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शोध पत्र “डॉ० अम्बेडकर और धर्म इस्लाम” शोधकर्ता का लन्दन एक यादगार यात्रा – बेताब अहमद

 Special News Coverage |  11 Dec 2015 8:07 AM GMT

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डेहरी–ऑन-सोन,रोहतास(बिहार)ः के निवासी लेखक एवं पत्रकार बेताब अहमद के आठ दिवसीय लन्दन यात्रा के बाद उनके शुभचिंतकों ने रेलवे स्टेशन पर फुल माला पहनाकर स्वागत किया। बेताब अहमद को विश्वविधयालय अनुदान आयोग एवं डॉ०अम्बेडकर प्रतिष्ठान सामाजिक न्याय अधिकारिता मंत्रालय भारत सरकार द्वारा उनका शोध पत्र “डॉ० अम्बेडकर और धर्म इस्लाम” को चयन समिति ने चयन कर टीम लीडर टी०आर०मीणा (रा०स०क०आ०) सचिव सामाजिक न्याय अधिकारिता मंत्रालय भारत सरकार के साथ 21 नवंबर से 28 नवंबर तक 25 सदसीय शोधकर्ता के साथ शोध अध्ययन भ्रमण के लिए लन्दन भेजा गया था।

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लेखक एवं पत्रकार बेताब अहमद ने बतया कि भारतीय संविधान के वास्तुकार डॉ बी आर अम्बेडकर के जीवन और सामाजिक अन्याय, कार्यपर शोधकर्ता का यह यूनाइटेड किंगडम के लिए एक यादगार यात्रा था। बाबा साहेब की 125 वीं जयंती के उपलक्ष्य में समारोह के हिस्से के रूप में डॉ अम्बेडकर के अल्मा मेटर, लंदन स्कूल आफ अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान (एलएसई) की यात्रा करने का मौका मिला। डॉ अम्बेडकर 1916 और 1923 के दौरान लंदन स्कूल आफ इकोनॉमिक्स में पढ़ाई की और अर्थशास्त्र में मास्टर और पीएचडी की उपाधि से सम्मानित किया गया था। शोध अध्ययन भ्रमण के दौरान अपने अनुसंधान से जुड़ा एलएसई पुस्तकालय और अभिलेखीय संसाधनों का उपयोग करने दिया गया। मैं समानता और न्याय की भविष्यवाणी मूल्यों का प्रचार करने के लिए हमारे देश के महानतम नेताओं में से एक के रूप में डॉ अम्बेडकर तब्दील हो कि रोमांचक यात्रा और गवाह मिनट विवरण का एक हिस्सा बनना चाहता था।


लेखक एवं पत्रकार बेताब अहमद ने बताया कि मैं यह जानना चाहता था कि लंदन स्कूल आफ इकोनॉमिक्स, यू० के० और यूरोप के विश्वविधयालय में डॉ अम्बेडकर की शिक्षाअर्थशास्त्र शोध अध्येता के रूप में हुई तो कैसे? डॉ अम्बेडकर के आर्थिक विषयों परशोध-प्रबंध में भारत की वर्तमान आर्थिक नीतियों के परिप्रेक्ष्यमें देखे जाने चाहिए की आर्थिक क्रांति में मील के पत्थर सिद्ध कैसे हुई?

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बेताब अहमद ने बतया कि हम बाबा साहेब के दस्तावेजों को देखा और अनमोल ज्ञान अर्जित किया क्योंकि यह दौरा एक पत्रकार के लिए एक अच्छा अवसर था,एक भारतीय को दिया सम्मान, लंदन में विशेष रूप से जो उत्तरी लंदन में राजा हेनरी रोड पर वेस्टमिंस्टर, ब्रिटिश लाइब्रेरी, ऑक्सफोर्ड और डॉ अम्बेडकर के घर का दौरा किया। भारतीय उच्चायोग लन्दन के सभागार में लंदन स्कूल आफ इकोनॉमिक्स में अर्थशास्त्र के अवकाश प्राप्त प्रोफेसर लॉर्ड मेघनाथ देसाई के व्याख्यान,ब्रिटेन में सामाजिक असमानता पर भारतीय संविधान,लंदन स्कूल आफ इकोनॉमिक्स फैलो डॉ लिसा मैकेंजी ने अपने विचारों से ब्रिटेन की सफलता का श्रेय, श्रमिक वर्ग, और बेघर लोगों के लिए ब्रिटिश सरकार की विभिन्न नीतियों के बारे में बताया।



बेताब अहमद ने बताया कि लगभग 200 वर्षों तक भारत पर शासन करने वाले इस देश की आबादी लगभग 6 करोड़ है जिसमे भारतीय मूल के लोगों की संख्या 15-16 लाख के करीब है। लन्दन में आठ दिनों तक रहने से यह समझे की लन्दन के बस के भीतर बैठ कर कितना देख पायेंगे? देखने को तो बहुत है। स्थापत्य की नाना शैलियाँ, सहेज कर रखे गये रचनाकारों और वैज्ञानिकों के कार्यस्थल, सुविस्तृत पार्क और भी न मालूम क्या -क्या ? न वाहनों से निकलता धुआँ, न धूल। सड़कों के किनारे लगे पेड़ भी ऐसे दिखते हैं जैसे अभी - अभी नहा कर निकले हों। हर सड़क के किनारों पर पैदल चलने के लिए धूप - छाँव वाले चौरस पथ। सबसे बढ़ कर, अपने देश में दुर्लभ, वाहन - चालकों द्वारा पदयात्रियों को ’पहले आप’ का संकेत देने परंपरा। सड़कों के किनारे यदा - कदा टोपी फैलाए भिखारी भी दिख जाते हैं। देवियों के कंठहार और आप की जेब का भार कम करने के लिए उत्सुक समाज-सेवियों से सावधान रहने के संकेत भी हैं। भारत के नगरों की अपेक्षा अधिक सुरक्षित होने पर भी लन्दन तोक्यो की तरह सुरक्षित नहीं है। फिर भी यहाँ जो लगभग अचूक व्यवस्था दिखायी देती है, उससे लगता है कि अपने देश की तरह यहाँ न तो नेतागिरी का प्रकोप है और न प्रशासनिक कार्यवाही में कोई हस्तक्षेप और भेदभाव। कहीं भी चले जाइये, अदृश्य आँखों से आप ओझल नहीं हो सकते। भला ऐसे में अनुशासनहीनता पनपे तो कैसे ? इतनी निगरानी होते हुए भी घर और कृष्णमंदिर में समत्व वाले जन अपना दायित्व निभाने का अवसर खोज ही लेते हैं। सच तो यह है कि बहुजातीय समाजों में अपनी भूमि के प्रति उतनी निष्ठा नहीं होती, जितनी एक जातीय समाजों में होती है।
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मुझे देख कर हैरानी हुई कि लन्दन वासियों ने आज भी अपनी उस ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को वैसा का वैसा संजों कर रखा है, इस शहर में आधुनिकता और विकास की जहाँ एक ओर चरम सीमा है| वहीँ अपनी उस पुरानी पहचान को कायम रखने की जिद भी है| कहते हैं दुनिया भर में सबसे फैशनेबल शहर पेरिस है, लेकिन लन्दन के लोग भी अपने व्यक्तित्व को प्रभावशाली बनाने के मामले में पीछे नहीं हैं,युवा, मध्यम आयु वर्ग , वरिष्ठ आयु कहीं भी उम्र स्मार्ट, खूबसूरत बनने के रास्ते में आड़े नहीं आती है शायद यही इस शहर के प्रासंगिक होने के पीछे रहस्य है।


लन्दन यात्रा का मुख आकर्षण था,डॉ अम्बेडकर साहब का घर,लंदन स्कूल आफ अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान (एलएसई) की यात्रा, वेस्टमिंस्टर, ब्रिटिश लाइब्रेरीऔर ऑक्सफोर्ड।

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