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इसी जीप पर सवार होकर, भारतीय सेना के एक जांबाज ने पाकिस्तान के छुडाये थे छक्के !

 शिव कुमार मिश्र |  2018-01-16 08:37:59.0  |  दिल्ली

इसी जीप पर सवार होकर, भारतीय सेना के एक जांबाज ने पाकिस्तान के छुडाये थे छक्के !

इस जीप की तस्वीर को आप जरा गौर से देखिए. क्या दिख रहा है . बेहद पुरानी छोटी सी जीप . जीप के ऊपर फिट किया गया गननुमा एक हथियार . जीप की बॉडी पर जहां -तहां चिपके होने के निशान. और कुछ ? शायद नहीं. आज 70 वां भारतीय सेना दिवस है और भारतीय सेना की वीरगाथा, पराक्रम और हौसले से इस जीप गहरा रिश्ता है . तो मैंने सोचा कि क्यों न आपको इस जीप और इस जीप के सवार की कहानी ही सुनाऊं . ये कहानी आपमें से ज्यादातर लोग जानते भी होंगे. एक बार फिर सही .

ये एक ऐतिहासिक 'गन माउंटेड जीप' है, जिस पर सवार होकर भारतीय सेना के एक जांबाज ने पाकिस्तान के छक्के छुड़ा दिए थे. अमेरिकी पैटन टैंको के दम पर हमारी सरहदों में घुस आई पाकिस्तानी सेना के नापाक इरादों को इस जीप पर सवार एक वीर सिपाही ने मिट्टी में मिला दिया था. उनके टैंकों को यूं उड़ा दिया था, जैसे टैंक न हों , तेलों से भरे ट्रक हों .
बात 1965 की है . कहानी भारत के वीर अब्दुल हमीद की है. वही वीर अब्दुल हमीद जिन्हें उनकी वीरता के लिए परमवीर चक्र से नवाजा गया . वही अब्दुल हमीद , जिनकी वीरता के सामने अमेरिकी टैंकों की आड़ में बढ़े चले आ रहे पाकिस्तानियों के परखच्चे उड़ गए. कहां अमेरिटी पैटन टैंक और कहां पुराने मॉडल की ये एंटी टैंक गन वाली ये मामूली जीप. इसी जीप पर सवार होकर अब्दुल हमीद ने तीन दिनों से पाकिस्तानियों को नाकों चने चबबा दिए. तीन दिनों में एक -दो नहीं, सात टैंकों को पटाखों की तरह उड़ा दिया था. भारत से शिकस्त खाने के बाद पाकिस्तान तो अपने दड़बे में लौट गया लेकिन अमेरिकी सालों तक इस जीप को सामने रखकर अपने पैटन टैंक की कमजोरी पर रिसर्च करते रहे.
यूपी के गाजीपुर के छोटे से मुस्लिम बहुल गांव के रहने वाले अब्दुल हमीद 1954 में सेना में भर्ती हुए थे . उनके परिवार के लोग दर्जी का काम करते थे लेकिन उनके पिता उस्मान ग्रेनेडियर में जवान थे. अब्दुल भी पिता की राह पर चलते हुए सेना में भर्ती हुए. शुरुआती तैनाती कश्मीर में हुई. उनके भीतर शुरु से ये बात जमी थी कि सेना में नाम और इज्जत उसी का होता है , जिसके पास मैडल होता है. जिसकी बहादुरी के किस्से होते हैं . तभी उन्हें जब भी दुश्मनों के खिलाफ किसी भी मोर्चे पर मौका मिलता. वो जांबाजी की मिसालें कायम करने का मौका नहीं छोड़ते थे .

1965 में जब पाकिस्तान ने भारत के खेमकरण सेक्टर पर हमला बोला तब अब्दुल हमीद को जंग के मोर्चे पर अपनी जांबादी दिखाने का मौका मिला और वो इतिहास में हमेशा के लिए अमर हो गए . इस मोर्चे में जाने से पहले वीर हमीद ने अपने भाई के नाम एक ख़त लिखा और उस ख़त में उन्होंने लिखा. ' पल्टन में उनकी बहुत इज्जत होती है जिन के पास कोई चक्र होता है. देखना झुन्नन हम जंग में लड़कर कोई न कोई चक्र जरूर लेकर लौटेंगे ' अब्दुल हमीद की वीरता और उनकी जिंदगी पर काम करने वाली रचना बिष्ट रावत के मुताबिक ' 1965 का युद्ध शुरू होने के आसार बन रहे थे. कंपनी क्वार्टर मास्टर अब्दुल हमीद गाज़ीपुर ज़िले के अपने गाँव धामूपुर आए हुए थे. अचानक उन्हें वापस ड्यूटी पर आने का आदेश मिला.

उनकी पत्नी रसूलन बीबी ने उन्हें कुछ दिन और रोकने की कोशिश की लेकिन हमीद मुस्कराते हुए बोले- देश के लिए उन्हें जाना ही होगा. अब्दुल हमीद के बेटे जुनैद आलम ने बताया कि जब वो अपने बिस्तरबंद को बांधने की कोशिश कर रहे थे, तभी उनकी रस्सी टूट गई और सारा सामान ज़मीन पर फैल गया. उसमें रसूलन बीबी का लाया हुआ मफ़लर भी था जो वो उनके लिए एक मेले से लाईं थीं. रसूलन ने कहा कि ये अपशगुन है. इसलिए वो कम से कम उस दिन यात्रा न करें, लेकिन हमीद ने उनकी एक नहीं सुनी.इतना ही नहीं
जब वो स्टेशन जा रहे थे तो उनकी साइकिल की चेन टूट गई और उनके साथ जा रहे उनके दोस्त ने भी उन्हें नहीं जाने की सलाह दी. लेकिन हमीद ने उनकी भी बात नहीं सुनी. जब वो स्टेशन पहुंचे, उनकी ट्रेन भी छूट गई थी. उन्होंने अपने साथ गए सभी लोगों को वापस घर भेजा और देर रात जाने वाली ट्रेन से पंजाब के लिए रवाना हुए. ये उनकी और उनके परिवार वालों और दोस्तों के बीच आख़िरी मुलाक़ात थी.' बीबीसी को दिए इंटरव्यू में रचना बिष्ट ने रसूलन बीबी और उनके बेटे के हवाले से पूरी कहानी सुनाई थी .
घर वालों के न चाहने के बावजूद अब्दुल हमीद मोर्चे पर पहुंचे क्योंकि उन्हें तो दुश्मनों के छक्के छुड़ाने थे. वीरता के इतिहास में दर्ज होना था .
10 सितंबर तक हमीद पाकिस्तान के 7 पैटन टैंक नेस्तनाबूद कर चुके थे. पाकिस्तान से हम असल उत्तर के मैदान में भिड़ रहे थे. वह हमें कुचल कर आगे निकलने की कोशिश में था. दरअसल उसका इरादा अमृतसर पर कब्जे का था, लेकिन तीन दिन से हम उसे रोके हुए थे और आगे नहीं बढ़ने दे रहे थे. मैं उस आरसीएल जीप का ड्राइवर था. 10 सितंबर की सुबह 7 बजे ही आमने-सामने फायरिंग शुरू हो गई. पर हमें समझ नहीं आ रहा था कि फायर कहां से आ रहा है.
हमीद मुझे बोले कि नसीम, मुझे लग रहा है कि दुश्मन को हमारी पोजिशन का पता चल गया है . तुम तैयार रहना, हमें पोजिशन बदलनी होगी . हम तैयारी में जुट गए . कुछ ही देर बाद हमारी जीप पर टैंक का ट्रेसर राउंड आकर लगा . मैंने हमीद को कहा-जीप से उतर जाओ, दुश्मन को हमारी पोज़िशन का पता चल गया है . वह कभी भी गोला दाग सकता है . इतने मे बाकी साथी जीप से उतर गए, लेकिन हमीद नहीं उतरे , वह गन को लोड करने में लग गए . मैंने हमीद को कंधे से खींचा और कहा जिद मत करो उतर जाओ. पर हमीद नहीं माने '
हुआ वही जिसकी आशंका थी . एक गोला हमीद की जीप पर गिरा और फिर इस जांबाज को अपनी जान गंवानी पड़ी . हमीद इस दुनिया में नहीं रहे लेकिन उन्होंने अपनी वीरता की ऐसी कहानी छोड़ दी , जो भारत के लिए हमेशा गर्व और गौरव की प्रतीक है . उस लड़ाई में पाक की हार हुई . हमीद मर कर भी जीत गए . भारतीय सेना की कहानी ऐसे ही जांबाजों की कहानी है . चाहे वो हमीद हों या विक्रम वत्रा . 21 परमवीर, हजारों जांबाज , लाखों वीर जवान के जोश और शौर्य से बनी है भारतीय सेना . आज सेना दिवस पर हम ऐसे ही वीरों का नमन करते हैं .

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