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मेनका के NGO मामले में नया खुलासा, CBI ने माना था कि जमीन के संबंध में फर्जीवाड़ा है

 शिव कुमार मिश्र |  7 Nov 2016 11:11 AM GMT  |  पीलीभीत

मेनका के NGO मामले में नया खुलासा, CBI ने माना था कि जमीन के संबंध में फर्जीवाड़ा है

पीलीभीत फैसल मलिक: केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने पीलीभीत के एनजीओ को गलत तरीके से 50 लाख रुपये का अनुदान दिया था। इस फंड के गलत या सही प्रयोग की बात बाद में आती है। यह दलील बृहस्पतिवार को मामले में शिकायतकर्ता वीएम सिंह ने दी। इस मामले में सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट को शिकायतकर्ता ने चुनौती दे रखी है।पेश मामले में मेनका गांधी व दो अन्य आरोपियों पर 2001 में फर्जी तरीके से एक ट्रस्ट को 50 लाख रुपये का अनुदान देने का आरोप है। सीबीआई ने 2006 में इस मामले में मुकदमा दर्ज किया था। अदालत ने अगली सुनवाई के लिये एक दिसंबर 2016 की तारीख तय की है।



सीबीआई अदालत ने सीबीआई को उस बैठक के मिनट्स पेश करने का निर्देश दिया, जिसमें मेनका गांधी ने एनजीओ को अनुदान संबंधी प्रस्ताव स्वीकार किया था। अदालत ने शिकायतकर्ता को हाईकोर्ट व निचली अदालत के फैसले की कॉपी पेश करने के लिये कहा है।जमीन संबंधी फर्जी दस्तावेज पेश किये थपटियाला हाउस स्थित विशेष सीबीआई जज अंजू बजाज चांदना के समक्ष वीएम सिंह ने कहा कि जिस एनजीओ को 50 लाख रुपये की अनुदान राशि दी गई उसने जमीन संबंधी फर्जी दस्तावेज पेश किये थे। इन तथ्यों की सीबीआई की कभी भी जांच नहीं की। इसलिये सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार न किया जाये।


कोर्ट में बहस करते हुये शिकायतकर्ता ने कहा कि एनजीओ ने सरकारी अस्पताल की जमीन को अपना बताया था। इसके अलावा यह एनजीओ तीन साल पुराना नहीं था। इसलिये इसे अनुदान नहीं मिल सकता था। इसके बावजूद तत्कालीन मंत्री मेनका गांधी ने एनजीओ को 50 लाख रुपये का अनुदान दिया।कोर्ट के समक्ष शिकायतकर्ता ने कहा कि एनजीओ ने अनुदान राशि मिलने के बाद काम करवाना शुरू नहीं किया बल्कि उसकी एफडीआर बनाकर 18 महीने तक बैंक में रखी। जब मामले की जांच शुरू हुई तब काम करवाना शुरू किया।सीबीआई ने माना था कि जमीन के संबंध में फर्जीवाड़ा हुआसीबीआई ने अपनी प्राथमिक जांच में माना था कि जमीन के संबंध में फर्जीवाड़ा हुआ है। दूसरी ओर सीबीआई ने केस की जांच में कहा कि जो पैसा एनजीओ को मिला था, उसका पूरा इस्तेमाल नर्सिंग कॉलेज बनाने के लिये किया गया।


एजेंसी ने इस मामले में करीब दो साल की जांच के बाद 2008 में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की थी, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया था। कोर्ट ने एजेंसी को मामले की आगे जांच करने का निर्देश दिया था। इसके बाद एजेंसी ने मई 2015 में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर आरोपियों को क्लीन चिट दी। इसके विरोध में शिकायतकर्ता ने याचिका दायर कर चुनौती दी।हाईकोर्ट के आदेश पर सीबीआई ने 2006 में मेनका गांधी, मौलाना आजाद एजुकेशन फाउंडेशन के पूर्व सचिव डॉ. एफयू सिद्दीकी व गांधी रूरल वेलफेयर ट्रस्ट के पूर्व प्रबंधकीय न्यासी डॉ. विजय शर्मा के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया था।एजेंसी का आरोप था कि मेनका गांधी ने सिद्दीकी के साथ साजिश कर मौलाना आजाद एजुकेश फाउंडेशन से गांधी रूरल वेलफेयर ट्रस्ट को गलत तरीके से 50 लाख रुपये का अनुदान दिया था। यह राशि पीलीभीत में नर्सिंग कॉलेज की बिल्डिंग बनाने के लिये दी गई थी। इसमें डॉ. विजय शर्मा को फायदा पहुंचाया गया था।


सीबीआई का आरोप है कि इसके बाद पीलीभीत के डीएम एसके वर्मा ने भी मेनका गांधी की संसदीय निधि (एमपी लेड फंड) 10.40 लाख रुपये की राशि दो एंबुलेंस खरीदने के लिये गांधी रूरल वेलफेयर ट्रस्ट को दी थी। यह राशि ट्रस्ट के तत्कालीन प्रबंधकीय न्यासी रमाकांत रामपाल को दी गई थी।


एजेंसी का आरोप था कि इस पैसे से एंबुलेंस खरीदने के बजाय रामपाल ने दो जीप खरीदी थीं। इन जीप का मूल्य स्वीकृत मॉडल से काफी कम था और इन्हें मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने प्रमाण पत्र जारी नहीं किया था। इन वाहनों का इस्तेमाल प्रबंधकीय न्यासी अपने निजी कार्यों के लिये भी करते थे।

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