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'मैं जितना मुसलमां हूं भाई, मैं उतना हिन्दुस्तानी हूं' इंटरनेट पर वायरल हुई हुसैन हैदरी की ये नज़्म

 Arun Mishra |  19 Feb 2017 9:36 AM GMT  |  मुंबई

मैं जितना मुसलमां हूं भाई, मैं उतना हिन्दुस्तानी हूं इंटरनेट पर वायरल हुई हुसैन हैदरी की ये नज़्मकम्यून में नज़्म पढ़ते हुए हुसैन हैदरी (यूट्यूब)

इन दिनों सोशल मीडिया पर एक नज़्म वायरल हो रही है जिसका नाम है 'हिन्दुस्तानी मुसलमां।' जिसके बोल हैं 'मैं जितना मुसलमां हूं भाई, मैं उतना हिन्दुस्तानी हूं।' इस नज़्म को एक नौजवान शायर हुसैन हैदरी ने लिखा है। ये नज़्म बताती है कि हिन्दुस्तान में एक नहीं तरह-तरह के मुसलमान बसते हैं। सभी अलग तरह से जीते हैं और सभी की अलग कहानी है। इसमें भारतीय होने का गर्व भी है और आज के समाज के साथ कंधों से कंधें मिला कर चलने की बात भी है। खुदा के दर पर सजदा करने की भी बात है और मयखाने में जाम टकराने की भी बात है। ये एक ऐसी कविता है, जिसे सुन कर आपके अंदर भारतीय मुसलमानों को ले कर कई गलतफ़ैमियां ख़त्म हो जाएंगी।

हिन्दुस्तानी मुसलमां' इस लिहाज़ से एक कामयाब नज़्म है कि इसमें भारतीय मुसलमानों की सटीक तस्वीर उभरती है। मुसलमानों के प्रति एक आम धारणा से लेकर उनकी परेशानियां, शिक़ायतें वग़ैरह सबकुछ है इस नज़्म में। ये नज़्म बताती है कि हिन्दुस्तान में एक नहीं तरह-तरह के मुसलमान बसते हैं। सभी अलग तरह से जीते हैं और सभी की अलग कहानी है। और आख़िर में हैदरी नज़्म ये कहते हुए ख़त्म करते हैं कि 'मैं जितना मुसलमां हूं भाई, मैं उतना हिन्दुस्तानी हूं.' कमाल ये कि इसे लिखने वाले हुसैन हैदरी ना तो पेशेवेर शायर हैं और ना ही अदब की कहीं से तालीम हासिल की है।

हुसैन चाहते हैं कि हमारा मुल्क़ उस दुनिया से बाहर निकले जहां कहा जाता है कि फलां समाज अच्छा है और दूसरा बुरा. हरेक की अलग ज़िंदगी और कहानियां हैं। यही तो कमाल है हिन्दुस्तान का कि यहां तरह-तरह के लोग हैं, चाहे हिंदू हो या मुसलमान और जब तक इनसे मिलेंगे-जुलेंगे नहीं, तब तक एक-दूसरे को समझेंगे कैसे?
Courtesy : Catch


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