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क्यों मौन है मोदी?

 संजय शर्मा लखनऊ सम्पादक 4 PM |  7 Dec 2016 2:26 AM GMT  |  लखनऊ

क्यों मौन है मोदी?

संजय शर्मा लखनऊ

नोटबंदी के बाद से राजनीतिक गलियारों में बहुत शोर-शराबा है। विपक्षी दल लगातार नोटबंदी का विरोध कर रहे हैं। संसद से सडक़ तक विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं बावजूद इसके वे मोदी सरकार को बैकफुट पर नहीं ला पाए। संसद में पीएम मोदी के बयान के बाद आगबबूला विपक्ष लगातार मोदी से माफी मांगने की मांग करता रहा लेकिन माफी तो दूर पीएम मोदी ने इस मुद्दे पर बात करना भी जरूरी नहीं समझा। दोनों सदनों में विपक्षी दलों को उम्मीद थी कि प्रधानमंत्री नोटबंदी के मुद्दे पर उनकी जिज्ञासा शांत करेंगे, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। और तो और पीएम मोदी ने 'मौन' धारण कर लिया। पीएम मोदी अच्छे से जानते हैं कि उन्हें कब मौन धारण करना है। इससे पहले भी जब विपक्ष ने मोदी से सफाई की उम्मीद की तो मोदी ने मौन साध लेने में ही भलाई समझी।



मोदी सरकार को सत्ता में आए ढाई साल का वक्त हो गया। सरकार के कार्यकाल का आधा वक्त बीत चुका है और ऐसा कई बार देखने को मिला है कि जब देश की जनता और विपक्षी दल मोदी से उम्मीद करते हैं कि वे लोगों की जिज्ञासा शांत करेंगे तब ऐसा कुछ नहीं हुआ। दूर जाने की जरूरत नहीं, पिछले साल अगस्त में मानसून सत्र में संसद के दोनों सदनों में ललितगेट कांड और व्यापमं घोटाले पर जमकर हंगामा हुआ। विपक्ष लगातार इस मुद्दे पर पीएम मोदी से संसद में जवाब देने की मांग करता रहा लेकिन मोदी ने एक शब्द भी नहीं कहा। संसद सत्र समाप्त हो गया और उसी के साथ वह मुद्दा भी।


ऐसा ही पिछले साल अक्टूबर माह में दलित साहित्यकारों की हत्या और दादरी कांड के बाद पूरे देश में उपजे सांप्रदायिक तनाव के वक्त दिख। उस समय पीएम मोदी से उम्मीद की गई थी कि वह कुछ बोलेंगे लेकिन घटना के एक महीने बाद पीएम बोले। पीएम ने दादरी कांड और अन्य मुद्दों पर दुख जताया। लेकिन घटना के एक माह बाद पीएम के बोलने पर भी सवाल खड़ा हुआ। राजनीतिक पंडितों की माने तो पीएम मोदी अच्छे से जानते हैं कि जिस मुद्दे पर विपक्ष उनसे सफाई चाहता है, उनके सफाई देने के बाद वह निश्चित रूप से मुद्दा बन जाएगा। इसलिए वह जवाब देना जरूरी नहीं समझते। एक वक्त था जब मोदी पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मौन रहने पर माखौल उड़ाते नहीं थकते थे। वह उन्हें 'मौन मोहन सिंह' कहते थे और आज खुद मनमोहन सिंह की परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं। मोदी सरकार बनने के बाद से संसद के दोनों सत्रों में काम कम हंगामा ज्यादा हुआ। सदन में विपक्षी दलों ने हर बार यहीं मांग की कि पीएम मोदी आकर जवाब दें लेकिन पीएम ने मौन से ही काम चला लिया। इस बार तो हद हो गयी। नोटबंदी के बाद से पूरे देश में अव्यवस्था का माहौल है। सभी को उम्मीद थी कि संसद में सब कुछ साफ हो जाएगा। पीएम मोदी विपक्ष की जिज्ञासा शांत करेंगे। मोदी सदन में आए तो लेकिन सफाई न देेकर विपक्ष को ही कटघरे में खड़ा कर दिया। पीएम ने तंज किया कि कुछ लोग इसलिए नाराज है कि सरकार ने तैयारी के लिए समय नहीं दिया। इसके बाद से तो विपक्ष का हंगामा और तेज हो गया। इसके अलावा संसद के इस सत्र में पूर्व पीएम मनमोहन सिंह मुखर होकर बोले और मोदी चुप बैठे रहे और तो और ब्रेक के बाद संसद भी नहीं लौटे। संसद सत्र शुरू होने से पहले पीएम मोदी विपक्ष से संसद की कार्यवाही में अपील जरूर करते हैं लेकिन खुद कोई सहयोग नहीं करते।



पिछले ढाई साल की सत्ता में कई घटनाएं ऐसी हुईं जिस पर पीएम मोदी से उम्मीद की गई कि वह बोलेंगे, देश की जनता को तसल्ली देंगे लेकिन उस समय मोदी कभी नहीं बोले। उन घटनाओं पर मुंह भी खोला तो काफी दिन बाद। दरअसल, यह पीएम मोदी की रणनीति है। वह उन मुद्दों पर कतई नहीं बोलते जो बड़े मुद्दे बन सकते हैं। वह जानते हैं कि यदि वह सफाई देंगे तो निश्चित ही इसके लिए सरकार जिम्मेदार हो जाएगी। इसीलिए वह बोलने से बचते हैं। मोदी वही बोलते हैं जो सरकार के लिए फायदेमंद है। जिन बातों से जनता को खुश किया जा सकता है वह सिर्फ वहीं बोलते हैं, विपक्ष क्या बोलता है उन्हें इससे कोई सरोकार नहीं।

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