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क्या हर पुत्र अपने पिता का हत्यारा होता है ?

 Special Coverage News |  26 Oct 2016 9:34 AM GMT  |  New Delhi

क्या हर पुत्र अपने पिता का हत्यारा होता है ?

प्रो. (डॉ.) योगेन्द्र यादव

आज एक मित्र ने फोन पर कहा कि अब नेताजी बहुत दिनों तक जीवित नही रहेंगे. उस पुत्र ने जिसे उन्होंने अपनी राजनीतिक विरासत दी, उनकी बात न मान कर उन्हें तिल-तिल मरने को मजबूर कर रहा है. इस समय वे चिंताग्रस्त हैं. उसकी इस बात ने मुझे चिन्तन करने को मजबूर कर दिया. मैंने इस विचार को व्यापक रूप में हर परिवार को इस कसौटी पर कसने लगा. मुझे लगा कि यह सिर्फ एक राजनीतिक कुनबे की कहानी नही है, बल्कि घर-घर में इस प्रकार के वाकया होते हैं, कि हर पिता को तिल-तिल यानी समय पूर्व मरने के लिए विवश होना पड़ता है.



भारतीय समाज में हर माता-पिता की अपनी औलादों से कुछ अपेक्षाएं होती हैं. वह उसे इस उम्मीद के साथ पाल-पोस कर बड़ा करता है कि यह मेरे बुढ़ापे की लाठी बनेगा. इस घर एवं इसकी इज्जत को सुरक्षित रखेगा. उसका सम्मान करेगा. उसके अधूरे कार्यों को पूरा करेगा. इसी कारण अपनी हैसियत से अधिक उसकी शिक्षा-दीक्षा पर खर्च करता है. जिसके कारण उसे जीवन में तमाम समझौते करने पड़ते हैं. अपनी जरूरतों में कटौती करनी पड़ती है. अपने को भूखा रख कर, कर्ज लेकर वह अपने बेटे की हर फरमाइश को पूरा करता है, उसे इसका एहसास नही होने देता. व्यापार या नौकरी में उसे लगाने के लिए वह जो थोड़ी-बहुत बचत किया होता है, उसे भी सहर्ष न्योछावर इस उम्मीद के साथ कर देता है कि उसके बेटे के लिए रोजी-रोटी की व्यवस्था हो जाये. वह सांसारिक भोगों का उपभोग करे, इसलिए वह समय से उसका शादी-ब्याह कर देता है. उसे लगता है कि बहू के आने पर उसे समय से भोजन-पानी, दवा-दारू मिलती रहेगी.



लेकिन थोड़े ही दिनों में उसे एहसास होने लगता है कि अब उसका बेटा या बेटे उसके कहने में नही हैं. उसके लिए दूसरे अधिक महत्त्वपूर्ण हो गये हैं. अब वह पिता को सम्मान देने के बजाय अपमानित करने लगता है. अपने पिता की बात नही सुनता है. जिससे पिता को बहुत आघात लगता है. सबसे बड़ा आघात तब लगता है, जब उसकी बेइज्जती सरेआम होने लगती है. जिस बेटे के लिए उसने न जाने कितनी मुसीबतें सही, वही बेटे आपसी संघर्ष में उसे दो रोटी नही देते. पिताजी का घर छोड़ कर अलग आशियाना बना लेते हैं. जब पिता को बेटे की सबसे अधिक जरूरत होती है, तब उसका विलग होना उसे बहुत खलता है. वह भगवान् से जल्दी उठा ले, ऐसी प्रार्थनाएं करने लगता है. उसे चिंता हो जाती है, जिसके कारण वह असमय काल के गाल में समा जाता है. इससे तो ऐसा ही लगता है कि हर वह पुत्र जो अपने पिता की बात नही मानता. ऐसे आचरण करता है, जिसके कारण उसके पिता को दुःख होता है, और तिल-तिल अपने को मारना शुरू कर देता है और शतायु होने से पहले इस दुनिया को अलविदा कह देता है.

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