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सुप्रीमकोर्ट के इस निर्देश को किया बीजेपी और कांग्रेस ने किया अनदेखा, लगाई फिर कड़ी फटकार

 Special Coverage News |  3 Jun 2019 9:43 AM GMT  |  दिल्ली

सुप्रीमकोर्ट के इस निर्देश को किया बीजेपी और कांग्रेस ने किया अनदेखा, लगाई फिर कड़ी फटकार

सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गयी 30 मई की डेडलाइन निकल गयी अब तक न भाजपा ने बताया न कांग्रेस ने कि उन्हें इलेक्टोरल बॉन्ड्स के जरिए कितना चंदा मिला . ऐसा तब हुआ है जब इलेक्शन कमिशन ने बीते हफ्ते सभी पार्टियों को सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बारे में याद दिलाया था। अप्रैल में चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस दीपक गुप्ता और जस्टिस संजीव खन्ना की बेंच ने सभी पार्टियों को निर्देश दिया था कि वे इलेक्टोरल बॉन्ड्स की रसीदों और चंदा देने वाले लोगों की पहचान का ब्योरा सीलबंद लिफाफे में इलेक्शन कमिशन को सौंपे। लेकिन किसे परवाह है सभी जानते हैं कि इलेक्टोरल बॉन्ड्स के जरिए मिलने वाली रकम का बड़ा हिस्सा सत्ताधारी पार्टी के पास ही गया है ओर इस बार भी फिर एक बार बीजेपी प्रचंड बहुमत के साथ जीत कर आयी है तो वह सुप्रीम कोर्ट जैसी छोटी मोटी संस्थाओं की क्यो परवाह करे भला।

राजनीतिक दलों को इलेक्टोरल बॉन्ड्स के जरिए कितना चंदा मिला, यह जानकारी इलेक्शन कमिशन से साझा करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 30 मई तक की डेडलाइन दी थी। देश की दो सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टियां बीजेपी और कांग्रेस ऐसा करने में नाकाम रहीं। ऐसा तब है जब इलेक्शन कमिशन ने बीते हफ्ते सभी पार्टियों को सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बारे में याद दिलाया था। बीजेपी और कांग्रेस में तुलना करें तो इलेक्टोरल बॉन्ड्स के जरिए मिलने वाली रकम का बड़ा हिस्सा सत्ताधारी पार्टी के पास ही गया है। फिलहाल यह साफ नहीं है कि चुनाव आयोग बीजेपी को दोबारा से इस बारे में लिखेगा या फिर जानकारी साझा न करने वाली पार्टियों के बारे में सुप्रीम कोर्ट को जानकारी भर दे देगा।

आपको बता दें कि चुनाव से पहले अप्रैल में सुप्रीम कोर्ट ने सभी पार्टियों को निर्देश दिया था कि वे इलेक्टोरल बॉन्ड्स की रसीदों और चंदा देने वाले लोगों की पहचान का ब्योरा सीलबंद लिफाफे में इलेक्शन कमिशन को दे । चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस दीपक गुप्ता और जस्टिस संजीव खन्ना की बेंच ने यह आदेश दिया था। एक एनजीओ की तरफ से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्देश दिया था। याचिका में इलेक्टोरल बॉन्ड्स की वैधता को चुनौती दी गई थी। याचिका में यह मांग की गई थी कि या तो इलेक्टोरल बॉन्ड्स को कैंसल किया जाए या फिर चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता को बरकरार रखते हुए चंदा देने वाले लोगों के नाम सार्वजनिक किए जाएं।

जहां तक इलेक्टोरल बॉन्ड्स का सवाल है, केंद्र सरकार ने इस योजना को 2 जनवरी 2018 को अधिसूचित किया था। नियमों के मुताबिक, कोई भी भारतीय नागरिक या कंपनी इन बॉन्ड्स को खरीद सकती है। हालांकि, इन बॉन्ड्स के जरिए वे ही राजनीतिक दल चंदा हासिल कर सकेंगे, जिन्हें पिछले चुनावों में कम से कम 1 पर्सेंट वोट मिले हों। केंद्र सरकार ने इस बॉन्ड्स का समर्थन करते हुए अदालत में कहा था कि इनका मकसद चुनाव में कालेधन के इस्तेमाल पर रोक लगाना है।

क्या यह सच है की बॉन्ड्स के जरिये कालेधन पर रोक लगाया जा सकता है। ऐसा है तो बीजेपी सरकार और कांग्रेस दोनों ही चंदा देने वाले लोगो के नाम सार्वजानिक क्यों नहीं कर रही। या फिर कालेघन को ही छुपाने के लिए बॉन्ड्स को बढ़ावा दिया जा रहा है। बीजेपी सरकार अपनी जीत से पहले कालेधन के साथ ही कांग्रेस पर निशाना साधती रही है परन्तु अब कालेधन के चलते बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही सुप्रीम कोर्ट की नजरो में आते दिख रहे है। कोर्ट के आदेश देने के बाद भी दोनों पार्टियों ने अपनी तक चुनाव आयोग को जानकारी नहीं दी।

इन बातो से यही झलकता है की बीजेपी अमीरो द्वारा दिए गए कालेधन को छुपाने की कोशिश कर रही है। अपने चुनाव प्रचार में इस्तेमाल किये गए पैसो का कोई भी हिसाब नहीं दे रही केंद्र सरकार और यह बात छुपी नहीं है की नोटबन्दी के दौरान कालेधन वाले लोगो की मदद के पीछे बीजेपी सरकार का हाथ था।


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