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बसपा की सोशल इंजीनियरिंग को लगा धक्का, जानो कैसे?

 Special Coverage News |  13 Feb 2017 12:37 PM GMT  |  New Delhi

बसपा की सोशल इंजीनियरिंग को लगा धक्का, जानो कैसे?

लखनऊ: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के पहले चरण के मतदान में मतदाता सभी समीकरणों को ध्वस्त करने पर उतारू दिखे। सबसे तगड़ा झटका बसपा को लगता दिख रहा है। सोशल इंजीनियरिंग की दाल यहां गलती नहीं दिखी। सोशल इंजीनियरिंग की दलित-मुस्लिम-ब्राह्मण की धुरी बिखर गई। दलितों ने भले ही बसपा का दूर तक साथ दिया, लेकिन ब्राह्मण मतदाताओं बिखरे दिखे। उनके वोट कई पार्टियों में बंट गए।


यही हाल अन्य सवर्ण जातियों का रहा। सोशल इंजीनियरिंग की दूसरी धुरी मुस्लिम मतदाताओं को भी बसपा रास नहीं आई। अधिकांश मुस्लिमों का रुझान गठबंधन की ओर दिखा। यही नहीं बसपा ने इस बार आरक्षण का मुद्दा उठाकर अति पिछड़ों को भी लुभाने की कोशिश की थी, लेकिन वे भी बसपा के पाले में आते नहीं दिखे। पहले चरण के इन रुझानों ने बसपा के सिपहसालारों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी है। यह दीगर है कि इसके बावजूद बसपा प्रमुख मायावती वोटरों को धन्यवाद देना नहीं भूलीं।


उत्तर प्रदेश चुनाव की तारीखों के ऐलान से पहले ही बसपा ने एक बार फिर सोशल इंजीनियरिंग का पुराना और आजमाया हुआ नुस्खा अपनाया। इसी के सहारे वे 2007 के विधानसभा चुनाव में सत्ता तक पहुंची थीं। ब्राह्मणों में अपनी पहुंच बढ़ाने के लिए उन्होंने इसकी कमान पार्टी के महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा को सौंपी। श्री मिश्रा ने इसके लिए ब्राह्मण सभाएं की और लगातार ब्राह्मण वोटों को पार्टी की ओर खींचने का पूरा प्रयास किया, लेकिन वे कुछ खास नहीं कर पाए।


वहीं ब्राह्मणों ने आरोप लगाते हुए कहा कि माया सरकार में सिर्फ सतीश मिश्रा के रिश्तेदारों का ही भला हुआ है। यही नहीं मायावती ने सवर्ण को पाले में लाने के लिए आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की भी मांग की। मायावती ने आरक्षण का मुद्दा उठाकर एक-तीर से दो निशाना साधने की कोशिश की। एक ओर उन्होंने संघ नेताओं के आरक्षण पर दिए गए बयान को मुद्दा बनाया तो दूसरी ओर आर्थिक रूप से आरक्षण देने की वकालत की। उन्होंने दलितों और अति पिछड़ों को यह बताने की कोशिश की कि केंद्र की मोदी सरकार आरक्षण को खत्म करना चाहती है। दूसरा सवर्ण को संतुष्ट करने के लिए आर्थिक आरक्षण की वकालत की।



मुस्लिमों को पाले में लाने के लिए बसपा ने एक ओर सपा में मचे घमासान से सपा के कमजोर होने का हवाला दिया तो दूसरी ओर भाजपा का डर दिखाया। लेकिन मायावती की इन दोनों दावों को कम से कम पश्चिम की जनता ने खारिज कर दिया है। यहां की 73 सीटों पर हुए मतदान ने मतदाताओं के रुझान को स्पष्ट कर दिया है। दलितों ने जहां बसपा को वोट किया है, वहीं ब्राह्मण सपा-कांग्रेस गठबंधन, भाजपा और बसपा में बंटे दिखे। मुस्लिमों पर भी मायावती की अपील असर करती नहीं दिखी। अधिकांश मुस्लिम सपा-कांग्रेस गठबंधन के पाले में नजर आए। इससे उनकी सोशल इंजीनियरिंग की दूसरा पायदान भी लड़ख़ड़ा गया।


प्रदेश में मुस्लिमों की आबादी करीब 18 फीसदी से अधिक है। वहीं ब्राह्मणों यहां दस फीसदी है। अगर इसमें सभी सवर्ण जातियों को मिला दे तो इनका प्रतिशत 18 फीसदी पहुंच जाता है। बसपा ने इसी गणित के आधार पर सोशल इंजीनियरिंग का अपना फाम्यूला तैयार किया था। उसे लग रहा है कि यदि दोनों ने बसपा के पाले में गेंद डाल दी तो उसका सत्ता में आना तय है, लेकिन बसपा का यह दांव इस बार चलता नहीं दिख रहा है। लिहाजा उसके शीर्ष नेता चिंतित है। फिलहाल वे आगे-आगे देखिए होता है क्या के मोड में हैं।

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