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आपराधिक न्याय प्रणाली में आवश्यक सुधार की आवश्यकता? किसी भी समाधान के लिए हमें सबसे पहले समस्या को समझना होगा?

किसी भी समाधान के लिए हमें सबसे पहले समस्या को समझना होगा। अपराध रोकने के लिए आपराधिक न्याय प्रणाली में आवश्यक सुधार करने होंगे।

 Sujeet Kumar Gupta |  17 Dec 2019 10:55 AM GMT  |  नई दिल्ली

आपराधिक न्याय प्रणाली में आवश्यक सुधार की आवश्यकता? किसी भी समाधान के लिए हमें सबसे पहले समस्या को समझना होगा?

बीते दिनों हैदराबाद में एक महिला पशु चिकित्सक के साथ हुई दरिंदगी से पूरा देश उबल पड़ा। इस मामले में आरोपितों के पुलिस एनकाउंटर में मारे जाने से एक अलग तरह की बहस भी खड़ी हो गई। इस मामले ने देश में आपराधिक न्याय प्रणाली यानी सीजेएस को लेकर नए सिरे से कुछ सवाल खड़े किए हैं। उन पर विचार करना बेहद जरूरी है। इसमें सबसे पहला पहलू तो पुलिस द्वारा एफआइआर यानी प्राथमिकी दर्ज करने से जुड़ा है। इस पर राष्ट्रीय पुलिस आयोग, मलिमथ समिति, द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग के अलावा टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज के तमाम प्रतिवेदन बेहद महत्वपूर्ण हैं जिन्होंने अलग-अलग अनुशंसा की हैं।

क्राइम रोकने के लिए सबसे पहले प्राथमिकताएं तय करनी होंगी

सबसे पहले तो प्राथमिकताएं तय करनी होंगी। मसलन क्या हमें वही पुरानी परिपाटी कायम रखनी चाहिए कि कोई पुलिस स्टेशन दुष्कर्म और हत्या से लेकर डाटा चोरी जैसे पेचीदा साइबर मामलों और बैंक धोखाधड़ी एवं फर्जी पोंजी योजनाओं जैसे आर्थिक अपराध और तमाम आम घरेलू झगड़ों के मामले में भी वैसी ही कार्रवाई करे। इन सभी मामलों में पहले एफआइआर दर्ज कर फिर उनकी पड़ताल करनी होगी। या फिर तंत्र को इस तरह सुगठित करना होगा कि आम धोखाधड़ी के मामले किसी और विभाग को सौंपे जाएं।

साइबर अपराधों से निपटने के लिए अलग पुलिस स्टेशनों की व्यवस्था

एफआइआर को लेकर हमें यह भी समझना होगा कि पुलिसकर्मियों से लेकर बुनियादी ढांचे के लिहाज से प्रत्येक पुलिस स्टेशन के पास बेहद सीमित संसाधन होते हैं। ऐसे में मामलों की गंभीरता को लेकर उनकी प्राथमिकता तय की जा सकती है। जैसे कई राज्यों ने साइबर अपराधों से निपटने के लिए अलग पुलिस स्टेशनों की व्यवस्था शुरू की है। कुछ ऐसे ही इंतजाम दूसरे आम अपराधों के लिए भी किए जा सकते हैं।

अपराधों से निपटने के लिए कानून में आवश्यक बदलाव जरूरी

आपराधिक प्रवृत्ति वाले कुछ दीवानी मामलों को पुलिस स्टेशन की देहरी तक पहुंचने से रोका जा सकता है। कम से कम उन शहरी पुलिस स्टेशनों तक तो इसे संभव किया जाए जो पहले से ही बहुत ज्यादा काम के बोझ तले दबे हैं। इसकी अनदेखी नहीं कर सकते कि अपराधों से निपटने के लिए प्रतिभा, नए तौर-तरीकों, वित्तीय एवं मानव संसाधन की आवश्यकता होती है। इसमें आंतरिक टकराव न हों, उसे टालने के लिए कानून में आवश्यक बदलाव करने होंगे।

संज्ञेय अपराध दर्ज कराने के लिए 'एफआइआर मेला'

भारत में एफआइआर का बहुत महत्व है। अगर किसी का नाम किसी कारण से एफआइआर में आ जाए तो वह व्यक्ति आपराधिक इतिहास के दायरे में आ जाता है। इस कारण भविष्य में पासपोर्ट बनवाने, हथियार लाइसेंस लेने या किसी अन्य मकसद के लिए जब भी उसके पुलिस रिकॉर्ड की जरूरत होगी तब-तब वह एफआइआर उसका पीछा करेगी। वर्ष 2007 में मेरी तैनाती बतौर पुलिस अधीक्षक बाराबंकी में थी। वहां मैंने सभी संज्ञेय अपराध दर्ज कराने को प्रोत्साहन देने के लिए 'एफआइआर मेला' शुरू किया। इससे कुछ ही दिनों में सैकड़ों एफआइआर दर्ज हो गईं।

गौतमबुद्ध नगर जिले में डायल एफआइआर मॉडल की शुरुआत

एक एफआइआर में मध्य प्रदेश के एक वरिष्ठ आइएएस अधिकारी का नाम भी आया। असल में गांव में उनके भाई का एक पड़ोसी से विवाद था और जैसा कि अधिकांश भारतीय गांवों में परंपरा है कि किसी विवाद में संबंधित व्यक्ति के पूरे परिवार को घसीट लिया जाता है वही इस मामले भी हुआ जबकि वह आइएएस अधिकारी काफी अरसे से अपने गांव ही नहीं गए थे। मैंने किसी तरह उनका नाम एफआइआर से हटवाया। यदि निर्बाध रूप से एफआइआर की व्यवस्था करनी है तो उससे पहले इन विसंगतियों को दूर करना होगा। इसी कड़ी में हमने उत्तर प्रदेश के गौतमबुद्ध नगर जिले में डायल एफआइआर मॉडल की शुरुआत की है जिसे काफी सफलता भी मिल रही है।

एफआइआर के मोर्चे पर न्यायिक हस्तक्षेप की दरकार

सीजेएस में सुधार की पहली कड़ी एफआइआर के मोर्चे पर न्यायिक हस्तक्षेप की दरकार होगी ताकि पुलिस अपने लिए सही लक्ष्य तय कर सके। दूसरी कड़ी जांच की गुणवत्ता से जुड़ी है। सभी राज्यों में जांच मुख्य रूप से इकबालिया बयानों पर अधिक और साक्ष्यों पर कम आधारित होती है। आदर्श रूप में जांच साक्ष्यों पर आधारित हो जिसके लिए आधुनिक फोरेंसिक लैब जैसे बुनियादी ढांचे और पर्याप्त वित्तीय संसाधनों की दरकार होगी। तीसरी कड़ी अभियोजन पक्ष को व्यापक रूप से सुधारने से जुड़ी है। निचली, सत्र अदालतों में अभियोजन अधिकारियों की गुणवत्ता गंभीर चिंता का विषय है। कुछ राज्यों में तो ये राजनीतिक नियुक्तियां बन गई हैं। उनके प्रदर्शन को आंकने की प्रणाली भी दोषपूर्ण है।

न्यायिक प्रक्रियाओं को शीघ्रता से निपटाना होगा

सीजेएस में सुधार की चौथी कड़ी के तहत विभिन्न न्यायिक प्रक्रियाओं को कानून में जरूरी बदलावों के अनुसार शीघ्रता से निपटाना होगा। किसी मामले में जांच पूरी होने और आरोपपत्र दाखिल होने के बाद भी संबंधित न्यायालय में सभी आरोपियों के खिलाफ आरोप तय करने में कई साल लग जाते हैं। आरोप तय करना ही मुकदमे का पहला पड़ाव होता है। इस तरह कुछ साल दोषसिद्धि पर चर्चा के बजाय आरोप तय करने में ही निकल जाते हैं। इसमें निचली अदालतें और असंवेदनशील नजर आती हैं जो जांच अधिकारियों की अनदेखी कर महिलाओं से जुड़े अपराधों में बयान दर्ज कराने में ही कई दिन लगा देती हैं। उनमें भ्रष्टाचार भी गंभीर चिंता का विषय है।

जमानत रद करने की पूरी प्रक्रिया को दुरुस्त करना होगा

इस कड़ी में पांचवां पेच जमानत रद करने की पूरी प्रक्रिया को दुरुस्त करने से जुड़ा है। क्या इसे तय करने का अधिकार जिला पुलिस अधीक्षक को दिया जा सकता है और क्या जमानत रद करने के मामले में सरकारी वकील अदालतों में उसकी ओर से पैरवी कर सकते हैं? यह बहुत ही लिखापढ़ी और लंबी खिंचने वाली प्रक्रिया है। इन दिनों अदालतों द्वारा अग्रिम जमानत या गिरफ्तारी पर रोक जैसा चलन भी बेहद आम है, लेकिन क्या इन मामलों में पुलिस समय से और प्रभावी अपील कर सकती है? वास्तव में आदतन अपराधियों से निपटने में अभियोजन के पास कोई रणनीति नहीं होती। वे बार-बार अपराध करते हैं, लेकिन उन्हें पूर्व में मिली जमानत खारिज नहीं होती। आपराधिक न्याय प्रणाली को सुधारने की छठी कड़ी का संबंध दीवानी न्याय प्रणाली में समांतर सुधारों से जुड़ा है। असल में अपराध रोकना दोनों का साझा दायित्व है।

अपराध रोकने के लिए आपराधिक न्याय प्रणाली में आवश्यक सुधार करने होंगे

किसी भी समाधान के लिए हमें सबसे पहले समस्या को समझना होगा। अपराध रोकने के लिए आपराधिक न्याय प्रणाली में आवश्यक सुधार करने होंगे। पुलिस इसका विकल्प नहीं है। आपराधिक न्याय प्रणाली की किसी एक कड़ी को दुरुस्त करने से काम नहीं चलेगा। इसमें व्यापक सुधारों से ही बात बनेगी।

वैभव कृष्ण, लेखक भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी हैं।

जागरण से साभार

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