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गढ़ चिरौली मुठभेड़: 39 मौतों के बाद पुलिस को खरोंच तक नहीं आई , जानते हो क्यों?

घटनास्थल से 39 आदिवासीयो की लाशें बरामद हुई है ओर स्वतंत्र भारत के इतिहास में ये अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाई मानी जा रही है.

 शिव कुमार मिश्र |  2018-04-28 03:57:35.0  |  नई दिल्ली

गढ़ चिरौली मुठभेड़: 39 मौतों के बाद पुलिस को खरोंच तक नहीं आई , जानते हो क्यों?

कुछ दिनों पहले एक न्यूज टीवी पर फ्लैश हुई नक्सलवादी साईनाथ को महाराष्ट्र पुलिस ने ढेर कर दिया ,हम में से किसी ने भी इस खबर पर ध्यान नही दिया. बात आयी गयी हो गयी आज पता लग रहा है कि जिस घटना मे साईनाथ ओर अन्य नक्सली श्रीनू को ठिकाने लगाया गया है उस घटनास्थल से 39 आदिवासीयो की लाशें बरामद हुई है ओर स्वतंत्र भारत के इतिहास में ये अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाई मानी जा रही है.

इस घटना में जिसे मुठभेड़ बताया जा रहा है उसमें पुलिस वालों को किसी भी तरह का कोई नुकसान नहीं हुआ, किसी पुलिस वाले को मामूली सी खरोच तक नही आयी इन 39 आदिवासियों में से इनमें 17 औरतें हैं. कवि वरवर राव ने इस मुठभेड़ पर सवाल खड़े किए हैं। वरवर राव का कहना है कि "मुठभेड़ के बाद सामने आए तथ्यों से लगता है कि वहां मुठभेड़ जैसी कोई बात नहीं है। वरवर राव ने मीडिया को कहा है कि कुछ माओवादी आदिवासियों के साथ चर्चा कर रहे हों, ओर उन्हें गोलियों से भून दिया गया हो.
पत्रकार तामेश्वर सिन्हा अपनी रिपोर्ट में बता रहे हैं कि घटना स्थल इंद्रावती नदी के किनारे का मंजर कुछ और ही बयां कर रहा था नदी के किनारे पर उपयोग की गई साबुन, टूथपेस्ट, टूथब्रश जैसे कई और सामान पड़े हुए थे. देखकर साफ पता चल रहा था कि जिस वक्त पुलिस ने नक्सलियों को चारों तरफ से घेरा, उस वक्त वे नहा-धो रहे थे. बर्तन और खाने-पीने की चीजें भी इधर-उधर बिखरी पड़ी मिलीं".

इस हफ्ते की एक खबर पर शायद आप लोगों का ध्यान गया हो. हालांकि इस खबर को जिस महत्व के साथ अखबारों और अन्य समाचार माध्यम में छपना व प्रसारित होना चाहिए था और टीका-टिप्पणियां व लेख आने चाहिए थे, वैसा नहीं हुआ.
अब इसकी क्या वजह रही कि दो दिन के अंदर 37 गरीब आदिवासियों को पुलिस द्वारा नृशंस तरीके से मार डालने की घटना करीब-करीब आई-गई-सी रही और इस पर वैसी बेचैनी व चिंता नहीं दिखाई पड़ी, जैसी की होनी चाहिए थी ? हमारी `खोजी पत्रकारिता` ने इस घटना की अभी तक स्वतंत्र जांच-पड़ताल भी नहीं की है.
22 और 23 अप्रैल 2018 को, दो दिन के भीतर, महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले में महाराष्ट्र पुलिस ने 37 आदिवासियों को `नक्सलवादी/माओवादी ' बताकर फर्जी मुठभेड़ में मार डाला। इनमें 17 औरतें हैं. इंद्रावती के किनारे के जंगलों और पहाड़ियों में हुई इस `मुठभेड़' में एक भी पुलिसवाला घायल तक नहीं हुआ, मरना तो बहुत दूर की बात है.
यह कैसी मुठभेड़ है, जिसमें पुलिस पक्ष को खरोंच तक नहीं आई ! जिनको घेरकर बर्बर तरीके से मार डाला गया, क्या उनमें से एक को भी जिंदा नहीं पकड़ा जा सकता था ? यहां भी क्या वही नीति चलाई जा रही है, जो कश्मीर में सुरक्षा बल चला रहे हैं : घेर लो, मार डालो, जला डालो ?
साफ बात है कि अपने जल-जंगल-जमीन के लिए संघर्ष कर रहे आदिवासियों और उनके समर्थकों का सफाया करने और उन्हें आतंकित करने के लिए सत्ता पक्ष की – महाराष्ट्र की भाजपा-शिवसेना गठबंधन सरकार की –यह क्रूर मुहिम है. इसका मकसद है, कॉरपोरेटी लुटेरों को प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा करने और लूटने के लिए बेलगाम छूट देना.
गढ़चिरौली में 22 और 23 अप्रैल को राजसत्ता की ओर से जो आतंककारी हत्याकांड रचा गया, वह बर्बस हाशिमापुरा-1987 की याद दिला देता है. उत्तर प्रदेश पुलिस ने हाशिमपुरा (मेरठ) में 1987 में 40 से ज्यादा मुसलमानों को उनके घरों से उठाकर गोली मार दी थी और उनकी लाशों को हिंडन नदी में फेंक दिया था. गढ़चिरौली की घटना कश्मीर की याद दिलाती है, जहां विद्रोही नौजवानों की गर्दनों और सरों को निशाना बनाकर सुरक्षाबल गोली चलाते हैं और उन्हें जान से मार डालते हैं।.
ये जो लहू बहा या बहाया जा रहा है, वह हमारा ही है. ये सब हमारे अपने लोग हैं. इन्हें बचाया जाना चाहिए.


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