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PM मोदी की नोट बंदी: घोर बैंकिंग-कुप्रबंध का शिकार, कही मोदी सरकार पर भारी न पड़ जाए!

 Special Coverage News |  17 Nov 2016 7:21 AM GMT  |  New Delhi

PM मोदी की नोट बंदी: घोर बैंकिंग-कुप्रबंध का शिकार, कही मोदी सरकार पर भारी न पड़ जाए!

लखनऊ: पूर्व प्रमुख सचिव उत्तर प्रदेश सरकार डॉ सूर्यप्रताप सिंह ने प्रधानमन्त्री की नोट बंदी योजना पर किया बड़ा खुलासा. अगर सरकार नहीं चेती तो इसके गम्भीर परिणाम भुगतने को सरकार को तैयार रहना पड़ेगा.


क्या लिखा आईएएस अधिकारी ने

प्रधानमंत्री मोदी की 'नोटबंदी', घोर बैंकिंग-कुप्रबंध का शिकार ...कहीं राजनीतिक रूप से 'सेल्फ़-गोल(Self Goal' साबित न हो जाये !
आधी-अधूरी तैयरियों के साथ शुरू 'सद-उद्देश्य' अभियान कही मोदी सरकार पर भारी न पड़ जाए ....जनता परेशान है, सब्र का बाँध धीरे-२ टूट रहा है। यदि यह दिक़्क़तों का दौर ५० दिन पार कर गया तो जनता का दर्द विरोध में बदलते देर नहीं लगेगी !!



घरों में खाने पीने की चीज़ों का अभाव, किसानो का खाद बीज का संकट, लाइन में खड़े लोगों की मौतें, आत्महत्याएँ , छोटे कारोबारियों का बंद व्यवसाय,लाइन में खड़े-२ युवाओं की छुटती नौकरियाँ, शादी-विवाहों में आ रही दिक़्क़तें और चरमराती बैंकिंग व्यवस्था सब कुछ दिन प्रतिदिन सरकार की चिंता बढ़ाने की लिए काफ़ी हैं। बैंक के सामने किसी बड़े धनाढ़्य नौकरशाह,नेता या उद्योगपति का लाइन से नदारत होना लोगों को चिढ़ा रहा है।


जनता ने प्रधानमंत्री के काले धन पर वार का स्वागत किया है, परंतु अव्यवस्था ने जनता को त्रस्त कर दिया है। कुछ प्रश्न जनता को शाल रहे हैं...

कुछ व्यक्ति निम्न प्रश्न कर रहे हैं ..
- नोटबंदी के निर्णय से पूर्व बैंक़ों को तैयार करना चाहिए था- एटीएम कैलिब्रेशन, पर्याप्त नोट छापना, छोटे नोटों की पर्याप्त व्यवस्था आदि पूर्व से ही करनी चाहिए थी।
- दोनो १००० व ५०० रु के नोट एक साथ न बंद करते ... ६ माह के अंतराल पर बंद कर देते।
- छोटे नोटों की बाज़ार में पर्याप्त पूर्व व्यवस्था करनी चाहिए थी... २००० का नया नोट छुट्टे के अभाव में लोगों को कोई राहत नहीं दे पा रहा है।
- शादी-विवाह, बीमारी व किसानों के खाद-बीज़ आदि के लिए कोई विशेष व्यवस्था करनी चाहिए थी।
- ग़रीबों के लिए ऋण पर राशन की व्यवस्था की जा सकती थी। बच्चों के लिए दूध,ब्रेड आदि की क्रेडिट पर व्यवस्था की जा सकती थी। बैंक़ों द्वारा पानी चाय व छाया जी व्यवस्था आदि की जानी चाहिए थी।
- अपने ही पैसे को बैंक से न निकल पाना/प्रतिबंध क्या क़ानूनी रूप से वैध है ?
- बहुत सारे ऐसे ही प्रश्न और हैं जो जनता में चर्चा का विषय हैं।



सरकार को इस कुप्रबंधन के लिए ज़िम्मेदारी निर्धारित करनी चाहिए... केंद्रीय राजस्व सचिव, RBI के गवर्नर और यहाँ तक वित्त मंत्री की ज़िम्मेदारी व दोष तय होना चाहिए.... यदि उक्त अच्छे उद्देश्य से काले धन पर किए गए प्रधानमंत्री मोदी का क़दम यदि राजनीतिक रूप से ख़ासकर उत्तर प्रदेश व पंजाब के आगामी चुनाव में 'सेल्फ़-गोल' साबित होता है, तो इसके लिए उक्त योजना का ख़राब नियोजन व क्रियान्वयन ही होगा।
जय हिंद-जय भारत !!!!!

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