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स्वामी विवेकानंद को गुरुभाई पर गुस्सा आया तो अमृत की तरह पी गये वो घुट... जिसे हम मरते दम तक नही पी सकते

ईश्वर को पाने की ललक और उनको जानने की इच्छा में नरेंद्रनाथ अध्यापक और माता-पिता से ऐसे-ऐसे सवाल पूछते थे कि सभी उनकी बातों से निरुत्तर हो जाते थे।

 Sujeet Kumar Gupta |  12 Jan 2020 6:44 AM GMT  |  नई दिल्ली

स्वामी विवेकानंद को गुरुभाई पर गुस्सा आया तो अमृत की तरह पी गये वो घुट... जिसे हम मरते दम तक नही पी सकते

स्वामी विवेकानंद एक महान हिन्दू संत और नेता थे, जिन्होंने रामकृष्ण मिशन और रामकृष्ण मठ की स्थापना की थी। हम उनके जन्मदिन पर प्रत्येक वर्ष 12 जनवरी को राष्ट्रीय युवा दिवस मनाते हैं। वह आध्यात्मिक विचारों वाले अद्भूत बच्चे थे। इनकी शिक्षा अनियमित थी, लेकिन इन्होंने स्कॉटिश चर्च कॉलेज से बीए की डिग्री पूरी की। श्री रामकृष्ण से मिलने के बाद इनका धार्मिक और संत का जीवन शुरु हुआ और उन्हें अपना गुरु बना लिया। इसके बाद इन्होंने वेदांत आन्दोलन का नेतृत्व किया और भारतीय हिन्दू धर्म के दर्शन से पश्चिमी देशों को परिचित कराया।

विवेकानंद की माता भुवनेश्वरी देवी एक धार्मिक महिला थी और उनका अधिकांश समय भगवान शिव की पूजा में बीतता था। माता और परिवार के धार्मिक और प्रगतिवादी सोच ने ही उनके अंदर इस तरह के व्यक्तित्व को जन्म दिया था। बचपन में नरेंद्रनाथ बड़े ही नटखट किस्म के थे। ईश्वर को पाने की ललक और उनको जानने की इच्छा में नरेंद्रनाथ अध्यापक और माता-पिता से ऐसे-ऐसे सवाल पूछते थे कि सभी उनकी बातों से निरुत्तर हो जाते थे।

नौ भाई बहनों में से एक नरेंद्रनाथ दत्त की स्कूली शिक्षा ईश्वर चंद्र विद्यासागर मेट्रोपोलिटन इंस्टीट्यूट में हुई थी। आठ वर्ष की उम्र से स्कूल जाना शुरू करने वाले विवेकानंद ने कलकत्ता से रायपुर जाने से पहले तक इसी विद्यालय में शिक्षा पूरी की थी। विवेकानंद महान विचारों के स्वामी थे। उनका स्वप्न था कि एक समाज ऐसा बने जिसमें धर्म या जाति के आधार पर मनुष्यों में कोई भेद न रहे।

ईश्वर प्रेम : स्वामी जी की बुद्धि बचपन से ही बहुत तेज थी और परमात्मा को पाने की इच्छा भी उनके मन में बहुत प्रबल थी। इसी वजह से वे सबसे पहले ब्राह्मण समाज में गए थे लेकिन वहाँ पर उनके मन को संतोष नहीं हुआ। स्वामी जी ने उच्च कोटि की शिक्षा प्राप्त की थी। सन् 1884 में पिता जी के निधन के बाद उन्हें संसार से अरुचि पैदा हो गयी थी। स्वामी जी ने रामकृष्ण परमहंस से दीक्षा ले सन्यासी बनने की इच्छा प्रकट की।

परमहंस जी ने उन्हें समझाया था कि सन्यास का सच्चा उद्देश्य मानव सेवा करना होता है। मानव सेवा से ही जीवन में मुक्ति मिल सकती है। परमहंस ने उन्हें दीक्षा दे दी और उनका नाम विवेकानंद रख दिया था। सन्यास लेने के बाद उन्होंने सभी धर्मों के ग्रंथों का गहन अध्ययन करना शुरू कर दिया था। श्री रामकृष्ण के पैरों पर बैठकर उन्होंने गुणों को विकसित किया और उच्चतम आध्यात्मिक प्राप्ति के आदमी बन गए थे। स्वामी विवेकानंद जी अपना जीवन अपने गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस जी को अर्पित कर चुके थे।

जब गुरु देव के शरीर त्याग के दिन निकट थे तो अपने घर और कुटुम्ब की नाजुक हालत की और खुद के भोजन की परवाह न करते हुए गुरु की सेवा में हमेशा हाजिर रहे। गुरूजी का शरीर बहुत कमजोर हो गया था। कैंसर की वजह से गले से थूक, रक्त, कफ निकलता था जिसकी सफाई का स्वामी जी बहुत अधिक ध्यान रखते थे। एक बार किसी ने गुरु देव की सेवा में नफरत और लापरवाही दिखाई और नफरत से नाक भौहें सिकोडी। यह सब कुछ देखकर स्वामी जी को गुस्सा आ गया।

स्वामी जी ने उस गुरुभाई को पाठ पढ़ाते हुए और गुरुदेव की प्रत्येक वस्तु के प्रति प्रेम दर्शाते हुए उनके सिराने पर रखी रक्त और कफ की पूरी थूकदानी को पी गये थे। गुरु के प्रति ऐसी अनन्य भक्ति और निष्ठा के प्रताप से ही उन्होंने अपने शरीर और उनके आदर्शों की उत्तम सेवा की थी।

व्यक्तित्व : पिता जी की मृत्यु के बाद घर का सारा भार स्वामी जी के कंधों पर आ गया। उस समय घर की दशा बहुत खराब थी। लेकिन कुशल यही था कि स्वामी जी का विवाह नहीं हुआ था। बहुत अधिक गरीबी में भी स्वामी जी बड़े अथिति सेवी थे। स्वामी जी खुद भूखे रहकर अथिति को भोजन कराते थे और खुद बाहर वर्षा में भीगते रहते थे और अथिति को सोने के लिए अपना बिस्तर दे देते थे। स्वामी जी ने अपने चरित्र का भवन आध्यात्मिकता की चट्टान की बुनियाद पर बनाया था।

जो कि बुद्धिमता और क्षीण दिल के सशक्त व्यक्तित्व में अभिव्यक्ति प्राप्त करता था। कोई भी व्यक्ति इस बिंदु पर बल देने में मदद नहीं कर सकता क्योंकि स्वामी जी के कई व्यक्तित्व थे और वे विभिन्न रंगों में प्रकट हो सकते थे।वेदों में जड़ें और वहां से पौष्टिकता पैदा करने से इस प्रकार के पुरुषों और महिलाओं के व्यक्तित्व और काम कुछ आकर्षक लगने लगते हैं और उनके पास एक स्थाई चरित्र होता है। स्वामी जी ने आत्मिक प्राप्ति के सागर में गहराई से डुबकी लगाई थी, स्वामी जी ने उसी संदेश को नहीं दिया था बल्कि एक ही रूप में संदेश दिया था जैसा कि पश्चिम को दिया था।

स्वामी जी ने लोगों की जरूरतों के अनुरूप अपने संदेशों को अलग किया लेकिन इन सभी रूपों में एक केंद्रीय विषय की अभिव्यक्ति होती है और वह है आध्यात्मिकता। स्वामी जी अपने आप को गरीबों का सेवक कहते थे। स्वामी जी का स्वरूप बड़ा ही सुंदर और भव्य था। स्वामी जी का शरीर गठा हुआ था। उनके मुखमंडल पर तेज था। उनका स्वभाव अति सरल और व्यवहार अति विनम्र था।

स्वामी विवेकानंद के गुरु कौन थे

स्वामी विवेकानंद सच बोलने वाले, अच्छे विद्वान होने के साथ ही एक अच्छे खिलाड़ी भी थे। वह बचपन से ही धार्मिक प्रकृति वाले थे और परमेश्वर की प्राप्ति के लिए काफी परेशान थे। एक दिन वह श्री रामकृष्ण (दक्षिणेश्वर काली मंदिर के पुजारी) से मिले, तब उनके अंदर श्री रामकृष्ण के आध्यात्मिक प्रभाव के कारण बदलाव आया। श्री रामकृष्ण को अपना आध्यात्मिक गुरु मानने के बाद वह स्वामी विवेकानंद कहे जाने लगे।

वास्तव में स्वामी विवेकानंद एक सच्चे गुरुभक्त भी थे क्योंकि तमाम प्रसिद्धि पाने के बाद भी उन्होंने सदैव अपने गुरु को याद रखा और रामकृष्ण मिशन की स्थापना करते हुए, अपने गुरु का नाम रोशन किया।

स्वामी विवेकानंद का शिकागो भाषण

जब भी स्वामी विवेकानंद के विषय में बात होती है, तो उनके शिकागों भाषण के विषय में चर्चा जरुर की जाती है क्योंकि यही वह क्षण था। जब स्वामी विवेकानंद ने अपने ज्ञान तथा शब्दों द्वारा पूरे विश्व भर में हिंदु धर्म के विषय में लोगो का नजरिया बदलते हुए, लोगो को अध्यात्म तथा वेदांत से परिचित कराया। अपने इस भाषण में उन्होंने विश्व भर को भारत के अतिथि देवो भवः, सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकार्यता के विषय से परिचित कराया।

उन्होंने बताया की जिस तरह भिन्न-भिन्न नदियां अंत में समुद्र में ही मिलती हैं, उसी प्रकार विश्व के सभी धर्म अंत में ईश्वर तक ही पहुंचाते हैं और समाज में फैली कट्टरता तथा सांप्रदायिकता को रोकने के लिए, हम सबको आगे आना होगा क्योंकि बिना सौहार्द तथा भाईचारे के विश्व तथा मानवता का पूर्ण विकास संभव नही है।

देशवासियों को पत्र : जब स्वामी जी 25 वर्ष के थे तो उन्होंने गेरुआ रंग के वस्त्र पहन लिए इसके बाद उन्होंने पैदल ही पूरे भारतवर्ष की यात्रा की थी। स्वामी जी ने जापान में अपने देशवासियों के नाम पत्र लिखा था। उस पत्र में स्वामी जी ने लिखा था कि तुम बातें बहुत करते हो लेकिन करते कुछ नहीं हो। उन्होंने उदाहरण के तौर पर कहा जापानवासियों को देखो इससे तुम सभी की आँखें खुल जाएँगी। उठो जागो और रुढियों के बंधन को काट दो। तुम्हारा जीवन सिर्फ सम्पत्ति कमाने के लिए नहीं बल्कि देश प्रेम की बलिदेवी पर समर्पित करने के लिए है।

संदेश : भारतीय संदर्भ में उन्होंने देखा था कि आध्यात्मिकता का मार्ग भौतिक और सामाजिक उन्नति के माध्यम से होता है। इस समाप्ति के लिए स्वामी जी वेदांत को एक सामाजिक दर्शन और दृष्टिकोण, एक बार गतिशील और व्यवहारिक रूप से आकर्षित करते थे। भारत के लिए स्वामी जी ने मानव-निर्मित धर्म का संदेश दिया और राष्ट्र का विश्वास तथा संकल्प लिया।

प्यार और करुणा : जब स्वामी जी को पराने भारत की महिमा पर गर्व महसूस हुआ तो वे उसे अवन्ती और दुर्भाग्य की गहराई में देखने के लिए गंभीर रूप से पीड़ित थे। अपने देशवासियों के प्रति प्रेम, उनकी उम्र में पुरानी भुखमरी, अज्ञानता और सामाजिक विकलांगों के दुःख उन्हें बहुत गहराई में ले गये।

इस स्थिति के साथ सामना करने के लिए उनकी सारी मात्रा में आध्यात्मिकता और गतिशील दर्शन होने चाहिए। आध्यात्मिकता और गतिशील दर्शन में करुणा और प्रेम के प्रवाह में प्रलोभन और सेवा के एक राष्ट्रिय संदेश के रूप में पहुंचे थे। वेदांत एक बार फिर गतिशील और व्यवहारिक बन गया। यह स्वामी जी को सिर्फ एक महान ऋषि नहीं बनाता है बल्कि एक देशभक्त और युगनिर्माता भी बनाता है।

समाजिक जागरूकता : स्वमी जी के द्वारा राष्ट्रिय जागरूकता की एक लहर बही थी। स्वामी जी के द्वारा देशप्रेम और आम आदमी के बहुत से सुधार करने के लिए एक महान संघर्ष जारी रखा था। हमने जो भी राजनीतिक स्वतंत्रता के माध्यम से प्राप्त किया है वह सामाजिक जागरूकता के माध्यम से और राष्ट्रिय एकता के रूप में स्वामी जी द्वारा दिए गये भारत की आध्यात्मिकता के प्राचीन संदेश की ओर उन्मुखीकरण से आया है।

स्वामी जी मृत्यु : बहुत ज्यादा परिश्रम की वजह से स्वामी जी का स्वास्थ्य गिरने लगा था। 4 जुलाई, 1902 में स्वामी जी की मृत्यु हो गयी थी। स्वामी जी ने जीवन के थोड़े से समय में यह कमाल कर दिखाया था जिसे लंबा जीवन होने के बाद भी लोग नहीं कर पाते हैं। स्वामी विवेकानंद जी महामानव के रूप में अवतरित हुए। स्वामी जी ने प्रचार-प्रसार में जो भूमिका प्रस्तुत की है वह अतुलनीय है। स्वामी विवेकानंद जी ने अपने स्पर्श के साथ दुनिया में एक गतिशील विश्व प्रेमी के रूप में गये थे।

भारत के गौरव को देश-देशांतरों में उज्ज्वल करने के लिए उन्होंने हमेशा प्रयास किया था।स्वामी जी के कार्य आज भी आदर्श और प्रेरणा के स्त्रोत हैं। कन्याकुमारी में समुद्र के बीच बना विवेकानंद स्मारक इनकी स्मृति को संजोकर रखे हुए है। स्वामी जी ज्ञान की एक ऐसी मसाल प्रज्ज्वलित कर गये जो संसार को सदैव ही आलौकित करती रहेगी।














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