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जीवटता से तुम जीतते चले गए सुशांत, लेकिन इमोशन ने हरा दिया

यानी 50 सपने में से 17 पूरे हुए। हालांकि, उस दौरान कई ऐसे ट्वीट भी हैं जो सुशांत को मनोभाव को बताने के लिए काफी है।

जीवटता से तुम जीतते चले गए सुशांत, लेकिन इमोशन ने हरा दिया
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आलोक सिंह

सुशांत सिंह का जाना आज मुझे काफी लंबे अर्से के बाद अंदर तक झकझोरा है। समझ नहीं पा रहा हूं कि आखिर क्यों और कैसे सपने देखने वाला, सपने की बात खुली आंखों से करने वाला और सपने को हकीकत में बदलने के लिए जीतोड़ मेहनत करने वाला लड़का जीवन से ही हार गया। अपने सवाल का जवाब तलाशने के लिए दिल्ली सहित मुंबई में कई दोस्तों को कॉल किया। मुंबई में एक दोस्त जो बॉलीवुड को लंबे समय से कवर करता आ रहा है उसने बताया कि बिहार, पूर्वी यूपी से आने वाले लोग जीवटता से अपना झंडा बॉलीवुड से लेकर हर क्षेत्र में गार तो देते हैं लेकिन इमोशन पर काबू नहीं कर पाते हैं। बिहार के पूर्णिया जिले से पटना, फिर दिल्ली का सफर और अंत में मयानगरी में परचम लहराने वाला सुशांत सिंह उसी इमोशन का शिकाएहुए हैं।

उससे बात करने के बाद लगा कि बात में दम हैं तो अपने तरीके से इंटरनेट पर सुशांत से जुड़ी जानकारी जुटाने लगा। ट्विटर प्रोफाइल पर गया तो एक चीज चौकाने वाली दिखी कि 2020 में सुशांत ने एक भी ट्वीट नहीं किया है। ट्विटर पर सुशांत का अंतिम ट्वीट 27 दिसंबर, 2019 का है। उसके बाद सुशांत के किए गए कई #ट्वीट को खंगला तो पता चला कि उसने अपने सपने की पूरी 50 सूची बना रखी थी। जो सपने पूरे होते उसके बाद वह अपनी खुशी को इजहार कुछ इस तरह करता है... Dream 17/50। यानी 50 सपने में से 17 पूरे हुए। हालांकि, उस दौरान कई ऐसे ट्वीट भी हैं जो सुशांत को मनोभाव को बताने के लिए काफी है।

कई ट्वीट में दुख और आंसू उसके अंदर के इमोशन की बात करते हैं। आखिरी, इंस्ट्राग्राम पोस्ट भी इमोशन की कहानी कहने के लिए काफी है। इसके सबकुछ के बाद सुशांत ने जो किया वह उसे नहीं करना चाहिए था। डिप्रेशन में आज कौन नहीं है लेकिन इसका यह मतलब तो नहीं कि हम अपनी जिंदगी ही खत्म कर लें। अभी, सुशांत की खुदखुशी के बारे में कुछ भी पुख्ता तौर पर कहना सही नहीं होगा लेकिन इस बात से हममें से कोई मुंह मोर नहीं सकता कि गांव और छोटे शहर से महानगर में आए अधिकांश युवा अपने इमोशन पर काबू नहीं पाते हैं। वह इसका खामियाजा पर्सनल और प्रोफेशनल लाइफ में चुकाते हैं। आखिर यह होता क्यों है तो इसका जवाब भी मैं ढूढ़ने की कोशिश किया तो लगा कि माहानगरों की #गगनचुंबी इमारतें में चाकाचौंध, तड़क-भड़क भरी जिंदगी के बीच एक घनघोर अंधेरा और खालीपन है।

इसको भरने वाला न तो गांव या छोटे शहर जैसा चाचा, चाची, मामा-मामी, भाई-बहन का भरा-पूरा परिवार है न ही लंगोटिया दोस्त जिसे हर बात आसानी से साझा किया जा सके। यहां तो दोस्ती भी मतलब और दायरे में सिमटी हैं। यह एक बड़ा खालीपन बना रहा जो आत्महत्या करने पर मजबूर कर रहा है। हाल के दिनों में पूरे परिवार के साथ #अत्महत्या करने की कई खबरें हम सभी ने पढ़ी और देखी है। वक्त बहुत ही विकराल रूप ले रहा है... लिखने को काफी कुछ है लेकिन क्या-क्या लिखूं... बदलो अपने को दोस्तों और खुश रहना सीखो।

Shiv Kumar Mishra
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