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IPS अधिकारी ने दिया माकूल जबाब: "जली हैं आग में जब जब भी शहर की सड़कें, मेरे ही पांव के छालों ने तब नमी की है"

 Special Coverage News |  7 Nov 2016 4:14 AM GMT  |  New Delhi

IPS अधिकारी ने दिया माकूल जबाब: जली हैं आग में जब जब भी शहर की सड़कें, मेरे ही पांव के छालों ने तब नमी की है

आजकल मध्यप्रदेश की जेल में प्रहरी की जघन्य हत्या कर फरार हुए 8 अपराधियों की पुलिस मुठभेड़ में मारे जाने पर तमाम मीडिया, जनवादी संगठनों, राजनेताओं, राष्ट्रवादी और मौका परस्तों द्वारा घटना के तथ्यों की मनचाही विवेचना कर निष्कर्ष पर पहुंचने की होड़ मची हुई है।निन्दा, आलोचना, दोषारोपण, तोहमत और कालिख लगाने के लिये पुलिस से बेहतर लक्ष्य कोई दूसरा नहीं हो सकता है।यूं तो पानी, बिजली, सड़क, भ्रष्टाचार,मंहगाई, बेरोजगारी, तमाम समस्याएं हैं, जुलूस, धरने,आंदोलन और प्रदर्शन के लिये, पुलिस न तो इन समस्याओं के कारण में है और न समाधान में, इतना जरूर है कि जब भी इन प्रदर्शनों में जमा भीड़ बेकाबू होती है और हिंसा, तोड़-फोड़ तथा आगजनी पर उतारू हो जाती है तो कानून व्यवस्था बनाये रखने के लिये पुलिस को कमान संभालनी पड़ती है। हिंसक भीड़ को नियंत्रित करने के लिये पुलिस को कभी लाठी, कभी अश्रु गैस और कभी गोलीबारी का सहारा लेना पड़ता है। मूल समस्याएं तो उतर जाती हैं लोगों के दिमाग से और पुलिस की ज्यादती जांच का मुद्दा बन जाती है। समस्याओं से ध्यान हटाने का और पुलिस के सिर कालिख पोतने का यह नुस्खा, जो अग्रेजों ने हिन्दुस्तान में आजमाया था, कमोवेश आज भी जारी है।चूक किसी की भी हो, खामियाज़ा पुलिस को ही भुगतना पड़ता है।


भोपाल में भी जेल प्रहरी की निर्मम हत्या कर केन्द्रीय जेल की ऊंची दीवारें फलांग कर फरार हुए इन दुर्दांत अतातायियों को पकड़ने की जिम्मेदारी भी दीपावली की उस रात थकी-हारी पुलिस की ही थी। जघन्य अपराध के आदी इन क्रूर हत्यारों को पकड़ने में पुलिस ने कोई कोताही नहीं बरती और कुछ घण्टों में ही उन्हें धराशायी भी कर दिया। अब सवाल यह है कि अपराधी असली थे और पुलिस भी असली तो फिर मुठभेड़ फर्जी कैसे हो सकती है?जहां जान का आसान्न खतरा हो, वहां क्या पुलिस समुचित बल का प्रयोग भी नहीं कर सकती? जब इस देश में एक कानून का तंत्र, लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं, मानव अधिकार के संगठन और स्वतंत्र न्यायपालिका है तो हर कोई अपना निर्णय क्यों सुना रहा है?


पुलिस हमारी आन्तरिक सुरक्षा की पहली दीवार है। आतंकवाद हो या नक्सलवाद, कानून व्यवस्था की चुनौती हो या आपदा की कोई तीज त्यौहार हो या साम्प्रदायिक तनाव, ऐसी तमाम विषम परिस्थितियों की पहली मार पुलिस ही झेलती है। पिछले 60 सालों में 35000 से ज्यादा पुलिस के जवानों ने मादरे-वतन की राह में कर्तव्य की बलवेदी पर बलिदान किया है - कवि नीरज जी के शब्दों में-


''जली हैं आग में जब जब भी शहर की सड़कें, मेरे ही पांव के छालों ने तब नमी की है।''

पुलिस मुठभेड़ की राष्ट्रव्यापी बहस के तमाम कानूनी पहलू भी हैं। एक संत से सवाल किया गया कि समाज में ऋषि, मुनियों और संतों की जरूरत कब तक है? तो उन्होंने जवाब दिया कि जब तक दुर्जन और पापी लोग समाज में हैं। निश्चित रूप से वह एक आदर्श समाज होगा, जहां पुलिस न हो, अपराध न हो, समस्याएं न हों, लेकिन जब तक समाज में अपराधी हैं, तब तक पुलिस की जरूरत भी रहेगी। मुठभेड़ पर जैसे चाहे, अनचाहे, मनचाहे सवाल कीजिए, पर आन्तरिक सुरक्षा की पहली दीवार को ध्वस्त करने की कोशिश मत कीजिये।

*लेखक मप्र के वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी एवं मप्र आईपीएस एसोसिएशन के अध्यक्ष हैं*

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