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ग्राम प्रधानों के जरिये मिशन – 2017 फतह करने की अखिलेश की तैयारी!

 शिव कुमार मिश्र |  28 Oct 2016 6:35 AM GMT  |  लखनऊ

ग्राम प्रधानों के जरिये मिशन – 2017 फतह करने की अखिलेश की तैयारी!

प्रो. (डॉ.) योगेन्द्र यादव

अखिलेश का राजनीतिक भविष्य बहुत कुछ मिशन -2017 की फतह पर निर्भर करता है. सही मायने में यह अखिलेश यादव के नेतृत्व में लड़ा जाने वाला पहला चुनाव है. गलतियाँ तो बहुत कर रहे हैं, क्योंकि लगता है उनके भी सलाहकार एसी में ही बैठ कर फोन, व्हाट्सअप एवं सोशल मीडिया द्वारा फैलाई जा रही भ्रामक खबरों के आधार पर उन्हें सलाह दी जा रही है. खैर उनका पोस्ट मार्टम करने के लिए यह लेख नही है. यहाँ मैं ग्राम प्रधानों के माध्यम से सत्ता प्राप्ति का जो सपना अखिलेश यादव देख रहे हैं, वह कितना कारगर है, इसका विश्लेषण कर रहा हूँ.

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इसमें कोई दो राय नही है कि समाजवादी पार्टी समर्थित ग्राम प्रधानों, ब्लाक प्रमुखों एवं जिला पंचायत अध्यक्षों-सदस्यों की एक लम्बी फेहरिस्त है. यदि ये सभी लोग ईमानदारी से अपने दायित्वों का निर्वहन करें, निष्ठा के साथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के साथ नमक हलाली करें, तो मिशन – 2017 फतह करने से उन्हें कोई नही रोक सकता है. इस दिशा में अखिलेश यादव ने एक मुख्यमंत्री के रूप में शुरू से ही काम करना शुरू कर दिया था. जिस समय वे मुख्यमंत्री बने उस समय ग्राम प्रधानों का मानदेय केवल 700 रूपये था. जिसे 2014 में बढ़ा कर उन्होंने 2500 रूपये कर दिया था. कल फिर उन्होंने उसमें 1000 रूपये की बढ़ोत्तरी करके उसे 3500 रूपये कर दिया. साथ ही यह भी वायदा कर दिया कि यदि मिशन – 2017 में आप लोग हमारी सरकार बनाते हैं, तो हम इस मानदेय राशि को दुगुना यानि 7000 रूपये कर देंगे. सिर्फ इतना ही नहीं अखिलेश यादव ने उनके वित्तीय अधिकार में भी बढ़ोत्तरी कर दी है. पहले वे अपनी मर्जी से केवल 50,000 का काम करवा सकते थे, अब वे दो लाख रूपये का का काम करवा सकेंगे. इस प्रकार इस अधिक विषय में चार गुना बढ़ोत्तरी करके मुख्यमंत्री ने उन्हें खुश करने की कोशिश की है. उनकी व्यय करने की राशि में भी तीन गुना वृद्धि करके उसे 15000 रूपये कर दिया गया है.

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सवाल यह है कि क्या ये ग्राम प्रधान अखिलेश के लिए मिशन – 2017 में लाभदायी होंगे. जहाँ तक देखने में आया है, हर गाँव में दो या दो से अधिक गुट होते हैं. इनमें आपसी रंजिश तक प्रतिद्वंदिता होती है. यदि ग्राम प्रधान अपने गाँव में कराये जा रहे कार्यों में पारदर्शिता रखता है, कमीशन के नाम पर सरकारी राशि की ज्यादा लूट नही मचाता है. उसका व्यवहार मृदुल है. नाली-खडंजे, चकरोट आदि में न्याय करता है. चाहे किसी ने वोट दिया हो या न दिया हो, किसी से दुश्मनी न मानता हो. अहंकारी न हो. उम्र अनुसार अभिवादन लेता और करता हो, तो वह मिशन – 2017 में अखिलेश यादव के लिए लाभकारी हो सकता है, यानि इनके पक्ष में मतदान करवा सकता है. यदि उसका आचरण ग्राम वासियों के अनुकूल नही होगा, तो लोगों के कहने का कोई असर नही होगा. उसके विपरीत लोग मतदान करेंगे.

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गांवो में घुमते हुए मुझे एक बात और समझ में आई कि आज का ग्राम प्रधान निरंकुश हो गया है. उसका बर्ताव गाँव के लोगों से साथ मधुर नही होता है. वह एक बड़ी राशि खर्च करके चुनाव जीतता है. इसलिए उस राशि की भरपाई करने के लिए कई गुना कमाने की सोचता है. प्रलोभन देकर उसने चुनाव जीता है, इसलिए उसी राह पर चल कर ही वह वोट दिलवा सकता है. क्योंकि उसके लिए जो काम करेंगे, वे उसी परिपाटी पर करेंगे, जिस परिपाटी पर उन्होंने प्रधानी के चुनाव में किया था.

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एक दूसरा तथ्य भी भ्रमण करते हुए मुझे ध्यान में आया कि विधान सभा या लोक सभा चुनाव में ग्राम प्रधानो का कोई विशेष प्रभाव ग्रामवासियों पर नही होता है. ग्राम प्रधान के चुनाव में निजी पसंद एवं निजी स्वार्थ काम करता है, जबकि विधानसभा के चुनाव में इसके विपरीत प्रक्रिया होती है. वह व्यक्ति जो उनके काम आया हो, या काम आने वाला हो, या उनका पहले से ही जिस पार्टी की तरफ झुकाव होता है, उसी को वे वोट करते हैं. केवल दो या तीन प्रतिशत मत ही ऐसा होता है, जो इधर-उधर दोलायमान होता है. उसी को नियंत्रित करने की जरूरत होती है. यदि ये ग्राम प्रधान उन दोलायमान मतों को अखिलेश के पक्ष में डलवाने के कामयाब हो गये, तो निश्चित ही उन्हें फायदा होगा, अन्यथा नही. वैसे अखिलेश चाहे जो दंभ भरें, इस बार सपा जनता की उन अपेक्षाओं पर खरी नही उतरी है, जिसके लिए सपा मुखिया ने उसे प्रतिष्ठित किया था. जिन युवाओं पर वे दंभ भर रहे हैं, सपा को वोट करने वाले पढ़े-लिखे युवा त्रिस्तरीय मुद्दे को लेकर बेहद नाराज हैं. इनमे से अधिकांश गाँव के युवा हैं. उन्हें ये ग्राम प्रधान कैसे मैनेज करते हैं, यह देखने की बात है.


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