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गुजरात कैडर के आईपीएस अधिकारी राकेश अस्थाना बने सीबीआई के नये निदेशक

 Special Coverage News |  2 Dec 2016 3:06 AM GMT  |  New Delhi

गुजरात कैडर के आईपीएस अधिकारी राकेश अस्थाना बने सीबीआई के नये निदेशक

नई दिल्ली: बिहार कैडर के वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी एवं निदेशक सीबीआई अनिल सिन्हा 3 दिसम्बर को सेवानिब्रत हो रहे है. केंद्र सरकार ने गुजरात कैडर के 1984 बैच के वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी राकेश अस्थाना को सीबीआई का नया मुखिया नियुक्त किया है.

चारा घोटाले का किया था खुलासा

अस्थाना चर्चा में तब आए, जब वो नब्बे के दशक में सीबीआई एसपी के तौर पर तब के अविभाजित बिहार में तैनात थे. अस्थाना ही वो अधिकारी थे, जिन्होंने लालू के खिलाफ चारा घोटाले में न सिर्फ मामला दर्ज किया, बल्कि तब मुख्यमंत्री के पद पर बैठे लालू से छह जनवरी 1997 को छह घंटे तक मैराथन पूछताछ भी की थी. दरअसल जिस समय अस्थाना ने चारा घोटाले की जांच का सिलसिला शुरु किया, उस समय उनकी उम्र पैंतीस साल की थी.


यूपी के आगरा से भी है जुडाव

1961 में जन्मे अस्थाना तब के बिहार के सबसे प्रतिष्ठित स्कूल नेतरहाट विद्यालय से ही पढ़े थे. पिता उसी स्कूल में शिक्षक थे. 1978 में नेतरहाट से आईएससी करने के बाद अस्थाना आगरा चले गये. बिहार में शैक्षणिक सत्र काफी लेट चल रहे थे, इसलिए अपने पैतृक शहर आगरा से आगे की पढ़ाई करने का इरादा किया उन्होंने. आगरा के सेंट जॉन कॉलेज से 1982 तक इतिहास में बीए और एमए करने के बाद अस्थाना थोड़े समय के लिए दिल्ली के जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय भी अंतरराष्ट्रीय मामलों का अध्ययन करने के लिए गये . लेकिन वहां से कुछ समय बाद ही वो रांची लौट आये और शहर के सेंट जेवियर्स कॉलेज में इतिहास पढ़ाना शुरु किया. जनवरी 1983 से जुलाई 1984 तक अध्यापन कार्य करने के दौरान ही यूपीएससी की परीक्षा पास की और बतौर आईपीएस अधिकारी उन्हें गुजरात काडर हासिल हुआ.


मई 1992 में गुजरात से केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाने के साथ ही बतौर सीबीआई एसपी धनबाद में अस्थाना की तैनाती हुई. तैनाती के साथ ही अस्थाना के पास एक के बाद एक महत्वपूर्ण केस जांच के लिए आते गये. 1994 के सनसनीखेज पुरुलिया आर्म्स ड्रॉप केस की फील्ड इन्वेस्टिगेशन सुपरवाइज की अस्थाना ने. लेकिन अस्थाना के प्रोफेशनल कैरियर का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा साबित हुआ चारा घोटाला, जिसकी जांच का जिम्मा 1996 में सीबीआई को सौंपा गया.पहले पटना हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर चारा घोटाले की जांच सीबीआई के पास आई थी. उस समय सीबीआई के ज्वाइंट डायरेक्टर हुआ करते थे यू एन बिश्वास, जो बैठते थे कोलकाता में. उन्हीं के कार्यक्षेत्र में बिहार का इलाका आता था, जहां पर उनके मातहत अधिकारियों में से एक थे अस्थाना. जहां तक तब के अविभाजित बिहार में सीबीआई के प्रमुख अधिकारियों का सवाल था, उस समय पटना में बतौर डीआईजी नियुक्त थे रंजीत सिन्हा, जबकि रांची कार्यालय में तैनात थे एनसी ढौंढियाल. पटना में एसपी का भी एक पोस्ट था, जिस पर तैनात थे जाविद अहमद नामक अधिकारी. सिन्हा और ढौंढियाल थे बिहार काडर के आईपीएस अधिकारी, तो अहमद यूपी काडर के.


जल्दी ही राज्य में विपक्षी दलों की तरफ से सिन्हा और ढौंढियाल के खिलाफ ये आरोप लगाये जाने लगे कि चूंकि दोनों अधिकारी बिहार काडर के हैं, इसलिए मुख्यमंत्री लालू यादव के दबाव में जांच को सही दिशा में ले जाने की जगह डिरेल करने में लगे हैं.इसी परिस्थिति के बीच चारा घोटाले के बढ़ते मामलों की तादाद को देखते हुए सीबीआई में विशेष सेल बनाया गया, एनिमल हसबैंड्री यूनिट, जिसे संक्षिप्त में एएचडी यूनिट के तौर पर जाना गया. इसके तहत तीन एएचडी यूनिट बनाई गई, एक पटना में, तो दूसरी रांची में और तीसरी धनबाद में. जब मार्च 1996 में सीबीआई ने चारा घोटाले की जांच शुरु की, तो बिहार पुलिस से पहले के 41 मामलों को टेकओवर किया, वही आगे 13 मामले और दर्ज किये गये. इस तरह कुल मामलों की संख्या हो गई 64.जांच का सिलसिला आगे बढ़ा. जिस मामले में इसी गुरुवार को लालू को पांच साल की सजा मिली, उस मामले को सीबीआई में अस्थाना ने ही दर्ज किया. इस केस को आरसी-20 (ए) 96-डी के तौर पर जाना जाता है. 27 मार्च, 1996 को अस्थाना ने ये केस दर्ज किया, जो पहले चाईबासा थाना कांड संख्या 12/96 के तौर पर बिहार पुलिस की तरफ से दर्ज हुआ था. आखिर आरसी-20 (ए) 96-डी का मतलब क्या. आरसी से आशय है रेग्युलर केस, 20 मतलब इस सीरिज के केस की संख्या, ए मतलब एंटी करप्शन, 96 यानी वर्ष 1996 का साल और डी मतलब सीबीआई की धनबाद यूनिट.एक वक्त ऐसा भी आया, जब अस्थाना चारा घोटाले के 64 मामलों में से 53 का सुपरविजन कर रहे थे.


1999 में अस्थाना प्रोमोशन के साथ एसपी से डीआईजी बने, पटना में उनको नई पोस्टिंग मिली. लेकिन धनबाद एसपी और रांची एसपी का चार्ज तब भी उन्हीं के पास लंबे समय तक रहा. इस कारण अस्थाना धनबाद, रांची और पटना के बीच लगातार शटल करते रहे. 1996 से 2002 की अवधि के बीच अस्थाना ने चारा घोटाले के ज्यादातर मामलों की जांच की.अस्थाना का चारा घोटाले की जांच से पीछा तब छूटा, जब 2002 में चौसठवें मामले की भी चार्जशीट भर दी गई. तब तक अस्थाना सीबीआई के लिहाज से एक नया रिकॉर्ड बना चुके थे. लगातार दस साल तक सीबीआई में काम करते रहने का, वो भी एक ही इलाके में. ऐसा पटना हाईकोर्ट के आदेश के कारण हुआ था, जिसमें ये कहा गया था कि जब तक चारा घोटाले की जांच एक निश्चित मुकाम तक नहीं पहुंच जाती, इस केस से जुड़े अधिकारियों का न तो तबादला किया जाएगा और न ही उन्हें प्रतिनियुक्ति से वापस भेजा जाएगा. ऐसा ही हुआ और आखिरी चार्जशीट भरे जाने के बाद अस्थाना गुजरात वापस लौटे.



गुजरात आने के बाद उन्होंने चर्चित गोधरा कांड की जांच की. थोड़े समय तक सीआईडी क्राइम में काम करने के बाद अस्थाना वडोदरा रेंज आईजी बने, अहमदाबाद में ज्वाइंट पुलिस कमिश्नर रहे, उसके बाद वडोदरा के पुलिस कमिश्नर भी रहे और फिर बने सूरत पुलिस कमिश्नर. एक के बाद एक लगातार महत्वपूर्ण पदों पर रहे. सूरत में रहने के दौरान ही उन्होंने सूरत शहर को सीसीटीवी नेटवर्क के व्यापक जाल से जोड़ दिया, जिसकी तारीफ देश और दुनिया में हुई.चौदह साल बाद जब अस्थाना की सीबीआई में दूसरी पारी शुरु होने जा रही है, सियासी समीकरण काफी बदल चुके हैं. अस्थाना ने जुलाई 1997 में लालू की गिरफ्तारी का वारंट जारी करवाया था, जिसके बाद लालू को इस्तीफा देना पड़ा और पत्नी राबड़ी देवी को सीएम की कुर्सी पर बिठाने के साथ ही आत्म समर्पण करना पड़ा और फिर पटना के ही बेउर जेल में जाना पड़ा. उसके बाद कई दफा लालू को जेल जाना पड़ा. यही नहीं, चारा घोटाले के एक मामले में लालू को तीन अक्टूबर 2013 के दिन रांची की विशेष अदालत से पांच साल की सजा भी मिली. चारा घोटाले में सजायाफ्ता होने के बाद लालू जेल भी गये और जमानत पर बाद में बाहर आए. जेल से बाहर आने के बाद बिहार में पिछले साल हुए चुनावों में जोरदार वापसी की.


अस्थाना की जांच की वजह से ही सजायाफ्ता हुए लालू खुद तो चुनाव नहीं लड़ पाए, लेकिन अपने दो बेटों को तो जीताया ही, अपनी पार्टी आरजेडी को भी बिहार की सबसे बड़ी पार्टी बना दिया. राज्य में सत्ता की बागडोर भले ही नीतीश के हाथ में हो, लेकिन असली पावर लालू के हाथों में ही है. एक बेटा उपमुख्यमंत्री, तो दूसरा बेटा महत्वपूर्ण विभाग का मंत्री. उधर मोदी जिनके मुख्यमंत्री रहते हुए गुजरात में अस्थाना की वापसी हुई थी, वो अब देश के प्रधानमंत्री हैं पूर्ण बहुमत वाली बीजेपी की सरकार के मुखिया के तौर पर. अस्थाना मोदी के भरोसेमंद अधिकारी रहे हैं और अब सीबीआई में भी महत्वपूर्ण भूमिका की जिम्मेदारी उनको उनका लंबा-चौड़ा अनुभव और शानदार ट्रैक रिकॉर्ड के कर्ण सौंपी गई है.

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