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जानिये, ज्योतिष शास्त्र के अनुसार श्राद्ध पक्ष में कैसे होंगे पितृ प्रसन्न ?

 special coverage news |  2016-09-12 14:01:14.0  |  New Delhi

जानिये, ज्योतिष शास्त्र के अनुसार श्राद्ध पक्ष में कैसे होंगे पितृ प्रसन्न ?

श्राद्ध यूं तो पितरों को प्रसन्‍न करने के लिए किए जाते हैं लेकिन ऐसा भी माना जाता है कि श्राद्ध पितरों का ऋण चुकाने के लिए भी किए जाते हैं. हिन्दूधर्म के मुताबिक, किसी भी शुभ कार्य को शुरू करने से पहले अभिभावकों और पूर्वजों का आशीर्वाद लेना चाहिए. इसी वजह से ऋषियों ने साल में एक पक्ष को पितृ पक्ष का नाम दिया था.

क्‍यों करते हैं श्राद्ध

पितृ पक्ष में लोग अपने पूर्वजों को प्रसन्‍न करने, उनके लिए स्‍वर्ग की कामना करने हेतू और उनकी मुक्ति के लिए विशेष क्रिया संपन्न कर श्राद्ध करते हुए अर्ध्य समर्पित करते हैं.

श्राद्ध पक्ष

भाद्रपद की पूर्णिमा से लेकर आश्विन कृष्ण अमावस्या तक का समय श्राद्ध पक्ष है. पितरों को तृप्‍त करने के लिए श्राद्ध किए जाते हैं. श्राद्ध पक्ष में हर पूर्वज को याद कर उनके नाम का श्राद्ध करते हैं ताकि वे खुश रहें और अपना आशीर्वाद परिवार पर बनाएं रखें.

शास्‍त्रों में भी देवकार्य करने से पहले पितरों को तृप्‍त करने की बात कही गई है. ऐसा भी माना जाता है कि जो लोग श्राद्ध नहीं करते उन्‍हें जीवन में कई कठिनाईयों और दुःखों से गुजरना पड़ता है. सामान्‍य तौर पर हर वर्ष जिस महीने और तारीख पर पितरों का स्वर्गवास हुआ होता है श्राद्ध तभी किया जाता है.लेकिन जो लोग उन तिथियों को याद नहीं रख पाते या फिर सालभर श्राद्ध करने की क्षमता नहीं रख पाते तो सोलह दिन के श्राद्ध पक्षों में पितृपक्ष की उसी तिथि को श्राद्ध किया जाता है. जैसे पूर्णिमा पर देहांत होने पर भाद्रपद की शुक्ल पूर्णिमा पर श्राद्ध किया जा सकता है और ऐसा शास्‍त्रों में स्‍पष्‍ट रूप से बताया गया है.

कैसे करें श्राद्ध

आमतौर पर दो तरह से श्राद्ध किए जाते हैं. पहला पिंडदान करके और दूसरा ब्राह्मणों को भोजन करवाकर. लेकिन आजकल लोग तीसरा ही विकल्‍प चुनते हैं और वो हैं मंदिर में पितरों के नाम की पूजा करवाना या चढ़ावा चढ़ाना. ऐसा माना जाता है कि ब्राह्मणों को भोजन करवाने से पितरों की आत्‍मा तृप्‍त होती है.
यदि सच्‍चे मन से खासतौर पर श्राद्ध के दिनों में पितरों को याद किया जाए तो वे खुश होकर जाते हैं और अपना आशीर्वाद देते हैं. ऐसा माना जाता है कि पितरों के नाम पर उनके सभी बेटों को श्राद्ध करना चाहिए फिर वे घर से अलग रह रहे हो या फिर
साथ मेंउन्‍हें भी पूजा में शामिल होना चाहिए. शास्‍त्रों के मुताबिक, ब्राह्मणों को भोजन करवाने से पहले पूजा करते हुए गौमाता, कौएं, कुत्‍ते, चींटी और भगवान को भोग लगाया जाता है. पहले इन्‍हें बलि का नाम दिया जाता था.

श्राद्ध कर्म

पितरों को खुश करने के लिए मुक्ति कर्म किया जाता है जिसे श्राद्ध का नाम दिया गया है और पितरों को तिल के साथ मिला हुआ जल अर्पित करने की क्रिया को तर्पण कहते हैं और यही पिंडदान कहलाता है. जल इसलिए तर्पण किया जाता है ताकि पितरों की प्‍यास बुझ सके. पितरों के लिए कुछ जगहों पर ब्राह्मणों को वस्‍त्र भी दान किए जाते हैं.

श्राद्ध मंत्र का जाप

श्राद्ध पक्ष के दिनों में रोजाना इस मंत्र का जाप करना चाहिए- ।।ऊॅं नमो भगवते वासुदेवाय।।

जिस दिन श्राद्ध करना हो उस दिन श्राद्ध की शुरूआत और समापन में इस मंत्र का जाप करना चाहिए- ।।देवताभ्‍यः पितृभ्‍यश्‍च महायोगिभ्‍य एव च। नमः स्‍वाहायै स्‍वधायै नित्‍यमेव भवन्‍त्‍युत।।श्रद्धया दीयते यस्मात् तच्छादम्।। इस मंत्र का जाप श्राद्ध के दौरान किया जाता है तो आयु लंबी होती है. निरोग रहते हैं, श्रेष्‍ठ संतानोत्पति होती है साथ ही सभी इच्‍छाएं पूर्ण होती है.।
।ॐ अर्यमा न त्रिप्य्ताम इदं तिलोदकं तस्मै स्वधा नमः।...ॐ मृत्योर्मा अमृतं गमय।। इस मंत्र में पितरों के देव और पितरों को बारम्‍बार नमन किया गया है और मृत्‍यु से अमृत की ओर ले जाने की बात कही गई है.

ध्‍यान रखने योग्‍य बातें

ऐसा माना जाता है कि यदि आप श्राद्ध कर रहे हैं और उसे सही तरह से विधिपूर्वक ना किया जाए या फिर कोई भूल हो जाए तो नाराज होकर पितर श्राप भी दे जाते हैं. रात में श्राद्ध ना करें और ना ही शाम के समय.

सामान्‍य तौर पर पिता का श्राद्ध पुत्र करता है यदि पुत्र नहीं है तो पत्नी को श्राद्ध करना चाहिए. पत्नी न होने पर, सगा भाई श्राद्ध कर सकता है. एक से ज्य़ादा पुत्र होने पर, बड़े पुत्र को श्राद्ध करना चाहिए.

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