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संगठन की अनदेखी मिशन – 2017 में अखिलेश को देगी शिकस्त

 Special Coverage News |  29 Oct 2016 4:14 AM GMT  |  New Delhi

संगठन की अनदेखी मिशन – 2017 में अखिलेश को देगी शिकस्त

प्रो. (डॉ.) योगेन्द्र यादव

समाजवादी पार्टी के संविधान एवं व्यवहार दोनों में संगठन सर्वोपरि रहा है. किन्तु 2012 में मिली फतह के बाद जिस तरह से संगठन की उपेक्षा की गयी, उससे संगठन के स्तर पर मजबूत समझी जाने वाली समाजवादी पार्टी बेहद कमजोर हो गयी है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने संगठन के समानांतर अपनी युवा बिग्रेड खड़ी कर दी है. जो सरकार के हर कार्य का श्रेय खुद लेता है. ऐसा नही है कि इन वर्षों में संगठन पार्टी या सरकार द्वारा मिले आदेशों का पालन नही करता रहा. उपेक्षा के बावजूद भी उसने हर सरकार या अखिलेश के हर कार्यक्रम को सफल बनाने में जी-तोड़ मेहनत की. लेकिन उसका श्रेय उसे नही दिया गया. इससे जिला संगठनों में निराशा फ़ैल गयी. जबसे समाजवादी पार्टी के उत्तर प्रदेश की इकाई के अध्यक्ष शिवपाल सिंह बने हैं. तबसे अखिलेश गुट सतर्क है कि किसी काम का श्रेय संगठन न ले जाये.


आगामी 3 नवंबर से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव विजय रथ निकालने जा रहे हैं. जिन स्थानों या जिलों से यह रथ निकलेगा, वहां भीड़ जुटाने एवं उसकी व्यवस्था की जिम्मेदारी अखिलेश समर्थकों के पास ही है. इन जिलों के जिला अध्यक्ष भी उसी अमुक व्यक्ति से पूछ-पूछ कर काम कर रहे हैं. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव 3 नवम्बर को अपार भीड़ जुटा कर शिवपाल गुट एवं विपक्षी दलों को अपनी ताकत एवं लोकप्रियता का एहसास दिलाना चाहते हैं. अखिलेश की लोकप्रियता भाड़े से भीड़ जुटाने के कारण नही है. बल्कि उन्हें चारित्रिक गुणों एवं राजनीतिक शुचिता के कारण है. ताकत का प्रदर्शन वे करते हैं, जो अल्प बुद्धि होते हैं. जो गंभीर एवं ज्ञानी होते हैं, ताकत मिलते ही वे उसका उपयोग जनहित के कार्यों में करने लगते हैं. यदि इन रैलियों में होने वाले खर्च एवं जागरूकता का उपयोग शासन एवं प्रशासन को दुरुस्त करने तथा जिस क्षेत्र से रथ निकलने वाला है, वहां के लोगों की बेहतरी के लिए खर्च किया जाता, तो यह कार्य एक राजनेताओं एवं राजनीतिक दलों के लिए एक नजीर बनता. लेकिन अब अखिलेश भी उसी श्रेणी में गिने जाएंगे, जिस श्रेणी में विपक्षी दलों के नेतागण गिने जाते हैं. राजनेताओं द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में भीड़ इन दिनों कैसे जुटाई जाती है, यह सभी को पता है, कोई मुह नही खोलता इसका मतलब यह नही है, की हकीकत कोई जानता नही.


किसी भी राजनीतिक दल की रीढ़ उसका बूथ स्तर तक फ़ैला उसका संगठन होता है, इसी संगठन का घर-घर से सम्पर्क होता है. यानी जिस दल के संगठन में बूथ एवं सेक्टर स्तर के कार्यकर्त्ता जितने ही जहीन एवं सेवा परायण होते हैं. वह पार्टी उतनी ही ज्यादा लोकप्रिय होती है. पिछले चार सालों से उपेक्षित रखने के कारण बूथ एवं सेक्टर के कार्यकर्ताओं ने मौन धारण कर लिया है. जब उनसे बात होती है, तो वे कहते हैं कि वे किस मुह से लोगों ने पास जाएँ, उन्होंने वोट डलवाने के लिए 2012 के चुनाव में जो वायदे किये थे, एक भी पूरा नही हुआ.


कानपुर जिले की यात्रा के कैंसिल करने के जो कारण गिनाये जा रहे हैं, वे मेरे गले से नही उतरते. उत्तर प्रदेश की राजनीति में अखिलेश यादव एक ऐसा चेहरा है, जिसे सब देखना एवं सुनना चाहते हैं. जिस नेता को सब देखना एवं सुनना चाहेंगे, उसके लिए तो भीड़ स्वत:स्फूर्त होगी. सिर्फ संगठन एवं उनकी टीम को अखिलेश यादव इस क्षेत्र से अमुक दिन अमुक समय निकल रहे हैं, यह सूचना देने की जरूरत है. मुझे लगता है कि पिछले चार सालों में न तो अखिलेश टीम का जनता से संपर्क रह गया है, और उपेक्षा के कारण संगठन का भी नही. अखिलेश यादव को अपने समर्थकों के साथ जिले के सभी संगठनों को भी तरजीह देनी चाहिए, जिससे उनका खोया हुआ विश्वास फिर से लौट सके. यदि वे अपनी टीम के आगे जिला संगठनों को अब भी उपेक्षित करते रहेंगे, तो जिस उद्देश्य से विजय रथ निकाला जा रहां है, उसके पूरा होने में संशय है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के बारे में जनता में ऐसी धारणा बनी हुई है कि वे द्वेष एवं घृणा से ऊपर उठ कर राजनीति करते हैं. यदि यह धारणा टूट गयी, तो उनकी लोकप्रियता को अलोकप्रियता में बदलने में देरी नही लगेगी. और उसका खामियाजा मिशन – 2017 शिकस्त के रूप में उठाना पड़ेगा.

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