12-27 09:05:27.0  |  दिल्ली

विकसित लोकतंत्र या विकृत लोकतंत्र!

2-जी स्पेक्ट्रम घोटाले में आये आज के फैसले के बाद दो बातें तात्कालिक रूप से जेहन में उभरती हैं. चुकि हम सब लोगों ने इस कथित घोटाले के समय काफी कागज़ रंगा था, इसलिए जरुरी है कि आज के फैसले के बाद भी उन बातों को उधेड़ा जाए.


पहली बात यह है, कि बकौल अदालत, इस पूरे मसले में कोई घोटाला हुआ ही नहीं. सारे आरोपी निर्दोष हैं, इसलिए बरी किये जाते हैं . हालाकि यह निचली अदालत का फैसला है और अंतिम नहीं है, लेकिन इतना तो तय है कि जब तक हमारे पास किसी अन्य अदालत का कोई अन्य फैसला नहीं आ जाता, तब तक हमें इसी फैसले को मानना पड़ेगा. इसी फैसले के आधार पर कोई राय बनानी पड़ेगी.
तो क्या सचमुच में इस मसलें में कोई घोटाला हुआ ही नहीं था ...? यदि ऐसा है तो सबसे पहले इसके लिए तत्कालीन सी.ए.जी. (नियंत्रक और महालेखापरीक्षक) को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए. आखिर एक संवैधानिक संस्था ने कैसे इतना दुर्भावनापूर्ण निष्कर्ष निकाल लिया कि इससे देश को 1 लाख 76 हजार करोड़ का नुकसान हुआ है ...? और फिर उस निष्कर्ष के आधार पर विपक्षी पार्टियों ने सरकार की खाट खडी कर दी. संसद से सड़क तक मनमोहन सिंह की सरकार आरोपों के दायरे में रही. मीडिया ने सरकार की खूब धज्जियाँ उड़ाई. जनमानस में उनकी छवि भ्रष्ट और निकृष्ट सरकार के रूप में गयी. पूरे देश ने सी.ए.जी. और मीडिया में आ रही खबरों के आधार पर सरकार को दोषी माना.
यदि अदालत का निर्णय सही है तो कुछ लोगों द्वारा उठाई गयी इस बात में दम दिखाई देता है कि इस कथित घोटाले की झूठी कहानी गढ़ने के पीछे कोई बड़ा षड़यंत्र काम कर रहा था. एक ऐसा षड्यंत्र, जिसने समूचे देश को धोखा दे दिया.

अब दूसरी बात पर आते हैं, जो और भी भयानक है. जैसा कि कुछ लोग-बाग़ कह रहे हैं कि घोटाला तो जरुर हुआ था, भले ही इस पर विवाद हो सकता है कि उसमें देश का कितना नुकसान हुआ. तो फिर सवाल यह उठता है कि जब इतना बड़ा घोटाला हुआ, तो अदालत ने कैसे सभी आरोपियों को बरी कर दिया ? कैसे यह फैसला दे दिया कि कोई घोटाला हुआ ही नहीं ?
यह इसलिए भी हैरान करने वाली बात है कि जिस पार्टी पर घोटाले का आरोप था, वह पार्टी सरकार से बेदखल हो चुकी है | और जिस पार्टी ने उस कथित घोटाले को लेकर जोर-शोर से अभियान चलाया था, वह साढ़े तीन वर्ष से केंद्र की सत्ता पर काबिज है. यानि कि इससे बेहतर अवसर नहीं हो सकता था कि इस मसले को अंजाम तक पहुंचाया जाता. लेकिन दुर्भाग्य देखिये कि अदालत अपने निर्णय में कह रही है कि जांच एजेंसी कोई भी ऐसा सबूत नहीं पेश कर सकी, जिसके आधार पर आरोपियों को दोषी माना जाए. वह जांच एजेंसी, जो उसी दल की सरकार के अधीन है, जो घोटाले पर सबसे अधिक हमलावर था.
ऐसे में कई सारे सवाल फिजा में तैर रहे हैं, जिसका किसी के पास कोई जबाब नहीं है. मसलन ... कि क्या यह मान लिया जाए कि सब कुछ मैनेज कर लिया गया ..? या यह समझ लिया जाये कि इस देश में बड़े लोगों का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता ? या यह कि शीर्ष के स्तर पर कहीं कोई मेल-मिलाप या समझौता हो गया ? या कि जांच एजेंसियों ने अपना काम ठीक से नहीं किया ? या कि जांच एजेंसियों को ठीक से काम ही नहीं करने दिया गया ?
यदि इनमें से एक भी बात सही है, जिसके कारण सभी आरोपी बरी हो गए हैं तो यह पूरी व्यवस्था के लिए डूब मरने वाली बात है. यह हमारे लोकतंत्र के लिए भी एक खतरनाक संकेत है कि हम अपनी दिशा भटक गए हैं. यह विकसित लोकतंत्र की नहीं, वरन विकृत लोकतंत्र की दिशा है.
रामजी तिवारी की कलम से
इन दोनों बातो में से जो भी सही हो, आज के फैसले के बाद इस देश का आम-सामान्य आदमी अपने आपको ठगा हुआ महसूस कर रहा है. व्यथित, क्षुब्ध और निराश भी.

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