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यह कैसा किसान आंदोलन है

मैंने आज किसान आंदोलन के नाम पर जो कुछ देखा उससे दिल दहल गया। मैं हमेशा से किसानों के पक्ष में खड़ा होने वाला व्यक्ति हूं।

 शिव कुमार मिश्र |  2018-06-02 06:12:44.0  |  दिल्ली

यह कैसा किसान आंदोलन है

अवधेश कुमार

मैंने आज किसान आंदोलन के नाम पर जो कुछ देखा उससे दिल दहल गया। मैं हमेशा से किसानों के पक्ष में खड़ा होने वाला व्यक्ति हूं। पता नहीं कितनी बार पत्र-पत्रिकाओं के अपने लेखों मंे मैंने लिखा है कि भारत को स्थिर और स्थायी रुप से सशक्त देश बनाने के लिए कृषि पर मुख्य फोकस करना होगा। कृषि सम्मान का पेशा बने, किसान को लगे कि कृषि करना भी उसी तरह सम्मान का काम है जैसा आइएएस या अन्य पदों पर काम करना या उससे भी ज्यादा....। साथ ही कृषि कार्यों में लागत कैसे कम हो, जो हमारी परंपरागत कृषि प्रणाली रही है उसे हर हाल में पुनर्जीवित किया जाए तथा कृषि से जुड़े उद्योगों एवं कारोबार को जितना संभव है बढ़ावा दिया जाए। ये सारे काम केन्द्र एवं राज्य दोनों सरकारों को करना होगा एवं स्थानीय लोगों को भी जितना संभव है पहल करनी होगी।
इसमें किसानों की दशा सुधार के लिए जिन-जिन मुद्दों पर संघर्ष की आवश्यकता है वह भी हो, लेकिन एकदम अहिंसक तरीके से। मैंने जिस तरह टैंकरों से सड़कों पर दूध बहाने के दृश्य देखे उससे एकदम विचलित हो गया। यही नहीं गांवों से दूध लेकर मोटरसाइकिलों-साइकिलों पर जो टंकी लादकर ले जाईं जातीं हैं उनसे भी दूत बहाए जाते देखा है। मैं यह स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हंू कि ऐसा कोई किसान कर सकता है। सच यह है कि किसानों ने तो अपने दूध उनके पास गए टैंकरों या स्थानीय छोटे विक्रेताओं को दे दिया। अगर नहीं देते तो टैंकरों और टंकियों में दूध आते ही नहीं। उन्हें रोककर दूसरे लोगो ने सड़कों पर उड़ेला है।
कोई किसान ऐसा कर ही नहीं सकता है। आज में किसान नहीं हूं लेकिन बचपन से किसानी करते हुए यहां तक आया हूं। जानवर पालने से लेकर खेती का हर कार्य मैंने किया है। अगर कहीं एक बूंद दूध गिर गया तो उसे पानी से तुरत धोया जाता था ताकि किसी का पैर उस पर न पड़ जाए। गाय या भैंस के थान से निकाले गए दूध के बारे में ऐसी भावना थी। ऐसी भावना रखने वाला किसान क्या इस तरह से दूध सड़कों पर बहा सकता है?
सड़कों पर सब्जियां और टमाटर फेंककर प्रदर्शन किया जा रहा है। एक किसान नेता बता रहे थे कि तय यह हुआ है कि इस बीच कोई किसान अपना सामान बेचेगा नहीं, बाजार नहीं ले जाएगा। आपस में विनिमय प्रणाली से सामानों का आदान-प्रदान करंेंगे। अगर यह तय हुआ था तो फिर अपने द्वारा पैदा किए गए सब्जियों तथा अपने जानवरों से निकाले गए दूधों को इस तरह सड़कों पर फेंकने वाले कौन हैं? साफ है कि किसानांे के नाम पर इसमें ऐसे विकृत मानसिकता वाले तत्व हैं जो ऐसा कर रहे हैं। इसका मतलब हुआ कि किसान के नाम से होने वाले आंदोलन को संचालित करने वालों का कुछ और भी उद्देश्य है। ऐसे निहित स्वार्थी तत्वों के द्वारा संचालित आंदोलन का समर्थन नहीं किया जा सकता।
हालांकि ऐसा लिखते हुए मुझे पीड़ा हो रही है। कारण, किसानों की समस्याएं दूर करने के लिए उनकी समस्याओं को ठीक से समझकर रचनात्मक और आंदोलनात्मक दोनों स्तरों पर काम करने की जरुरत है। समय-समय उनकी मांगों को मनवाने के लिए वास्तविक आंदोलन आवश्यक है। किंतु ऐसे स्वार्थी तत्व जिनका राजनीतिक उद्देश्य हो आंदोलन को गलत रुप दे चुके हैं। किसानों को ऐसे तत्वों से सतर्क हो जाना चाहिए।

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