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समाजवादी परिवार में कलह के मुख्य कारण जानकार होंगे हैरान आप भी !

 Special Coverage News |  27 Oct 2016 6:41 AM GMT  |  New Delhi

समाजवादी परिवार में कलह के मुख्य कारण जानकार होंगे हैरान आप भी !

प्रो. (डॉ.) योगेन्द्र यादव


इस समय समाजवादी पार्टी में जो विवाद या टकराव के हालात बने हुए हैं, जिसको लेकर नाना प्रकार की बातें आपस में भी और मीडिया पर भी चल रही हैं. ऐसा मंजर पेश किया जा रहा है कि जैसे पूरे का पूरे दल का शिवपाल एवं अखिलेश के समर्थक के रूप में ध्रुवीकरण हो गया है. यह भी बताया जा रहा है कि सपा मुखिया मुलायम सिंह शिवपाल का पक्ष ले रहे हैं. उन्हें अपने पुत्र की बढ़ती लोकप्रियता से ईर्ष्या हो रही है. प्रो. राम गोपाल को भाजपा से मिले होने के आरोप भी लगे हैं. प्रो. राम गोपाल उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के प्रबल समर्थक हैं. उनके बयानों एवं हालिया किये गये प्रयासों से ऐसा लगता है. जबसे शिवपाल जी को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया, तबसे ऐसा लग रहा है, जैसे शिवपाल जी ने अखिलेश के समर्थकों के खिलाफ हल्ला बोल दिया है. जबकि सच्चाई कुछ और है. टकराव का कारण न तो अहम की लड़ाई है और न ही किसी के बहलाने-फुसलाने से वे लोग ऐसा कर रहे है. फिर असली कारण क्या है ? उसी पर मैं अपना विश्लेषण प्रस्तुत कर रहा हूँ. इधर मुझसे कई लोगों ने पूछा कि आज-कल आप जो कुछ हो रहा है, उस पर लिख नही रहे हैं. हम लोगों को लड़ाई के कारण समझ में नही आ रहा है ? इस कारण मैं अपने पाठकों के लिए इस पर प्रकाश डाल रहा हूँ.


1. पीढ़ी का अंतर – समाजवादी पार्टी इस समय दो खेमों में इसलिए बंटी हुई प्रतीत हो रही है. क्योंकि उसके पीछे दोनों पक्षों के स्व अनुभव रूपी ज्ञान की पराकाष्ठा है. उसी पर अमल है. यह पार्टी समाजवाद के जिस चौख्म्भे पर खड़ी है. उसके सैद्धांतिक ज्ञान एवं प्रायोगिक तरीकों को समझने का प्रयत्न दोनों पक्षों द्वारा नही किया जा रहा है. इसे हम पीढ़ी का अंतर भी कह सकते हैं. दोनों पक्ष लगातार यह बात मीडिया के सम्मुख कह रहे हैं कि परिवार और पार्टी में कोई मनभेद व् मतभेद नहीं है. लेकिन जिस प्रकार की घटनाएं घट रही हैं, उसे देख कर कोई भी उनकी इस बात पर विश्वास नही कर रहा है. जबकि दोनों सही बोल रहे हैं. इसके साथ इन दोनों नेताओं को भी इस बात का अनुभव हो रहा है कि वे दोनों एक दूसरे के प्रति बदले की भावना से काम कर रहे हैं. इसमें भी सच्चाई नही है. दोनों सिर्फ अपना और अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए काम कर रहे हैं. इसके अतिरिक्त एक ओर जहाँ अखिलेश यादव युवा पीढ़ी का नेतृत्व कर रहे हैं, वहीँ दूसरी ओर शिवपाल यादव प्रौढ़ लोगों का नेतृत्व कर रहे हैं. शिवपाल की पीढ़ी इस बात का दंभ है कि पार्टी को आज की स्थिति में पहुचाने क श्रेय हम लोगों का है. इसलिए इस सरकार और संगठन में अधिक भागीदारी हम लोगों की बनती है. जबकि युवा पीढ़ी के आइकान बन चुके अखिलेश यादव ने अपनी सरकार एवं संगठन दोनों में ही युवाओं को तरजीह दी. जिसके कारण शिवपाल की पीढ़ी के लोग नेताजी का कान भरने लगे. यह बात जरूर है कि अखिलेश के प्रेम का कई युवा नेताओं ने बेजा फायदा उठाया और पार्टी की छवि को गिराने की भरपूर कोशिश की. इनकी इन हरकतों से पार्टी के प्रौढ़ नेताओं ने अपने को सीमित कर लिया. उन्होंने यह मान लिया कि अब हम लोगों के दिन लद गये. कई मंत्रियों ने तो इसकी घोषणा भी अपने समर्थकों एवं साथियों के साथ चर्चाओं में करने लगे. इसी पीढ़ी अंतर के कारण आज पार्टी में मनभेद उभरा हुआ दिखाई दे रहा है.


2. कार्य – प्रणाली का अंतर – शिवपाल ने जबसे राजनीतिक होश संभाला है, तभी से सपा मुखिया मुलायम सिंह के साथ प्रत्यक्ष – परोक्ष रूप से जुड़े हुए हैं. जिस समय मुलायम सिंह राजनीति के फलक पर उभरे. उस समय उन्होंने अपनी यादव जाति के लोगों को जागृत किया. इसके साथ-साथ सांप्रदायिक शक्तियों से लड़ने के लिए मुसलमानों का विश्वास जीता. उन्हें दल एवं दिल में जगह दी. उनके इन प्रयासों के कारण भी समाजवादी पार्टी के मूल वोटर के रूप में यादव एवं मुसलमान जाने जाने लगे. बड़ी ईमानदरी से सपा मुखिया मुलायम सिंह ने एवं माय के गठजोड़ ने एक दूसरे का साथ दिया. इसके विपरीत समाजवादी राजनीति में जब अखिलेश यादव का पदार्पण हुआ. तब तक समाजवादी पार्टी माय के गठजोड़ से आगे बढ़ चुकी थी. धीरे-धीरे उसमें सवर्णों – पिछड़ों का भी वर्चस्व होने लगा था. सुशिक्षित होने के कारण अखिलेश में जातीय कट्टरता का अभाव मिलता है. यानी वे जितना सम्मान एक यादव को देते हैं, उतना ही सम्मान एक क्षत्रिय को देते हैं, उतना ही सम्मान एक कुर्मी को भी देते हैं. यानी डॉ. राम मनोहर लोहिया ने जिस समाजवाद की कल्पना की थी, उस समाजवाद को पूर्ण रूपेण अखिलेश ने जमीन पर उतारा. इसके कारण अखिलेश माय की भागीदारी संख्या में कमी आई. ऐसे लोगों ने कुछ उत्साही नौजवानों को अपनी आवाज का माध्यम बना कर इस बात को समय –समय पर उभारा भी. आज के हालात के जिम्मेदार कारकों में एक कारण यह भी है.


3. भाजपा से नजदीकी के आरोप का कारण – समाजवाद साम्प्रदायिकता फ़ैलाने वाले लोगों की सख्त लहजे में खिलाफत करता है. किन्तु जिस नव समाजवाद का पोषण अखिलेश यादव कर रहे हैं, उसमें केवल समाजवाद उग्रपंथी हिंदुत्व का ही नही उग्रपंथी मुसलमानों का भी प्रतिरोध है. इसी कारण तीन तलाक के मसले को सबसे पहले समाजवाद के प्रणेता डॉ. राम मनोहर लोहिया ने उठाया था. जिसकी घोषणा कुछ दिन पहले सपा मुखिया मुलायम सिंह ने भी की थी. जातीयता से ऊपर उठने एवं सभी अमन पसंद हिन्दुओं की वकालत करने के कारण भी उन पर समय –समय पर भाजपा से नजदीकियों का आरोप लगता है. अब हम भाजपा के दृष्टिकोण को भी थोड़ा सा समझ लें, तो यह बात और क्लीयर हो जायेगी. यदि हम देश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा उठाये गये कुछ कदमों को देख लें, तो उन्होंने भी केवल उन मुसलमानों की खिलाफत की है, जो राष्ट्रवादी नही हैं. उग्र हिन्दुओं की भी उन्होंने समय –समय पर भर्त्सना की है. लेकिन व्यवहार में सपा का दृष्टिकोण सम्पूर्ण सम्प्रदायों की सुरक्षा एवं विकास को प्रश्रय देता है. कहने का तात्पर्य यह है कि सम्पूर्ण हिन्दुओं का प्रश्रय देने के कारण सपा एवं भाजपा के चरित्र में कुछ साम्यता आई है. जिसके आधार पर ही अखिलेश की भाजपा से वैचारिक नजदीकियों की बात कही जाती है. जबकि शिवपाल में उस स्तर तक यह स्वीकार्यता नही आई है. उनके समय में विरोध का मतलब मिलना जुलना भी अनुचित है, इसी कारण सपा के राष्ट्रीय महासचिव प्रो. राम गोपाल के खिलाफ कार्रवाई की गयी.


4. विशेषज्ञता में भिन्नता – समाजवाद के हिसाब से सरकार चलाने की काबिलियत जितनी अखिलेश में है, उतनी शिवपाल में नही होगी, ऐसा माना जाता है. लेकिन सांगठनिक क्षमता में शिवपाल अखिलेश से ज्यादा माहिर हैं. उन्होंने इस क्षेत्र में सपा मुखिया मुलायम सिंह के साथ काम किया है. इसलिए क्षेत्रीय, जातीय एवं सांप्रदायिक संतुलन कहाँ कितना होना चाहिए, वे बखूबी जानते हैं. इस क्षेत्र में अखिलेश यादव को काम करने का मौका नही मिला. जिन युवाओं को लेकर उन्होंने सुश्री मायावती का विरोध किया था, उन्ही के द्वारा दी गयी जानकारियों एवं उन्ही की पसंद की टीम उन्होंने तैयार की. यह बात और है कि जिन लोगों को इन लोगों ने जोड़ा, वे उनसे अधिक लायल निकले.


5. महत्वाकांक्षा – इस तथ्य से इंकार नही किया जा सकता कि शिवपाल एवं अखिलेश दोनों महत्वाकांक्षी हैं. जहाँ के ओर अखिलेश किसी तरह का व्यवधान न हो, इसलिए मुख्यमंत्री एवं प्रदेश अध्यक्ष दोनों पदों पर काबिज रहना चाहते हैं. वहीँ शिवपाल की दिली इच्छा सत्ता के शीर्ष तक पहुँचने की है. दोनों की महत्वाकांक्षाएं भी समय-समय पर टकराती रहती हैं. जैसे ही एक को लगता है, कि दूसरा उसकी महत्वाकांक्षा को कुचलने का प्रयास कर रहा है. कोई ऐसा कदम उठा लेता है, जिससे यह बात प्रमाणित हो जाती है. लेकिन एक बात तो तय है कि भविष्य के नेता अखिलेश यादव ही हैं, इस बात को सपा मुखिया मुलायम सिंह ने भी स्वीकार कर लिया है. लेकिन उनके बुरे दिनों में अपनी सामर्थ्य से अधिक मदद करने वाले भाई शिवपाल के साथ भी अन्याय न हो जाए. इस बात का ख्याल भी रखते हैं.


6. सत्ता का हस्तांतरण – एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को सत्ता जब-जब हस्तांतरित होती है. तब-तब इस तरह की परिस्थितियां उत्पन्न होती है. बुजुर्ग पीढ़ी जहाँ हर तरह से अपने वारिस को परिपक्व कर देना चाहती है, वहीँ युवा पीढ़ी उनके सुझाव को अपनी आजादी में हस्तक्षेप मानती है. इस कारण भी विभेद की स्थिति दिखाई पड़ रही है. इसमें कोई दो मत नही है, पिता की सल्तनत का वारिस पुत्र ही होता है. इसलिए मुलायम सिंह के वारिस अखिलेश ही हैं. इसमें कोई दो मत नही है. मुलायम सिंह की दूसरी बहू अपर्णा भी रजनीति में आ चुकी है, लेकिन राजनीति में रजिया या इंदिरा का पदार्पण तभी होता है, जब उस पार्टी में कोई पुरुष सत्ता को हैंडल करने की क्षमता न रखता हो. भाई शिवपाल की दिली इच्छा मुख्यमंत्री बनने की हो सकती है, लेकिन वे मुलायम के वारिस नही हैं, इस बात को वे अच्छी तरह जानते हैं.

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