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मेरे हाथों में नौ -नौ चूड़ियां गीत पर कमाल का नृत्य कर लोकप्रिय बनी सिनेमा की चांदनी श्रीदेवी

सिनेमा जगत की चांदनी श्रीदेवी की जयंती है। तमिल फिल्मों से कैरियर की शुरुआत कर हिंदी फिल्मों के लाखों दर्शकों के दिलों पर राज करने वाली पद्मश्री श्रीदेवी असमय ही अलविदा कह गई।पेश है वरिष्ठ पत्रकार नवीन शर्माका श्रीदेवी की जिंदगी के सफर पर खास रिपोर्ट......

 Special Coverage News |  13 Aug 2019 2:02 PM GMT  |  दिल्ली

मेरे हाथों में नौ -नौ चूड़ियां गीत पर कमाल का नृत्य  कर लोकप्रिय बनी सिनेमा की चांदनी श्रीदेवी

नवीन शर्मा

मुझे श्रीदेवी चांदनी फिल्में में पहली बार पसंद आईं। यश चोपड़ा की इस सुपरहिट फिल्म में श्रीदेवी कमाल की लगी हैं। शोख व चंचल चांदनी का सौंदर्य सम्मोहित करनेवाला था। इसमें श्रीदेवी की बच्ची जैसी आवाज में गाया गीत चांदनी ओ मेरी चांदनी जबरदस्त हिट रहा था। मेरे हाथों में नौ नौ चूड़ियां गीत पर कमाल का नृत्य किया था। यह गीत विवाह समारोह का अनिवार्य गीत बन गया।

.....ये लम्हें ये पल हम

चांदनी के बाद यश चोपड़ा ने श्रीदेवी और अनिल कपूर को लेकर लम्हे फिल्म बनाई थी। ये फिल्म फ्लाप हुई थी पर मुझे पसंद आई। इसकी कहानी थोड़ी अलग किस्म की थी जो लोगों के गले नहीं उतरी। श्रीदेवी और अनिल कपूर दोनों ने इसमें बेहतरीन अभिनय किया था। श्रीदेवी का मां और बेटी का डबल रोल था।




ऐ जिंदगी गले लगा ले

श्रीदेवी ने दर्जनों हिट फिल्में दी हैंं पर अभिनय के लिहाज से उनकी सबसे अच्छी फिल्म कमल हासन के साथ सदमा थी। इसमें उन्होंने मंदबुद्धी युवती की भूमिका विश्वसनीय ढंग से निभाई थी। श्रीदेवी की बड़ी बड़ी बोलती आंखों और बच्चों सी मासूमियत ने सदमा को उनकी सबसे बेहतरीन फिल्म बना दिया था। इसका एक गीत ऐ जिंदगी गले लगा ले मुझे बेहद पसंद है पर श्रीदेवी को तो मौत ने ही गले लगा लिया।

बोनी कपूर की फिल्म मिस्टर इंडिया में भी श्रीदेवी जंची थीं।

इंग्लिश विंग्लिश

जुदाई फिल्म के बाद श्रीदेवी ने 15 साल ब्रेक लेकर बच्चों की देखभाल की। बच्चे थोड़े बड़े हुए तो श्रीदेवी ने अभिनय यात्रा की दूसरी पारी इंग्लिश विंग्लिश से शुरु की । ये बहुत अच्छी फिल्म थी। श्रीदेवी ने मच्योर अभिनय किया था। इस फिल्म को आस्कर के लिए नामांकित किया गया था।




मॉम

इससे उम्मीद बंधी की अब उनकी और भी अच्छी फिल्में देखने को मिलेंगे। उन्होंने निराश नहीं किया और मॉम जैसी लाजवाब फिल्म अंतिम तोहफे के रूप में दी। इसमें उनकी सौतेली बेटी से दुष्कर्म के बाद आत्महत्या कर लेती है। इस पर एक साधारण शिक्षिका का दोषियों से बदला लेनेवाली मां के रोल को उन्होंने यादगार बना दिया।एकदम सधा हुआ संवेदनशील अभिनय निभा कर वे दर्शकों के दिल पर हमेशा के लिए राज करने के लिए इस दुनिया को असमय ही अलविदा कह गई ।


जीवन -यात्रा

श्रीदेवी का जन्म 13 अगस्त 1963 को तमिलनाडु में हुआ था। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत महज चार साल की उम्र में एक तमिल फिल्म कंधन करुणई से कर दी थी। उन्होंने बाल कलाकार के रूप में तेलुगू और मलयालम फिल्मों में भी अभिनय किया था। दक्षिण भारतीय फ़िल्मों में काम करने के बाद श्रीदेवी ने साल 1979 में बतौर मुख्य कलाकार फ़िल्म 'सोलहवां साल' से अपने हिंदी फ़िल्म करियर की शुरुआत की।




80 का दशक हिंदी फ़िल्मों में हीरोइनों के लिहाज़ से श्रीदेवी का दशक कहा गया। जीतेंद्र और श्रीदेवी ने मिलकर एक के बाद एक करीब आधा दर्जन सुपरहिट जैसे हिम्मतवाला, तोहफ़ा, जस्टिस चौधरी और मवाली जैसी फ़िल्में दीं। चालबाज, नगीना, मिस्टर इंडिया जैसी कई हिट फिल्मों में काम किया।

श्रीदेवी ने फ़िल्मों में लंबी पारी खेली और 'मॉम' उनकी 300वीं फ़िल्म थी। छह बार उन्हें फिल्म फेयर अवार्ड मिला।मॉम के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार दिया गया। फ़िल्मों को उनके योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री से नवाज़ा गया था।

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