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डर के आगे ‘जीत’ है, तृणमूल हटाओ, बंगाल बचाओ

 Special News Coverage |  26 April 2016 5:39 AM GMT

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kumar sanjay लेखक संजय कुमार Executive Producer राज्यसभा टीवी



पश्चिम बंगाल में तकरीबन 34 साल तक सत्ता पर काबिज रहनेवाली लेफ्ट फ्रंट इसी नारे के सहारे फिर सत्ता पर काबिज होना चाहती है। इस नारे में बड़ा सवाल भी है। सवाल ये कि तृणमूल सरकार के दौर में लेफ्ट फ्रंट ने ऐसा क्या चमत्कार किया कि वो वापसी की आस लगा बैठी है? क्या, महज कांग्रेस के साथ प्रत्यक्ष या परोक्ष चुनावी गठबंधन लेफ्ट को खोया राज वापिस दिला सकती है? या फिर लेफ्ट फ्रंट को सत्ता से बेदखल करने के लिए मोटे तौर पर जिम्मेदार नंदीग्राम और सिंगूर में हालात बदल गए हैं, जहां पांचवें और छठे दौर में मतदान होने हैं।



इन सवालों का जवाब तलाशने के लिए हमें उन हालातों पर गौर करना होगा जो लेफ्ट फ्रंट के विनाश का कराण बनीं। हमें पता लगाना होगा कि एक जमाने में कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करनेवाली लेफ्ट फ्रंट ने 34 साल में ऐसा क्या किया कि उनपर मर मिटने वाली बंगाल की जनता ने उसे सिरे से ही नकार दिया। ममता बनर्जी में वो कौन सा जादू था कि बांसुरीवाले की तरह प्रदेश की जनता उनके पीछे दौड़ी चली आई। या फिर ये महज कांग्रेस के साथ गठबंधन का चमत्कार था, जिसने ममता बनर्जी को राइटर्स बिल्डिंग तक पहुंचा दिया।


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2011 के विधानसभा चुनावों में करीब 4 करोड़ 76 लाख वैध मत पड़े थे। इनमें लेफ्ट फ्रंट की सबसे बड़ी पार्टी सीपीएम को 30.08 फीसदी, ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक को 4.80 फीसदी, आरएसपी को 2.96 फीसदी और सीपीआई को 1.84 फीसदी वोट मिले। जबकि यूपीए गठबंधन में तृणमूल को 38.93 फीसदी और कांग्रेस को 9.09 फीसदी वोट मिले। गोरखा जनमुक्ति मेर्चा के साथ चुड़ाव लड़ रही बीजेपी को महज 4.06 फीसदी वोट ही मिले।


गठबंधन का सबसे ज्यादा फायदा तृणमूल और कांग्रेस की झोली में आया। तृणमूल के 226 उम्मीदवार मैदान में थे, जिनमें से 184 कामयाब रहे। कांग्रेस के 66 उम्मीदवारों में से 42 को कामयाबी मिली। वहीं लेफ्ट फ्रंट की बात करें तो सीपीएम के 213 में से 40 और सीपीआई के 14 में से 2 उम्मीदवारों को ही कामयाबी मिली। चौंकाने वाली बात ये रही कि लेफ्ट फ्रंट की छोटी पार्टियों का प्रदर्शन उतना बुरा नहीं रहा। ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक के 34 में से 11 और आरएसपी के 23 में से 7 उम्मीदवार कामयाब रहे। बीजेपी का प्रदर्शन सबसे खराब रहा। 289 सीटों पर प्रत्याशी उतारने के बाद भी वो अपना खाता तक नहीं खोल पाई।


अब बात एक बार फिर से लेफ्ट फ्रंट की। लेफ्ट फ्रंट के हाथ से सत्ता फिसली कैसे? ये जानने के लिए आपको साल 2011 के चुनावों से पहले जाना होगा। जब नंदीग्राम और सिंगूर में लेफ्ट रोजगार और विकास के नाम पर उन्हीं पूंजीपतियों से हाथ मिला रही थी, जिनके विरोध की राजनीति वो करती आई थी। नंदीग्राम और सिंगूर की फसली जमीनों को अंग्रेजों के जमीन अधिग्रहण कानून के सहारे किसानों से जबरन छीना गया और विरोध करने पर लाठी-डंडे और गोलियां तक बरसाईं गईं। सत्ता में बैठे कुछ लुंपन तत्व, विकास और रोजगार के नाम पर इसे सही ठहराते रहे। पार्टी के समर्पित कार्यकर्ताओं को ये समझ नहीं आया कि राज्यसत्ता की कार्रवाइयों को वो जायज कैसे ठहराएं। आम किसानों के सामने सबसे बड़ा सवाल ये था कि जो पार्टी खेत जोतने वाले को जमीन देने की बात करती थी वो उन्हें खेतों से बेदखल कैसे कर सकती है?


दुविधा से घिरे लेफ्ट फ्रंट के सिपहसालार ये समझने और समझाने में नाकाम रहे कि राज्य में भूमि सुधार के तहत 10 लाख एकड़ से ज्यादा भूमि 30 लाख किसानों में बांटने वाली पार्टी नंदीग्राम में रसायन केंद्र (केमिकल हब) और सिंगूर में ‘टाटा नयनो’ की बात कैसे करने लगी? ऑपरेशन बरगा के तहत राज्य में बटाईदारों को लाखों एकड़ भूमि का कानूनी हक दिलाने वाली पार्टी उनका हक छीनने पर कैसे अमादा हो गई।



लंबे अरसे से सत्ता की आस में बैठी ममता बनर्जी ने वर्ग संघर्ष में आए इस भटकाव का पूरा फायदा उठाया। उन्होंने मौके की नजाकत को भांपते हुए कांग्रेस से हाथ मिलाया, जो 34 साल से लेफ्ट के किले को ध्वस्त करने का सटीक औजार ढूंढ रही थी। इस काम में उन्हें उन माओवादियों का साथ भी मिला जो लेफ्ट फ्रंट सरकार की इस नई पहल से इत्तेफाक नहीं रखते थे। नक्सलवाड़ी आंदोलन की विचारधारा को जीने वाले लोगों ने भी ममता का साथ दिया। नंदीग्राम में 14 किसानों की मौत के बाद सीपीएम की जमीन तेजी से खिसकने लगी और देखत-देखते ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की सबसे कद्दावर नेता बन बैठी। वो उसी आवाज में बोलने लगीं, जिसमें कभी ज्योति बसु और हरकिशन सिंह सुरजीत बोलते थे।


लेफ्ट फ्रंट के नेताओं को जबतक इसका एहसास होता, बहुत देर हो चुकी थी। वो ये बात समझ नहीं पाए कि साल 2006 के विधानसभा चुनाव में 50 फीसदी से ज्यादा वोट और 235 सीट जीतने वाला लेफ्ट गठबंधन साल 2011 में महज 58 सीटो तक कैसे सिमट गया। इसकी झांकी तीसरे प्लेनम के मौके पर कोलकाता के ब्रिगेड में आयोजित रैली में भी नजर आई। जहां दूर-दराज से आए पार्टी कार्यकर्ताओं के चेहरे पर आशा और उम्मीद की किरण तो थी, लेकिन तृणमूल के कार्यकर्ताओं और पुलिस का आतंक भी सिर चढ़कर बोलता नजर आया। ब्रिगेड ग्राउंड की रैली में 171 शहीदों की सूची भी उऩमें जोश भरने से ज्यादा उन्हें डराने का काम करती नजर आई। कार्यकर्ता यही रट लगाते नजर आए-‘लाइन लगाकर वोट हुआ तो पार्टी फिर सत्ता में आएगी।‘ ये समझना थोड़ा मुश्किल था कि ‘लाइन लगाकर वोट’ का मतलब क्या है? बाद में पता चला कि इसका मतलब है अगर वोट डाल पाएंगे तो।



कोलकाता से सिंगूर के रास्ते में हर जगह इस डर का अहसास होता है। झंडे भले ही बदल गए हों, लेकिन लोग वहीं हैं। सिविल डिफेंस के नाम पर युवाओं की एक फौज खड़ी की गई है। कहने के लिए तो वो हाइवे पर ट्रैफिक कंट्रोल का काम करते हैं, पर वास्तव में वो पुलिस के निजी सहयोगी हैं। चंदा वसूली का काम पहले वो लेफ्ट के लिए करते थे, अब ये काम तृणमूल के लिए करते नजर आते हैं। बड़ी बेफिक्री से एक युवा कहता है, “बताइए, 4 हजार में जीवन चलता है क्या?” दरअसल लेफ्ट ने जिन सर्वहारा को सत्ताधारी बना दिया उसे फिर से सर्वहारा बनाने की चुनौती है। बड़ा सवाल यही है कि क्या उऩ्हें इस भौतिकवाद से बाहर निकाला जा सकता है, जिनके वो आदि हो चुके हैं।



नंदीग्राम में आप किसी से खुलकर बात नहीं कर सकते। लोग कतराते हैं। बाजार में लोग आपसे बात तो करेंगे, लेकिन डर-डर कर। कहीं कोई देख ना लें। लोग कहते हैं, ‘कुछ बदला नहीं है, बस झंडे बदल गए हैं।’ सीपीएम से जुड़े लोग मानते हैं कि पार्टी में लुंपन तत्वों का डेरा हो गया था। अब वो सब तृणमूल के साथ है। सिंगूर के लोग बताते हैं, सैकड़ों किसानों के मुआवजे का मामला कोर्ट में चल रहा है। फैक्ट्री लगती तो काम मिलता। जिनकी खेत गई और मुआवजा नहीं मिला, सरकार उन्हें 2000 रुपये मुआवजा देती है। जो नाकाफी है। मामला कोर्ट में है और लोग परेशान हैं। जबसे खबर आई है कि बंगाल सरकार टाटा से हाथ मिलाकर नैनौ कार फैक्ट्री शुरू करवाना चाहती है, तबसे इलाके में सुगबुगाहट है। दरअसल ममता ने प्रस्ताव रखा है कि टाटा


1000 एकड़ की जगह 600 एकड़ में फैक्ट्री लगाए और 400 एकड़ जमीन उन किसानों को वापिस कर दे जो इसे बेचना नहीं चाहते।
लेफ्ट ने खोई सत्ता वापिस पाने के लिए कांग्रेस से हाथ मिलाया है। वोटों के गणित को देखें तो ये काम उतना मुश्किल नजर नहीं आता। लेकिन सवाल वैचारिक धरातल का है। बंगाल के वोटरों में अब युवाओं की तादाद 35 से 40 फीसदी है। जिनमें बहुतों को मार्क्सवाद-लेनिनवाद फैशनेबल तो लगता है, लेकिन वैचारिक जुड़ाव कमजोर है। वो महात्मा गांधी के ‘सत्य और अहिंसा के प्रयोग’ की तरह ही ‘दुनिया के मजदूरों एक हों’ और ‘सत्ता बंदूक की नली से निकलती है’, जैसे चालू नारों और मुहावरों से आकर्षित तो होते हैं, लेकिन इन नारों के पीछे के लंबे संघर्ष की जानकारी नहीं है। ना ही जानने में ज्यादा रुचि है। ऐसे में उन्हें बरगलाना और फुसलाना आसान है। जिसका खामियाजा तात्कालिक नारों की जगह वैचारिक आधार वाली पार्टियों को भुगतना पड़ रहा है। सस्ता और सबकुछ मुफ्त में देनेवाली पार्टियां आज ज्यादा सफल दिखाई देतीं हैं। इऩसे निपटना चुनौती है, लेकिन कोई और रास्ता भी नहीं है। ऐसे में लेफ्ट फ्रंट के सामने चुनौतियां बड़ी है। बंगाल के गांव-देहातों से तृणमूल और लेफ्ट फ्रंट के कार्यकर्ताओं के बीच संघर्ष की जो खबरें आ रहीं हैं, उसे लेफ्ट के पुनर्जागरण के तौर पर तो देखा और महसूस किया जा सकता है। इऩ खबरों की तुलना 2011 के विधानसभा चुनाव से पहले तृणमूल के उदय और लेफ्ट के सूर्यास्त के दौर वाली खबरों से की जा सकती है। जिसकी अनुगूंज ममता बनर्जी की बौखलाहट में नजर आ रही है।

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