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शीतकालीन सत्र : कुछ प्रश्न - कुछ विचार, हमारा संसदीय लोकतंत्र, अभद्रता

 Special News Coverage |  25 Dec 2015 11:48 AM GMT

Arun-Jaitley_

अरुण जेटली वित्त मंत्री भारत सरकार की फेसबुक बाल से

संसद का शीतकालीन सत्र कल पूरा हो गया। इस सत्र ने मेरे अंदर कुछ सहज प्रश्न खड़े किए हैं। मैं चाहूँगा कि हम सब इन पर विचार करें।


हमारा संसदीय लोकतंत्र
संसदीय लोकतंत्र भारत की सबसे बड़ी ताकत रहा है। अलग-अलग राजनैतिक मत, क्षेत्र, राज्य, समुदाय, वर्ग आदि मिलकर संसद में निर्णय-प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हैं। संसद में विरोध हमारे देश के लिए नई बात नहीं है। बेहद गंभीर परिस्थितियों में हंगामे भी होते रहे हैं। लेकिन पिछले दो सत्रों में कांग्रेस की स्पष्ट धारणा रही है कि संसद में कामकाज नहीं करने दिया जाएगा। कांग्रेस नेतृत्व के इस रवैये पर अधिकतर कांग्रेसी नेताओं ने निजी बातचीत में बेबसी जाहिर की है। ऐसे में कांग्रेस नेतृत्व से यह बुनियादी सवाल पूछा जाना चाहिए कि आखिरकार देश कानून कैसे बनाए? संसद की स्थायी समितियों के माध्यम से काम करने की व्यवस्था 1993 से बहुत अच्छा काम कर रही थी। लेकिन राज्यसभा ने अब प्रवर समितियाँ (सेलेक्ट कमिटी) नियुक्त करके स्थायी समितियों को कमज़ोर किया है। ये प्रवर समितियाँ स्थायी समितियों की राय पर लगातार सवाल उठाती हैं। अगर यही चलता रहा तो स्थायी समितियों की सफल प्रणाली कमज़ोर होती जाएगी। इसलिए सरकार ने दिवालियापन कानून पर विचार के लिए विकल्प के रूप में अब संयुक्त समिति का तरीका अपनाया है। और भी तरीके सुझाए गए हैं जैसे स्थायी समिति के बगैर कानून पारित कर देना या इस तरह कानून तैयार करना कि वे धन विधेयक की परिभाषा में आ जाएँ। लेकिन ये दोनों तरीके पसंदीदा विकल्प नहीं हैं। कांग्रेस पार्टी का नेतृत्व इस पर बेहद गंभीरता से विचार करे कि संसद में विवेकशून्य व्यवहार से और तिल का ताड़ बनाते हुए हंगामा करने से संसदीय प्रणाली की जड़ों पर कुठाराघात हो रहा है। हमारे लोकतंत्र के शुरुआती वर्षों में स्वस्थ प्रणालियों की स्थापना का श्रेय यदि पंडित नेहरु को जाता है तो वर्तमान कांग्रेस नेतृत्व को इतिहास उन्हीं प्रणालियों को कमज़ोर करने के लिए याद करेगा। पिछले साल के बजट सत्र से अब तक जीएसटी बिल के पारित नहीं होने से क्या देश को नुकसान नहीं हुआ? महत्वपूर्ण कानूनों को बगैर चर्चा के, सत्र के आखिरी दिन पारित करना कहाँ की समझदारी है? कहने के लिए हमने एक बिल पारित कर दिया, लेकिन उसमें संसद के विचारों का समावेश कहाँ हुआ?



अभद्रता:
क्या अभद्रता भारतीय राजनीति का नया मानदंड है? उम्मीद करता हूँ कि ऐसा नहीं है।
कुछ महीने पहले भारतीय जनता पार्टी के कुछ सदस्यों ने ऐसे बयान दिए थे जिन्हें स्वयं पार्टी ने भी पसंद नहीं किया। पार्टी अध्यक्ष ने उन्हें चेताया और ऐसे बयान देने से बचने की सलाह दी। इस चेतावनी के परिणाम सबके सामने हैं।


लेकिन दिल्ली के माननीय मुख्यमंत्री ने विधानसभा के भीतर और बाहर प्रधानमंत्री व अन्य के बारे में जो बयान दिए उनका क्या? अगर भारत सरकार का कोई प्रतिनिधि ऐसी भाषा का इस्तेमाल करता तो पूरे देश में प्रतिरोध के स्वर सुनाई देते। ज़िम्मेदारी के पदों पर आसीन लोगों को संयम से काम लेना चाहिए। वे बचकाने तरीके नहीं अपना सकते। अभद्रता उनका हथियार नहीं हो सकता। राजनैतिक विमर्श में अभद्रता के लिए कोई स्थान नहीं है। अभद्र तरीके से झूठ बोलने से वह सच साबित नहीं हो जाएगा। अभद्रता कभी राजनीति का आदर्श नहीं हो सकती। दिल्ली सरकार के नुमाइंदों और उनके समर्थकों ने राजनैतिक चर्चा का स्तर गिराया है। उन्होंने कोई जानकारी सामने नहीं रखी, केवल बाज़ारू झूठ का प्रचार किया है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सफलता ने शायद कांग्रेस में यह गलतफहमी पैदा कर दी है कि अभद्रता करके चुनाव जीते जा सकते हैं। भारत की जनता बेहद समझदार है। अब समय आ गया है कि देश की जनता राजनैतिक विमर्श में आई इस गिरावट का मुखर होकर विरोध करे।

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