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आखिर उलटा क्यों पड़ रहा है यह ब्रह्मास्त्र? नागरिकता संशोधन कानून हड़बड़ी में बना है, इस पर पुनर्विचार करने में कोई हर्ज नहीं!

लखनऊ, घंटाघर पर जारी धरने का माहौल इससे भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि तो विकृत हो ही रही है, देश में चल रहे हंगामे के कारण संसद और सरकार आर्थिक संकट पर समुचित ध्यान नहीं दे पा रही है

 Shiv Kumar Mishra |  29 Jan 2020 6:02 AM GMT  |  दिल्ली

आखिर उलटा क्यों पड़ रहा है यह ब्रह्मास्त्र? नागरिकता संशोधन कानून हड़बड़ी में बना है, इस पर पुनर्विचार करने में कोई हर्ज नहीं!

वेदप्रताप वैदिक

यूरोपीय संघ की संसद में हमारे नए नागरिकता कानून के विरुद्ध लगभग आधा दर्जन प्रस्ताव आ गए हैं। हमारी आधा दर्जन विधानसभाएं उसके खिलाफ प्रस्ताव पारित कर रही हैं। देश में दर्जनों शाहीन बाग उग आए हैं। दिल्ली के अलावा लखनऊ, मुंबई, कोलकाता, हैदराबाद, तिरुवनंतपुरम जैसे शहरों में इस कानून के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं। कई प्रमुख बुद्धिजीवियों और कलाकारों ने खुलकर अपना विरोध प्रकट किया है। इस विरोध-प्रदर्शन में विरोधी दल हिस्सा जरूर ले रहे हैं लेकिन ये प्रदर्शन उनके इशारे पर नहीं हो रहे हैं।

• संतुलन की कमी

भारत के मुसलमानों में इस कानून से डर फैल गया है लेकिन इन प्रदर्शनों के आयोजकों और भागीदारों में हिंदुओं, सिखों, ईसाइयों और बौद्धों ने भी बड़ी संख्या में भाग लिया है। केरल के तो गिरजाघरों ने फतवे जारी किए हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि ये धरने और प्रदर्शन अहिंसक हैं। कहीं से तोड़-फोड़ और खून-खराबे की खबरें नहीं आ रही हैं। जो भी इसका विरोध कर रहे हैं, वे इसे गलत नहीं बता रहे हैं। हर व्यक्ति इस बात की सराहना कर रहा है कि पड़ोसी देशों के उत्पीड़ित लोगों के लिए भारत के द्वार खुल रहे हैं। लेकिन फिर भी इस कानून में कई कमियां रह गई हैं, जिनका जिक्र मैं आगे करूंगा। जिस बात ने मुसलमानों को भयभीत कर दिया है, वह यह गलतफहमी है कि इस कानून के लागू होने के साथ जो नागरिकता रजिस्टर बनेगा, उसमें से मुसलमानों के नाम बाहर कर दिए जाएंगे। किसकी हिम्मत है, जो यह दुस्साहस करेगा?

नागरिकता रजिस्टर और पड़ोसी शरणार्थी कानून दो अलग-अलग चीजें हैं। किसी भी व्यक्ति की नागरिकता तय करने के नियम-उप-नियम अभी तक नहीं बने हैं। वे भेदभावपूर्ण हो ही नहीं सकते। पहली बात, सरकार इस बारे में सावधान रहेगी और फिर अदालत ऐसे किसी भी भेदभावपूर्ण नियम को खारिज कर देगी। जहां तक पड़ोसी देशों के शरणार्थियों को शरण देने का सवाल है, यह संशोधित कानून काफी जल्दबाजी में बना है और जल्दबाजी में ही पारित हो गया है। इस पर पुनर्विचार करने में कोई बुराई नहीं है। इसे दोबारा संशोधित करने से संसद या सरकार की नाक नीची नहीं होने वाली है। वह ऊंची ही होगी। इस कानून में बहुत-सी कमियां रह गई हैं। पहली, यह बहुत सराहनीय है कि पड़ोसी देशों के उत्पीड़ितों के लिए भारत के द्वार इतने धमाके से पहली बार खुले हैं लेकिन सिर्फ धार्मिक उत्पीड़ितों के लिए ही क्यों/ राजनीतिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, जातीय और आर्थिक उत्पीड़ितों के लिए क्यों नहीं?

1971 में बांग्लादेश से जो एक करोड़ लोग भारत आए थे, क्या उनका धार्मिक उत्पीड़न हुआ था? क्या वे मुसलमान नहीं थे? तालिबान के कारण अफगानिस्तान से भागकर आनेवाले पठान, ताजिक, हजारा और उजबेक क्या मुसलमान नहीं थे? पाकिस्तान के बलूच और सिंधी क्या मुसलमान नहीं हैं? वे भागकर भारत क्यों आते हैं? क्या अदनान सामी और तसलीमा नसरीन मुसलमान नहीं हैं? यदि उनको भारत शरण दे सकता है तो अन्य मुसलमानों के लिए अपने दरवाजे वह बंद क्यों करता है? इस कानून से या तो 'धार्मिक' शब्द ही हटा दिया जाना चाहिए या फिर बाकी सबके साथ मुसलमानों का नाम भी जोड़ दिया जाना चाहिए। जो भी उत्पीड़ित होगा, भारतमाता उसे शरण देगी। लेकिन थोक में क्यों देगी? क्या भारत को शरणार्थियों का अनाथालय बना देना है? शरण-जैसी बेशकीमती चीज थोक में देना और थोक में मना करना, दोनों ही गलत है। हर अर्जी पर अलग से विचार किया जाना चाहिए।

भारत में हर शरण मांगनेवाले की कड़ी जांच-परख होनी चाहिए, चाहे वह किसी भी मजहब या जाति का हो। वरना अल्पसंख्यक होने के नाम पर देश में बहुत-से जासूस, आतंकवादी, ठग और निठल्ले लोग भी लदने की कोशिश करेंगे। इसमें सिर्फ तीन पड़ोसी देशों के शरणार्थियों को ही क्यों रखा गया? यदि इसे भारत-विभाजन का अधूरा अजेंडा कहा गया है तो अफगानिस्तान का उससे क्या संबंध है? यदि अफगानिस्तान को जोड़ा गया तो श्रीलंका को क्यों नहीं? फिर नेपाली, बर्मी और तिब्बतियों को क्यों भूल गए? यह तर्क भी कमजोर है कि सरकार ने 1947 के अधूरे अजेंडे को पूरा किया है। गांधी और नेहरू ने पाकिस्तान के गैर-मुस्लिमों का स्वागत किया था, उसे ही मोदी सरकार अब अंजाम दे रही है। आखिर विभाजन के कौन से दस्तावेज में लिखा है कि पाकिस्तान का कोई मुसलमान भारत में और भारत का कोई हिंदू पाकिस्तान में जाकर नहीं बस सकता था? गांधीजी तो कहा करते थे कि दोनों देशों में दोनों मजहबों के लोग आएं-जाएं और बसें। यदि ये तीनों मुस्लिम देश एक जवाबी कानून बना दें और कहें कि मोदी सरकार जिन भारतीय अल्पसंख्यकों पर अत्याचार कर रही है, उन्हें वे शरण देंगे तो दुनिया में हमारी क्या इज्जत रह जाएगी?

खराब होती छवि

इस कानून को बनाने वालों ने सोचा होगा कि यह हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण के लिए रामबाण सिद्ध होगा और 2024 में बीजेपी की नैया पार लगा देगा। लेकिन कुछ उल्टा ही हो रहा है। इसने सारे विरोधी दलों को एक कर दिया है। देश के बाहर हमारे मित्र राष्ट्र भी इसके विरुद्ध बोलने से नहीं चूक रहे। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन भारत का विरोध करने पर मजबूर हो रहे हैं। बांग्लादेश जैसा भारत का परम मित्र-राष्ट्र भी इस मामले में पाकिस्तान के साथ खड़ा दिखने लगा है। इमरान खान को मोदी ने नया शिगूफा थमा दिया है। इससे भारत की आंतरिक और अंतरराष्ट्रीय छवि तो विकृत हो ही रही है, देश में चल रहे हंगामे के कारण संसद और सरकार आर्थिक संकट पर समुचित ध्यान नहीं दे पा रही है। जरूरी यह है कि इस कानून में सरकार समुचित संशोधन शीघ्र करे और अपना ध्यान आर्थिक समस्याओं को हल करने पर लगाए, वरना यही हालत चलती रही तो देश को कहीं दूसरे आपात काल का सामना न करना पड़ जाए।

(लेखक भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं)

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