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राहुल गाँधी : खिंसियाई बिल्ली खम्बा नोंचे?

हमें यह समझ में नहीं आया कि राहुल के इस्तीफे से लोगों की आत्महत्या का क्या सम्बन्ध है ? जब सोनिया जी ने त्यागपत्र देकर राहुल को कांटो भरा ताज सौंपा तो कितने लोगों ने आत्महत्या की ?

 Special Coverage News |  28 May 2019 6:20 AM GMT  |  दिल्ली

राहुल गाँधी : खिंसियाई बिल्ली खम्बा नोंचे?
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चंडीगढ़ से जग मोहन ठाकन

अभी हाल में कांग्रेस हाई कमान ने कांग्रेस की राष्ट्र स्तर पर करारी हार बारे विचार विमर्श हेतु दिल्ली में मीटिंग की , जिसमे अध्यक्ष राहुल गाँधी ने हार की जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से त्यागपत्र देने की पेशकश भी की . परन्तु जैसा इन मामलों में होता है ,वैसा ही हुआ. "हुआ तो हुआ". किचन कैबिनेट के चाटुकार सदस्यों ने ऐसा राग अलापा कि यदि राहुल ने त्याग पत्र दिया तो देश में अनर्थ हो जाएगा. पार्टी की नैया कैसे चल पायेगी?

लाभ –हानि के एक प्रख्यात जानकार पूर्व वित्त मंत्री पी चिदम्बरम ने तो यहाँ तक कह दिया बताते हैं कि यदि राहुल जी ने इस्तीफा दिया तो लोग आत्महत्या कर लेंगे. ( https://khabar.ndtv.com/news/lok-sabha-elections-2019/p-chidambaram-broke-down-on-rahul-gandhi-offer-to-quit-says-people-may-commit-suicide-2043096).

हमें यह समझ में नहीं आया कि राहुल के इस्तीफे से लोगों की आत्महत्या का क्या सम्बन्ध है ? जब सोनिया जी ने त्यागपत्र देकर राहुल को कांटो भरा ताज सौंपा तो कितने लोगों ने आत्महत्या की ? फिर बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी ? ये बिना किसी कारण के आत्महत्या करने वाले कब तक रुकेंगे ? कभी न कभी तो राहुल को हटना ही पड़ेगा. खैर इस चाटुकार पूर्व मंत्री को राहुल ने कुछ ही देर में आईना भी दिखा दिया, और बता दिया कि उन जैसे लोगों की वजह से ही कांग्रेस की हार हुई है. कुछ हद तक यह भी एक हार का सहायक कारक माना जा सकता है.

राहुल ने स्पष्ट कह दिया कि राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमल नाथ तथा पूर्व वित्त मंत्री चिदम्बरम ने पुत्र मोह में कांग्रेस को हरवा दिया. तो क्या राहुल की इस टिप्पणी के बाद यह मान लिया जाए कि अब चिदम्बरम जैसे लोगों के दिन कांग्रेस से हवा हो गए हैं ? शायद नहीं.

राहुल ने कहा बताते है कि उपरोक्त नेताओं ने अपने पुत्रों को स्थापित करने हेतु पहले तो राहुल पर टिकट के लिय दवाब बनाया, उसके बाद इन नेताओं ने अपना पूरा समय अपने प्रदेश की सभी लोक सभा सीटों पर प्रचार में लगाने की बजाय अपने पुत्रों की सीट पर ही ध्यान केन्द्रित किया, जिसका खामियाजा कांग्रेस को अन्य सीटों पर भुगतना पड़ा. राहुल के इस तर्क में दम नहीं लगता है. पंजाब में कैप्टेन अमरिंदर सिंह ने अपनी पत्नी को टिकट दिलाई और इस सीट को जीतने के साथ साथ पंजाब की तेरह सीट में से आठ पर जीत हासिल की. अगर राहुल को लगता था कि यदि किसी बड़े नेता के फैमिली मेम्बर को टिकट देने से पार्टी को नुक्सान ज्यादा होता है, तो क्यों राहुल ने हरियाणा में पिता –पुत्र (हूड्डा ) दोनों को एक साथ टिकट देकर हारने को बाध्य किया?

क्या राहुल खुद चाहते थे कि पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंदर सिंह हूड्डा को न चाहते हुए भी सोनीपत से चुनाव लड़ने को विवश किया जाए ताकि वो हार जाए और मुख्यमंत्री की दौड़ से बाहर हो जाए ? अगर किसी बड़े नेता के खुद या उसके परिवार के सदस्य के चुनाव लड़ने से इलेक्शन में जीत संदिग्ध होती है तो क्यों राहुल ने खुद दो जगह से तथा अपनी माँ सोनिया को एक अन्य जगह से चुनाव लडवाया? क्यों नहीं इन दोनों ने खुद चुनाव लड़ने की बजाय सारे देश में पूरा ध्यान दिया. परन्तु कहावत है- आप गुरु जी बैंगन खावै, औरन को निर्देश. हाँ इतना अवश्य हुआ कि राहुल के दो जगह से चुनाव लड़ने से पब्लिक में यह संकेत गया कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की कमजोर स्थिति को भांपकर राहुल ने अपनी सेफ जीत के लिए अमेठी के साथ साथ वायनाड से भी चुनाव लड़ा. इस संकेत ने उत्तर प्रदेश में जर्जर हो चुकी कांग्रेस को धराशायी करने का काम भी किया.

राहुल गाँधी को "बूरा खोजन मैं चला- मुझ से बूरा ना कोई" को ध्यान में रखना चाहिये. जब कोई टीम लीडर असफलता के लिए टीम के सदस्यों पर दोषारोपण करने लगता है, तो समझो उसमे नेतृत्व देने के गुणों का अभाव है और वो नेता अपनी कमी को छिपाने के लिए टीम को दोषी ठहराता है. अगर प्रान्त स्तर पर अशोक गहलोत या कमल नाथ की वजह से हार हुई है, तो राहुल गाँधी का यह तर्क वास्तविकता से मुंह मोड़कर केवल अपना मन बहलाने वाला है. वास्तविकता तो यह है जब विधान सभा के चुनाव हुए तो राजस्थान में गहलोत को तथा मध्य प्रदेश में कमल नाथ को मुख्यमंत्री का दावेदार प्रस्तुत कर चुनाव लड़ा गया था, जिन्हें पब्लिक ने प्रदेश स्तर के नेता के रूप में स्वीकार भी किया था तथा कांग्रेस को इन नेताओं के दम पर विजय श्री मिल.

परन्तु जब राष्ट्रीय पटल पर राहुल गाँधी को प्रधान मंत्री के रूप में पेश कर चुनाव लड़ा गया तो मोदी के मुकाबले राहुल को जनता ने नकार दिया. यह करारी हार राहुल गाँधी के नेतृत्व में कांग्रेस की हार है. राहुल को इसे स्वीकार कर लेना चाहिए और जितना जल्दी स्वीकार करेंगें कांग्रेस के दिन उतना जल्दी ही बहुरना शुरू कर देंगें.

यहाँ यह उल्लेखित करना भी तर्क सम्मत रहेगा कि पंजाब में कांग्रेस की वर्तमान जीत में राहुल का कोई योगदान नहीं है, बल्कि इसका पूरा श्रेय कैप्टेन अमरिंदर की स्ट्रोंग लीडरशिप को जाता है. नवजोत सिधु की पत्नी के आरोप, कि चंडीगढ़ से उसकी लोक सभा टिकट मुख्यमंत्री कैप्टेन अमरिंदर सिंह ने कटवाई, जिसे खुद नवजोत सिधु ने भी सपोर्ट किया, क्या पुनः यह सिद्ध नहीं करते हैं कि राहुल फैसले लेने में कमजोर हैं और किसी के भी दवाब में आकर झुक जाते हैं. क्यों नहीं यहाँ भी राहुल सही स्थिति का उद्घोष करते ? क्यों नहीं स्वीकारते / अस्वीकारते कि –हाँ उन्होंने अमरिंदर के दवाब में सिधु की पत्नी का टिकट काटा / नहीं काटा है ?

सिधु प्रदेश के मुख्यमंत्री के नीचे मंत्री होते हुए भी क्यों कहते हैं कि उनका 'कैप्टेन' अमरिंदर नहीं केवल राहुल गाँधी है ? क्या ऐसे विद्रोही लोगों को शह देना पार्टी में अनुशासनहीनता पैदा कर कमजोर बनाना नहीं है ? या आप इतने दुर्बल हो चुके हैं कि ऐसे मामलों में फैसले करना आपके बस की बात नहीं रह गयी है ? क्यों इन बातों पर राहुल मौन धारण कर लेते हैं ?

राहुल की मौन साधना से तो अमरिंदर के खिलाफ बयान बाजी करने वाले नवजोत सिधु के विरुद्ध कारवाई में दी जा रही ढील का चुनाव में भी नुक्सान हुआ है और आगे भी होता ही जा रहा है. सिधु के विरुद्ध कोई स्टेप क्यों नहीं उठाया जा रहा है ? इस बात से दो निष्कर्ष निकलते हैं –या तो खुद राहुल पंजाब में अमरिंदर पर सिधु के माध्यम से चेक रखना चाहते हैं या अपने को इतना स्ट्रोंग लीडर नहीं मानते हैं कि सिधु के खिलाफ कारवाई करने का हौसला कर पायें.

हरियाणा में भी राहुल की ढुलमुल नीति के कारण कांग्रेस छह गुटों में बंटी हुई है. कांग्रेस के जिला तथा ब्लाक स्तर पर सक्रिय कार्यकर्ता ना होने के कारण मोदी के प्रचार का कोई सटीक विरोध नहीं हो पाया. क्यों राहुल ने एक निष्क्रिय प्रदेश अध्यक्ष, अशोक तंवर, को पार्टी को रसातल में ले जाने हेतु जिम्मेदारी दी हुई है ? दिल्ली में जिन नेताओं की मानकर राहुल ने केजरीवाल से सीट समझोता नहीं किया, अब क्यों नहीं राहुल उनसे पूछते कि वे किस आधार पर इसका विरोध कर रहे थे ?

राहुल जी ने क्यों नहीं उत्तर प्रदेश में बसपा –अखिलेश गठबंधन की बात मानकर उन द्वारा दी जा रही सीटों पर सब्र किया ? क्या उनसे विमुख हो राहुल खुद अपनी अमेठी की पारंपरिक सीट से हाथ नहीं धो बैठे ? राहुल को चाहिए कि अपनी किचेन कैबिनेट से बाहर निकलकर रूट लेवल पर कार्यकर्ताओं से वार्तालाप कर कांग्रेस को नई पहचान दें. राहुल अपने नाम की बजाय पुराने व कांग्रेस के धरातल से जुड़े नेताओं की छाँव में स्थानीय नेताओं की नई पौध तैयार करें. कांग्रेस के पास खोखली जड़ों वाले नेता ही ज्यादा हैं, खुद राहुल की जड़ें भी अभी गमले के भीतर से बाहर नहीं निकल पायी हैं. गमले में लगे रहने वाले पौधे पेड़ नहीं बना करते. वे बौन्साई बनकर पेड़ का भ्रामक स्वरुप मात्र होते हैं, पेड़ बननें के लिए गमले से बाहर गर्मी-सर्दी –तूफ़ान –अंधड़ को झेलते हुए मेंड़ पर रोपित होना ही होगा.

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