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लंगड़-दाव-लगउल-मोदी-बहुतै-बुरा फसउला मोदी!

 Special Coverage News |  13 Nov 2016 9:32 AM GMT  |  New Delhi

लंगड़-दाव-लगउल-मोदी-बहुतै-बुरा फसउला मोदी!

अंकित मिश्र भदैनी टाइम्स

अस्सी की चर्चित अड़ी पप्पू चाय की दुकान आज चाय की भट्ठी से भी ज्यादा गरम रही। कार्तिक का महीना होने के बावजूद लोगों की पेशानी पसीने से तर। हर जुबान पे बस एक ही चर्चा हजारा, पांचसउवां बन्द भयल अब कइसे चली घर का खर्चा-बर्चा। नोट बदलने के लिए पेट्रोल पम्प, दवा की दुकान, रेलवे स्टेशन तक की खाक छानकर लौटे देवेन्द्र भाई कलपे चले जा रहे हैं। 'बड़ा बुरा कइला मोदी! चाय-पान तक मोहाल होय गयल। दू-चार दिन क भी मौका देहले होता तो कम से कम ई कंगाली अउर तंगहाली न झेले के पड़त। 'बेतरह खउवाए देवेन्द्र जी को ढाढ़स बंधाते हैं पण्डित उदय पांड़े जी 'बस दू-चार दिन क बात हौ भयवा मामला ठण्ढा जाई, उतरल गाड़ी पटरी पर आ जाई।' जैसे तन-बदन में आग लेस दे कुछ वैसे ही अंदाज में भड़क उठते हैं, रामचरित्र बाबू 'कइसन गाड़ी, कइसन पटरी यार! अइसन प्रधानमंत्री चुन देहल लोग कि पिछवाड़े क घाव हो गयल। रोज नाटक, रोज नौटंकी, अइसन बदहजमी कि डकार न आवे चाहे केतनो फांक डाबर की फंकी। उधर बोधिसत्व की मुद्रा में आ चुके प्रो. देवव्रत चौबे जी बात सम्भालने की कोशिश में कहते हैं अरे भाई घरे क रंगाई-पोताई भी करइबा त दू-चार दिन क तकलीफ झेलहीं के पड़ी। ई देखा कि आगे बदे ई फैसला कइसन-कइसन रंग देखाई। जब करिया पैसा क करिया नोट गाय-गोरू खाई। ई खाली फैसला नाही हौ भाय! अहिंसक क्रान्ति हौ। बाकी सब भरम हौ, भ्रान्ति हौ।


उनके सुर-में सुर मिलाते हैं खांटी समाजवादी बाबू अनिरूद्ध सिंह 'देखा साथी असुविधा क बात त सहिये हौ। दूसरे के का कही हम खुदे पांच सौ क नोट लेके फिरिहरी के तरे नाचत हई। आज हमार जन्मदिन हौ। नाती-पोता मिठाई मांगत हउवन और इहां ईमली चटावे भर का जुगाड़ नाहीं हौ। बहरहाल इस नई सूचना के बाद हजार-पांच सौ की चर्चा थोड़ी देर के लिए विश्राम पाती है और हर तरफ से बधाई हो, बधाई हो की आवाज आती है। अनिरुद्ध भाई सभी साथियों को बधाई की चाय पिलाने का वादा करते हैं, मगर उनके पास भी वही है हजारा नोट का रोना। इसमें मुख्य भूमिका होती हैं गद्दी पर बैठे भाई मनोज का उधार चाय पिलाने के लिए राजी होना। अगला दौर चाय की चुस्कियों के बीच चलता है। चर्चा में नये-नये शामिल होते हैं विजय भाई जिनका मानना है कि इतना बड़ा फैसला लेने के पहले आम आदमी की दुश्वारियों को ध्यान में रखना चाहिए था। निर्णय लेने के पहले नोट बदलने की समय सीमा को हकीकत की कसौटी पर परखना चाहिए था। उनके दिमाग में इस समय चक्कर काट रहा था उन मेहनतकश कामगारों का चेहरा जिनके लिए आज चूल्हा जलाना मुश्किल हो गया। वे मजबूती के साथ अपनी बात रखते हैं। जवाब में खुद मनोज की ओर लखते हैं।


मनोज का कहना है 'भइया सही हौ तोहर बात मगर एक घण्टा क भी समय मिल जात त करिया पइसावालन की कारसाजी से रातो-रात करोड़न का बारा-न्यारा होइ जात। दोपहर ढलने को होती है। सबको चिन्ता है जेब में बेकार पड़े नोटों को नोटों को खपाने की। दिन तो जैसे बीता अब तो फ्रिक है शाम का चूल्हा जलाने की। बतकही का समापन होता है नोट बदलने की फ्रिक में दुबले हुए जा रहे केदार चच्चा की विशेष टिप्पणी से जिनका कहना है कि 'कुच्छो कहा रजा इ त बहुत बुरा खेल भयल। करिया पइसा केतना निकली इ त राम जाने आम आदमी क त खटिया खड़ा हो गयल।

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