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बीजेपी सांसद का इस्तीफा कमलनाथ के लिए बन सकता है संजीवनी!

भाजपा का एक वर्ग इस पक्ष में था कि डामोर विधायक पद से इस्तीफा देने के बजाए सांसदी छोड़ दें. भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व से चर्चा के बाद प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह ने डामोर के विधायक पद से इस्तीफा देने की घोषणा की है.

 Special Coverage News |  4 Jun 2019 1:17 PM GMT  |  भोपाल

बीजेपी सांसद का इस्तीफा कमलनाथ के लिए बन सकता है संजीवनी!

दिनेश गुप्ता

मध्य प्रदेश के झाबुआ लोकसभा क्षेत्र से निर्वाचित सांसद जीएस डामोर के विधायक पद से इस्तीफा देने का फैसला राज्य की कमलनाथ सरकार के लिए उस स्थिति में फायदे का सौदा साबित हो सकता है जब उपचुनाव में कांग्रेस झाबुआ विधानसभा की सीट जीतने में सफल हो. लोकसभा के चुनाव परिणामों के बाद से ही भारतीय जनता पार्टी (BJP) में डामोर के इस्तीफे को लेकर असमंजस बना हुआ था. भाजपा का एक वर्ग इस पक्ष में था कि डामोर विधायक पद से इस्तीफा देने के बजाए सांसदी छोड़ दें. भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व से चर्चा के बाद प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह ने डामोर के विधायक पद से इस्तीफा देने की घोषणा की है.

मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार अल्पमत में है.

230 सदस्यों वाली मध्य प्रदेश की विधानसभा में दो तिहाई बहुमत के लिए 116 सदस्यों की आवश्यकता होती है. दिसंबर माह में हुए विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस सिर्फ 114 सीटें ही जीतने में सफल हुई थी. राज्य की कमलनाथ सरकार सपा-बसपा के अलावा निर्दलीय विधायकों के समर्थन से चल रही है. मुख्यमंत्री कमलनाथ ने एक निर्दलीय विधायक प्रदीप जायसवाल को मंत्रिमंडल में जगह भी दी है. सपा-बसपा विधायक भी मंत्रिमंडल में जगह पाने के लिए कमलनाथ पर लगातार दबाव भी बनाए हुए हैं.

लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने एक वोट से दो सरकार चुनने की अपील भी वोटरों से की थी. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मध्य प्रदेश की सरकार के कार्यकाल पूरा करने पर संदेह प्रकट किया था. अमित शाह ने कहा था कि कमलनाथ सरकार के चारों पाए हिल रहे हैं. पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व के राजनीतिक बयानों का अर्थ प्रदेश भाजपा के नेताओं ने यह लगाया कि मोदी-शाह भी कमलनाथ सरकार को गिराने के पक्ष में हैं. संभवत: यही वजह रही कि लोकसभा चुनाव परिणामों के आने के बाद से ही कमलनाथ सरकार की उल्टी गिनती शुरू होने संबंधी भाजपा नेताओं के बयान सुर्खियां बने.

विजयवर्गीय ने कहा था, अगले 22 दिन भी नहीं चल पाएगी सरकार

बीजेपी के महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने तो यहां तक कह दिया कि अगले 22 दिन भी सरकार नहीं चल पाएगी. प्रतिपक्ष के नेता गोपाल भार्गव ने तो कमलनाथ सरकार से फ्लोर टेस्ट की मांग तक कर डाली. इन बयानों के कारण पिछले एक सप्ताह से राज्य में सरकार की स्थिरता बड़ा मुद्दा बन गया. जीएस डामोर को विधायक पद से इस्तीफा दिलाए जाने का फैसला कमलनाथ के लिए राहत भरा फैसला कहा जा सकता है.

मध्य प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के मीडिया प्रभारी लाकेन्द्र पाराशर कहते हैं कि हमारा एक विधायक घटने-बढ़ने से सरकार की अस्थिरता पर कोई फर्क नहीं आना. वे कहते हैं कि सरकार में अस्थिरता कांग्रेस और समर्थक विधायकों के रवैये के कारण है. इसमें भाजपा का कोई योगदान नहीं है. भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष राकेश सिंह का भी मानना है कि सरकार अपने कार्मों से गिरेगी.

समर्थन देने वाले विधायक हैं कमलनाथ की परेशानी

लोकसभा चुनाव परिणामों के बाद कमलनाथ ने अपने पार्टी के विधायकों के साथ हार की समीक्षा की थी. इस समीक्षा बैठक में विधायकों ने सरकार के कामकाज को लेकर गंभीर नाराजगी प्रकट की. विधायकों का आरोप था कि अफसर उनकी सुनवाई नहीं कर रहे है. इसी बैठक में असंतुष्ट विधायकों के यह स्वर भी सुनने को मिले कि उपेक्षा होती रही तो दस विधायक एक साथ इस्तीफा भी देने में नहीं झिझकेंगे.

ये वे विधायक हैं, जिन्हें कतिपय राजनीतिक कारणों से कमलनाथ ने अपने मंत्रिमंडल में जगह नहीं दी. इनमें दो वरिष्ठ विधायक केपी सिंह और एदल सिंह कंसाना भी हैं. दोनों दिग्विजय सिंह मंत्रिमंडल में पंद्रह साल पहले मंत्री थे. ये दोनों विधायक ग्वालियर-चंबल अंचल से चुनकर आते हैं. इस अंचल से छह विधायक मंत्री बनाए गए हैं. इससे ज्याद की गुंजाइश भी नहीं थी.

बुरहानपुर के निर्दलीय ठाकुर सुरेन्द्र सिंह शेरा लगातार कमलनाथ पर मंत्री बनाने के लिए दबाव बनाए हुए हैं. समर्थन वापसी के बयान भी खुले तौर पर दे रहे हैं. पथरिया से बसपा विधायक राम बाई के भी कई सरकार विरोधी बयान आते रहे हैं. राम बाई ने ही यह बयान भी दिया कि समर्थन वापस लेने के लिए विधायकों को पचास करोड़ रुपए देने के ऑफर दिए जा रहे हैं.

राम बाई ने अपने बयान में किसी नेता का नाम नहीं लिया था. लेकिन उनके बयान को केन्द्रीय मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर उस बयान से जोड़कर देखा गया जिसमें उन्होंने कहा था कि कांग्रेस के दस विधायक हमारे संपर्क में हैं. वहीं मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सरकार गिराने संबंधी बयानों से किनारा करते हुए साफ तौर पर कहा कि हमें सरकार गिराने की जरूरत नहीं है. यह सरकार अपने कर्मों से ही गिर जाएगी.

भाजपा के लिए आसान नहीं है सरकार बनाना

भारतीय जनता पार्टी के मुख्य प्रवक्ता दीपक विजयवर्गीय कहते हैं कि जीएस डामोर को पार्टी ने काफी सोच विचार कर ही लोकसभा का चुनाव लड़ाया था. लोकसभा सदस्य निर्वाचित हो जाने के बाद सांसद पद से त्याग पत्र दिलाने का कोई इरादा पार्टी का नहीं रहा. पार्टी के निर्णय के अनुसार उन्होंने इस्तीफा दिया है.

डामोर के इस्तीफा दिए जाने के बाद विधानसभा में निर्वाचित सदस्यों की संख्या घटकर 229 रह गई है. इस संख्या के लिहाज से कमलनाथ सरकार पूर्ण बहुमत की स्थिति में आ जाती है. वहीं भारतीय जनता पार्टी के निर्वाचित सदस्यों की संख्या घटकर 108 रह गई है. इस संख्या बल के आधार पर कमलनाथ सरकार को गिराना आसान नहीं है.

मुख्यमंत्री कमलनाथ कहते हैं कि इस बात पर संदेह नहीं होना चाहिए कि सरकार अपना कार्यकाल पूरा करेगी. वे कहते हैं कि हमारे पास पहले भी बहुमत था और आज भी है. विधानसभा में बसपा-सपा और निर्दलीय विधायकों की कुल संख्या सात है. चार निर्दलीय विधायक कांग्रेसी पृष्ठभूमि के है. इनके भाजपा के साथ जाने की संभावना दिखाई नहीं देती. सपा-बसपा विधायक भाजपा के साथ चले भी जाएं तो भी सरकार अल्पमत में नहीं आएगी.

मध्य प्रदेश विधानसभा के रिटायर्ड प्रमुख सचिव भगवान देव इसराणी कहते हैं कि सरकार गिर भी गई तो भी भाजपा का सरकार चलाना आसान नहीं होगा. उनकी सरकार भी अल्पमत ही होगी.

झाबुआ जीतने से मजबूत हो सकती है सरकार

झाबुआ के भाजपा के विधायक जीएस डामोर के इस्तीफे से खाली होने वाली सीट के लिए चुनाव दिसंबर माह के अंत तक होने की संभावना है. झाबुआ जिला आदिवासी बाहुल्य जिला है. आदिवासी कांग्रेस का प्रतिबद्ध वोटर माना जाता रहा है. पिछले कुछ चुनाव से आदिवासी वर्ग का रुझान बदलते हुए दिखाई दिया. लोकसभा के इस चुनाव में कांग्रेस झाबुआ की अपनी परंपरागत सीट को नहीं जीत पाई. झाबुआ की विधानसभा सीट से चुने गए डामोर ने कांग्रेस के कद्दावर नेता कांतिलाल भूरिया के पुत्र डॉ विक्रांत भूरिया को लगभग दस हजार वोटों से हराया था. इस क्षेत्र में कांग्रेस की राजनीति भूरिया परिवार ही चलाता है.

विधानसभा चुनाव में दो टिकट भूरिया परिवार को दिए गए थे. भतीजी कलावती भूरिया जोबट से चुनाव जीत गईं थीं. विक्रांत भूरिया चुनाव हार गए थे. यह स्थिति जेवियर मेढ़ा के निर्दलीय चुनाव लड़ने के कारण हुई. मेढ़ा को 35 हजार से अधिक वोट मिले थे. वे भूरिया विरोधी हैं. डामोर के इस्तीफे के बाद भूरिया चाहते हैं कि पार्टी उन्हें विधानसभा लड़ने का मौका दे. ऐसी स्थिति में मेढ़ा फिर मैदान में होंगे अथवा भारतीय जनता पार्टी उन्हें मौका दे देगी. कमलनाथ नहीं चाहेंगे कि विधानसभा में सीट बढ़ाने का जो मौका उन्हें मिला है, वह हाथ से निकल जाए.

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