Home > भारत की मिसाइल से 32 देशों की सुरक्षा पर संकट - पाक मिडिया

भारत की मिसाइल से 32 देशों की सुरक्षा पर संकट - पाक मिडिया

 Special News Coverage |  2016-05-22 03:54:40.0


140127010947_sartaj_aziz_pakistan_624x351_reuters
भारत की परमाणु क्षमता वाली पनडुब्बी और सुपर-सोनिक बेलेस्टिक मिसाइल के परीक्षण को लेकर पाकिस्तान के उर्दू मीडिया में कई तरह की आशंकाएं जताई जा रही हैं।


‘जंग’ लिखता है कि भारतीय पनडुब्बी में परमाणु मिसाइल तैनात करने से दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन बिगड़ जाएगा और इससे हिंद महासागर के तट पर स्थित 32 देशों को ख़तरा होगा। अख़बार के मुताबिक़ ये बात पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के विदेश मामलों के सलाहकार सरताज अज़ीज़ ने पाकिस्तानी सीनेट में कही। अज़ीज़ ने इन 32 देशों में मालदीव, श्रीलंका, बहरीन, ईरान, इराक़, क़ुवैत, ओमान, क़तर, सऊदी अरब, यूएई, मिस्र, दक्षिणी अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, मलेशिया, म्यांमार, सिंगापुर और थाईलैंड जैसे देशों के नाम गिनाए।अख़बार के मुताबिक़ अज़ीज़ ने कहा कि भारत संयुक्त राष्ट्र महासभा के आगामी सत्र में हिंद महासागर से परमाणु हथियारों को दूर रखने के इरादे से एक प्रस्ताव लाना चाहता है और इन सभी 32 देशों का समर्थन हासिल करने का प्रयास करेगा।


वहीं ‘एक्सप्रेस’ लिखता है कि अज़ीज़ ने भारत की सुपर-सोनिक इंटरसेप्टर मिसाइल से पाकिस्तान को ख़तरे की बात भी की है।अख़बार लिखता है कि पाकिस्तान को भी प्रतिरोधक क्षमता विकसित करनी होगी क्योंकि बात वार्ता की हो या फिर हथियारों की, पाकिस्तान ने हमेशा संतुलन बनाए रखने की नीति पर अमल किया है।


वहीं रोजनामा ‘पाकिस्तान’ ने पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता के इस बयान को तवज्जो दी है कि जब भी भारत बातचीत के लिए तैयार होगा, पाकिस्तान उससे बात करने को तैयार है। ये बात पाकिस्तान में भारतीय उच्चायुक्त गौतम बम्बावले के इस बयान के जबाव में कही गई है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पाकिस्तान में होने वाले सार्क सम्मेलन में हिस्सा लेंगे और उससे पहले दोनों देशों के बीच बातचीत होनी चाहिए। अख़बार ने भारत पर हमेशा बातचीत में अडंगा लगाने का आरोप लगाते हुए लिखा है कि राजनयिक भाषा में ज़रूर कहा जाता है कि सभी विवादों पर बात होगी, लेकिन भारत की तरफ़ से कोई लचक नहीं दिखाई जाती है।

वहीं रोजनामा ‘दुनिया’ लिखता है कि देश की संसद में सरकार और विपक्ष के मतभेद उस समय ख़त्म हो गए जब सांसदों ने अपने वेतन और अन्य सुविधाओं में लाखों रुपए की वृद्धि को मंज़ूरी दे दी। अख़बार के मुताबिक़ सिफ़ारिश की गई है कि राष्ट्रीय असेंबली के सदस्यों का बुनियादी वेतन 36,423 रुपए से बढा़कर दो लाख, यूटिलिटी अलाउंस 50 हजार रुपए, ट्रांसपोर्ट अलाउंस 50 हजार रुपए, चुनाव क्षेत्र अलाउंस 70 हजार रुपए कर दिया गया है।
वहीं राष्ट्रीय एसेंबली के स्पीकर और सीनेट के चैयरमैन का मासिक वेतन 97,124 रुपए से बढ़ाकर चार लाख रुपए करने की सिफारिश की गई है जबकि उन्हें 50 हजार के अलाउंस अलग से देने की बात कही गई है।
अख़बार लिखता है कि वैसे तो विपक्ष को सरकार के हर काम में कीड़े नज़र आते हैं और उसके हर काम की आलोचना की जाती है लेकिन बात जब वेतन और सुविधाओं को बढ़ाने की आती है तो सारे मतभेद ख़त्म हो जाते हैं। ‘औसाफ’ ने इस फैसले पर तंज़ करते हुए इसे आम लोगों के लिए बजट से पहले ‘ख़ुशखबरी’ बताया है।

अख़बार लिखता है कि हद तो ये है कि सांसदों के परिजनों का अलग से ख़्याल रखा गया है और उनके लिए वाउचर की मद में तीन लाख रुपए रखे गए हैं जबकि सांसद को अपना दफ्तर चलाने के लिए हर महीने एक लाख रुपए दिए जाएंगे। अख़बार लिखता है कि होना तो ये चाहिए था कि देश की जनता के टैक्स से जमा पैसे को उन्हीं की बेहतरी में लगाया जाता लेकिन इसे सांसदों की फ़िज़ूलख़र्ची पर लगाना ज़ुल्म है।


वहीं ‘जसारत’ ने पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी पर संपादकीय लिखा है कि सरकार को लोगों की सेहत से कोई सरोकार नहीं है। अख़बार कहता है कि सवाल ये है कि जनता की किस चीज से सरकार को सरोकार है. जसारत ने भी वेतन में भारी वृद्धि पर सांसदों की खिंचाई की है।
रूख भारत का करें तो हालिया विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को लगे झटके की भारत के उर्दू मीडिया में ख़ासी चर्चा है।


‘हमारा समाज’ लिखता है कि पांच राज्यों के नतीजों से पता चलता है कि कांग्रेस को बड़े सबक़ लेने की ज़रूरत है। अख़बार के मुताबिक़ आम ख़्याल ये भी है कि बिहार चुनाव के बाद कांग्रेस जिस ख़ुशफ़हमी का शिकार हो गई थी, वो उसकी ज़िल्लत का सामान बनी। अख़बार कहता है कि कांग्रेस को जिस जवान जोश की जरूरत है वो पार्टी के भीतर मौजूद है, लेकिन जरूरत संगठित नेतृत्व और नई रूह की है जो उसे दोबारा हासिल करना होगा।

मुसलमान क्यों कांग्रेस से दूर

अख़बार के मुताबिक़ ये भी सोचना होगा कि मुसलमान क्यों कांग्रेस से दूर हो रहे हैं। वहीं ‘हिंदोस्तान एक्सप्रेस’ लिखता है कि अगर असम में कांग्रेस और मौलाना बदरुद्दीन अजमल की पार्टी के बीच समझौता हो जाता तो भाजपा ना तो 60 सीटें जीतती और न कांग्रेस 26 पर सिमटती। अख़बार लिखता है कि विधानसभा चुनाव के नतीजे बताते हैं कि आम चुनावों के दो साल बाद कांग्रेस अपनी बुनियाद मज़बूत नहीं कर पाई है। अख़बार के मुताबिक़ कांग्रेस की जड़ें जहां सूखती जा रही हैं, वहीं भारतीय जनता पार्टी का दायरा फैलता जा रहा है।

सोर्स बीबीसी

Tags:    
Share it
Top