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तुम आओगे ना ..................

 Special Coverage News |  10 Nov 2016 10:56 AM GMT  |  अयोध्या

तुम आओगे ना ..................

5 जून 1979 को उत्तरप्रदेश के फैज़ाबाद जनपद में स्थित प्रभु श्री राम की पावन जन्मस्थली में जन्मी उमा द्विवेदी इतिहास एवं पुरातत्व में स्नातकोत्तर करने के बाद हिंदी साहित्य से गहन लगाव और साहित्यिक अभिरुचि के कारण काव्य रचनाएँ करती रही हैं।

पन्नों पर उतरने वाली संवेदनाओं की चुभन और कसक की नमी उनकी रचनाओं में बखूबी महसूस की जा सकती है ! उमा की रचनाओं में प्रेम ,समर्पण , उल्लास , ख़ुशी ,मायूसी , उलाहना सभी भाव करीने से पिरोये मिलते हैं । एक चेहरे का सच नहीं, एक सच का चेहरा! जिसे उमा ने गाँव, क़स्बों और शहरों के चेहरों के बीच गढ़ा है। एक सच्चा सच उमा की रचनाओं में जीवन्त और ज्वलंत रूप में विद्यमान है कि उसकी प्रतिध्वनि लंबे समय तक सुनाई देगी।

उमा की रचनाओं की सबसे बड़ी विशेषता है कि इनमें हिमालय-सी अटलता भी है और गंगा-सा प्रवाह भी। उमा की रचनाओं के कॅनवास पर दूर तक फैला हुआ एक चिन्तन प्रदेश मिलता है, सफ़र का उतार-चढ़ाव नहीं, मील के पत्थर भी नहीं कि जिन पर एक क्षण बैठकर हम रचनाकार के पद-चिन्हों को आंक सकें कि कहाँ वह ठिठका था, कौन-सी राह चुनी थी, किस पगडंडी पर कितनी दूर चलकर वापस मुड़ गया था ! हमें यह भी नहीं पता चलता कि किस ठोकर की आह और दर्द उसके पन्नों पर अंकित है।

उमा की रचनाओं को पढ़कर लगता है कि यातना के भीतर भी इतना रस, इतना संगीत, इतना आनन्द छलक सकता है; सूखी परती ज़मीन के उदास मरुथल में सुरों, रंगों और गंध की रासलीला देख सकता है; सौंदर्य को बटोर सकता है और ऑंसुओं को परख सकता है। किन्तु उसके भीतर से झाँकती धूल-धूसरित मुस्कान को देखना नहीं भूलता।

नई पीढ़ी का सटीक प्रतिनिधित्व कर रही उमा को पढ़ना, वीणा के झंकृत स्वरों को अपने भीतर समेटने जैसा है। इस नवोदित रचनाकार ने सोशल मीडिया में अपनी रचनाओं के जरिये अपनी पहचान बनाई । स्थानीय पत्र-पत्रिकाओं में कवितायेँ , गज़ले प्रकाशित होती रहती है । आकाशवाणी के फैज़ाबाद केंद्र से काव्यपाठ और चर्चाओं में सहभागिता करती रहती है ।

रचनाधर्मिता का उन्वान हैं उमा की काव्य रचनाएँ ....!!

तुम आओगे ना
जब कभी अकेले में

घाट की सीढ़ियों पे बैठ कर
सोचा है तुम्हारे बारे में ,
सीढ़ियों पे अपने साथ

कई बार बैठे पाया है तुम्हें ख्यालों में
दूर होकर भी तुम हमेशा ही रहे हो साथ मेरे..,
नदी के शीतल जल में मैंने

हर बार महसूस की है तुम्हारे प्रेम की शीतलता
नदी के पानी में लहराती तुम्हारी छवि -

अपलक निहारती ,तुम्हें मुस्कुराते हुए देख उस जल में
अपने हर दर्द भूल कर जीना चाहा है
नदी के पानी को अंजुलि में भरके
महसूस किया है तुम्हें कई बार अपने क़रीब
और हर बार एक उम्मीद जगी है मन में...

तुम आओगे
ज़रूर आओगे....
इसी नदी तट पर इन्हीं सीढ़ियों पे बैठ
हमारे प्रेम को सार्थकता देने
ख्वाबों को हक़ीक़त का रंग भरने...
सुनो
तुम आओगे न .....
बोलो , तुम सच में आओगे न..........!!

2-
तुम्हारी बेरुख़ी
हर बार दर्द देती है
छलक पड़ती हैं आँखें
पलकों का बांध तोड़ के
मौन , ख़ामोश निहारती अपलक ,
बहुत बार सोचा

जताऊं तुमसे अपनी नाराज़गी
महसूस करवाऊं अपनी पीड़ा का भान
जब-जब

तुमने अपनी बातों से
परायेपन का एहसास करवाया
मेरा वजूद बिखरता नज़र आया

मग़र
कैसे करती शिक़ायत ..
कैसे जताती नाराज़गी..
तुमने अपना बनाया ही कब मुझे..?

ज़ब तुमने क़भी किया ही नही प्रेम का इज़हार
तो कहाँ से लाते हम नाराज़गी का अधिकार ...?

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