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अखिलेश शिवपाल प्रसव पीड़ा से पीड़ित, दर्द से छटपटा रहे है दोनों चीख भी रहे!

 शिव कुमार मिश्र |  8 Nov 2016 4:01 AM GMT  |  लखनऊ

अखिलेश शिवपाल प्रसव पीड़ा से पीड़ित, दर्द से छटपटा रहे है दोनों चीख भी रहे!

प्रो. (डॉ.) योगेन्द्र यादव

जब जीत के लिए पूरा जोर लगाने की जरूरत है, ऐसे समय में अखिलेश एवं शिवपाल दोनों एक – दूसरे को नंगा करने पर तुले हुए हैं. किसने किसके साथ क्या किया, यह दास्ताँ सुनाने में लगे हैं, वह भी मंचो से. पदासीन होने के पूर्व प्रदेश के राज्यपाल के सामने जो शपथ ली थी, उसका उल्लंघन कर रहे हैं. यह सब ठीक उसी तरह हो रहा है, जब कोई बच्चे को जन्म देने वाली महिला से महिला डॉक्टर यह कहती है, कि अपने दांत अच्छी तरह से भींच लो, और जोर लगाओ. यदि उस स्त्री का मुह खुल जाता है, असहनीय पीड़ा से वह चिल्लाने लगती है, तो उसके प्रसव में महिला डॉक्टर को बहुत कठिनाई होती है. फिर बिना आपरेशन के डिलीवरी संभव नही होती है. सीजेरियन करने का एक भी प्रबल कारण है.


इसी तरह की पीड़ा से इस समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री एवं प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल पीड़ित हैं. जब तक दोनों के मुह नही खुले थे, तब तक तमाम अंतर्विरोध होने के बावजूद पार्टी में सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था. ये दोनों भी अपने-अपने काम को बखूबी अंजाम दे रहे थे. लेकिन जैसे ही अखिलेश द्वारा मंत्रिमंडल से निकालने की कार्रवाई की. फिर मंत्रिमंडल में न लेने के निर्णय पर अडिग हुए, शिवपाल का हश्र वही हुआ, जिसकी आशंका व्यक्त की जा रही थी. डॉक्टर के लाख समझाने के बावजूद भी जिस तरह से डीलिवरी बेड पर लेटी हुई महिला चिल्लाने लगती है. ठीक उसी प्रकार शिवपाल भी चिल्लाने लगे. उनकी चिल्लाहट से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री भी अपने को बहुत देर तक निष्प्रभावी नही रख सके. उनके भी मुह खुल गये. और प्रतिक्रिया स्वरूप ही सही, वह भी चिल्लाने लगे.


जिसके कारण समाजवादी पार्टी में विषम स्थिति उत्पन्न हो गयी. जिस समय पूरा विपक्ष आगामी विधानसभा में पूरे जोर-शोर के तयारी में लगा हुआ है. उस समय समाजवादी पार्टी अपने अंतर कलह से जूझ रही है. जब उसे संयुक्त रूप से विपक्षियों का सामना करना चाहिए, उस समय वह अपने घर में भी जोर आजमाइश कर रही है. पार्टी के ही लोगों को शिकस्त देने पर तुली हुई है. यह स्थिति यदि दोनों तक ही सीमित होती, तो गनीमत थी, लेकिन इस लड़ाई में पूरा प्रदेश शामिल हो गया है. बूथ एवं सेक्टर स्तर तक के नेताओं में अखिलेश एवं शिवपाल गुट हो गये हैं. इनकी लड़ाई राजनीतिक होती, तो भी गनीमत होती. पार्टी के निचले स्तर पर यह गुटबाजी निजी दुश्मनी के रूप में परिवर्तित हो रही है. जिसे इन दोनों के एक होने की स्थिति में भी पाटा नही जा सकता है.


इन दोनों नेताओं की प्रतिद्वंदिता इतनी आगे बढ़ चुकी है कि अब सुलह की कोई कोशिश कामयाब होगी, इसमें संदेह है. यदि कोशिश कामयाब भी हो जाए, तो उनके इस एका पर जनता विश्वास नही करेगी, यह अकाट्य सत्य है. इस तरह से साथ रहने में हर तरह से समाजवादी पार्टी का नुक्सान है. इसलिए डिलीवरी क्राई से पीड़ित स्त्री की तरह इनका भी ओपरेशन कर देना चाहिए. फिर पार्टी के उस धड़े के साथ अधिकांश लोग जुड़ जायेंगे, जो विपक्ष को मजबूत चुनौती पेश करता हुआ दिखेगा. इससे जनता एवं मतदाता के बीच का संशय भी खत्म हो जाएगा. भविष्य में ऐसा सब कुछ ठीक-ठाक नही रहेगा, यह संशय भी दूर हो जाएगा.

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