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तोगड़िया प्रकरण पर विहिप , बीजेपी और संघ परिवार खामोश क्यों?

पीएम नरेंद्र मोदी से प्रवीण तोगड़िया की अदावत लंबे समय से चली आ रही है और जगजाहिर है।

 शिव कुमार मिश्र |  2018-01-17 07:43:10.0  |  दिल्ली

तोगड़िया प्रकरण पर विहिप , बीजेपी और संघ परिवार खामोश क्यों?

पीएम नरेंद्र मोदी का राष्ट्रीय राजनीति में ज्वार आने के बाद से वयोवृद्ध आडवाणी समेत कई दिग्गज मार्गदर्शक (असल में मूकदर्शक) की भूमिका में है ! लेकिन, हिंदूवादी खेमे की ऐसी राजनीति की अंतिम परिणति शायद यह देखना था कि प्रवीण तोगड़िया जैसे खांटी संघी और विहिप के अंतरराष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष प्रवीण तोगड़िया 15 जनवरी को सुबह अचानक लापता हुए और देर रात एक अस्पताल में मिले , 16 जनवरी को मीडिया से बात कर उन्होंने सनसनी फैला दी। उनका कहना था कि राजस्थान पुलिस की 16 टीमें उन्हें मुठभेड़ में मारने के लिए निकली थीं, इसलिए वह खुद अपना फोन स्विच ऑफ कर लापता हो गए थे। खैर, मैं इन तकनीकी पहलुओं की पड़ताल नहीं कर रहा कि वह कब, कहां और कैसे लापता हुए और मिले।

पीएम नरेंद्र मोदी से प्रवीण तोगड़िया की अदावत लंबे समय से चली आ रही है और जगजाहिर है। मोदी के गुजरात का सीएम रहते हुए विकास कार्यों के लिए कुछ मंदिर टूटे थे और इसके विरोध में उन्होंने वीएचपी का आंदोलन खारिज कर दिया था। यह सारी बातें सही हैं और एक ही संगठन में खेमेबाजी की बड़ी वजह हैं। लेकिन, क्या यह खेमेबाजी इतनी बढ़ जानी चाहिए कि सवाल उठाने वाले को आप खलनायक करार दे दें? प्रवीण तोगड़िया जैसे आज हैं, लंबे समय से वैसे ही हैं। डॉक्टरी छोड़ हिंदुत्व की राह में आने वाले तोगड़िया अकसर कहते रहे हैं कि मैं समाज की सर्जरी करने निकला हूं। वह मुसलमानों को देश के लिए समस्या करार देते रहे हैं। उनके तीखे भाषणों को संघी कार्यकर्ता खूब सराहते रहे हैं और उनके फायर ब्रैंड होने की मिसालें देते रहे हैं।
फिर अब अचानक क्या हुआ कि अब उन्हें ऑस्कर के लिए नॉमिनेट कराया जा रहा है? सिर्फ इसलिए कि आज जो सत्ता में हैं, उन्हें तोगड़िया पसंद नहीं हैं? ऐसा तो कल किसी और के साथ भी हो सकता है, क्या उस पर भी ऑस्कर भेजने का तंज कसा जाएगा? यह एक संगठन के गैंग में बदलने का संकेत है, जिसमें सरगना से बगावत का नतीजा 'तपना' ही होता है।
यहां मेरा सवाल वीएचपी, बीजेपी और संघ परिवार का हिस्सा कहे जाने वाले उन तमाम संगठनों से है, जो तोगड़िया प्रकरण पर चुप्पी साधे हुए हैं।
अनिल द्विवेदी की कलम से

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