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सीएए और एनआरसी के विरोध के राजनीतिक और गैरराजनीतिक दो नज़रिए, मायावती और अखिलेश के लिए नयी चुनौतियां

देश के सबसे महत्वपूर्ण राज्य उत्तर प्रदेश में भी लोगों ने सड़कों पर आकर एक्ट का विरोध किया था जिसमें हिंसा हुई थी और पुलिस ने तांडव भी मचाया था और लगभग बीस लोगों की जान भी चली गई थी।

 Majid Ali Khan |  14 Jan 2020 3:34 AM GMT  |  गाजियाबाद

सीएए और एनआरसी के विरोध के राजनीतिक और गैरराजनीतिक दो नज़रिए, मायावती और अखिलेश के लिए नयी चुनौतियां
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माजिद अली खान राजनैतिक संपादक

देशभर में सीएए और एनआरसी के खिलाफ बहुत ज़ोर शौर से प्रदर्शन चल रहे हैं और लगभग पूरे देश में ही हो रहे हैं। सबसे बड़ा प्रदर्शन दिल्ली के ओखला क्षेत्र में शाहीन बाग में लगातार चल रहा है। औरतें, बच्चे, बूढ़े समाज का हर वर्ग बहुत जोशोखरोश के साथ इस एक्ट का विरोध कर रहे हैं और सरकार से इस एक्ट को वापस लेने का दबाव बना रहा है। इस आंदोलन की खास बात ये है कि इसका कोई नेता नहीं और न किसी राजनीतिक संगठन से प्रभावित है। हालांकि राजनीतिक और गैर राजनीतिक व्यक्तित्व वहाँ पहुंच कर आंदोलन को अपना समर्थन दे रहे हैं। देश के सबसे महत्वपूर्ण राज्य उत्तर प्रदेश में भी लोगों ने सड़कों पर आकर एक्ट का विरोध किया था जिसमें हिंसा हुई थी और पुलिस ने तांडव भी मचाया था और लगभग बीस लोगों की जान भी चली गई थी।

इन सारे विरोधों के बीच दो तरह के लोग मैदान में आए। सबसे बड़े प्रदर्शन तो जनता ने बिना किसी नेता या संगठन की अपील के बिना सड़कों पर उतरे थे। जनता के आक्रोश को देखकर सरकार और विपक्ष के राजनीतिक संगठन सकते में आ गए। पहले तो राजनीतिक संगठनों ने सीएए पर सड़कों पर आकर विरोध नहीं जताया लेकिन जब जनता का उत्साह देखा तो मजबूरन बयान देने और घर से बाहर आने पर राजनीतिक लोग तैयार हुए।

केंद्र में मोदी सरकार के बनने से लेकर अब छह साल में देश की अर्थव्यवस्था गिरती चली जा रही है और अब अपने निम्न स्तर पर पहुंच रही है। अर्थव्यवस्था के गिरने से लोगों के धंधे चौपट हैं और कारोबार नहीं चल रहे हैं और बेरोजगारी लगातार बढ़ रही है। इस दशा में लोग दबे गले से सरकार के पहले ही विरोधी थे लेकिन सीएए के आने पर देश के गरीब और अल्पसंख्यक समुदाय में दहशत व्याप्त है कि सरकार नागरिकता से छेड़छाड़ करना चाहती है। इन तबकों का कहना है कि सरकार सुनियोजित ढंग से एनआरसी के ज़रिए किसी को भी घुसपैठिया साबित कर देगी और फिर नागरिकता मिलेगी भी तो मूल नागरिक वाले अधिकार छीन लेगी। इन सब सवालों के चलते लोग सड़कों पर आने पर मजबूर हो गये। ये आंदोलन आने वाले समय में राजनीतिक दलों के भविष्य का फैसला भी करेगा

उत्तर प्रदेश में पुलिस के कहर और योगी आदित्यनाथ के रवैये के बाद लोगों में भय व्याप्त होता गया था तब जनता का ध्यान राजनेताओं की तरफ गया। जनता के आंदोलन कोई देखते हुए मायावती ने सीएए के खिलाफ बयान दिया जबकि संसद में वो समर्थन कर चुकी थी। मायावती ने बसपा के कार्यकर्ताओं से विरोध करने के लिए तो कहा लेकिन सड़कों पर आने से मना किया जिस पर उनकी आलोचना भी हो रही है और दलित समाज भी मायावती का आलोचक हो गया है। बसपा के परंपरागत वोटर दलित समाज के लोगों का कहना है कि ये दलितों को परेशान करने वाली चाल है लेकिन मायावती ने केंद्र सरकार से डरकर विरोध नहीं किया। मायावती के इस कदम को कुछ राजनीति के माहिर सियासी खुदकुशी करार दे रहे हैं। लोगों का कहना है कि सीएए का विरोध नहीं करने पर सीएए के समर्थक तो बसपा को वोट देंगे नही और विरोध न करने पर विरोधी भी मायावती के पक्ष में नहीं जाएंगे। इसलिए मायावती का राजनीतिक सफर दांव पर लगा हुआ है।

दूसरे नंबर पर अखिलेश हैं। अखिलेश का रवैया भी ढीला ढाला रहा है। लोगों का कहना है कि कुछ मजबूरियों के चलते अखिलेश भी योगी सरकार का सामना नही कर पा रहे हैं। अखिलेश के इस कदम से उनके परंपरागत वोटर मुसलमानों में अच्छा असर नहीं गया है। राज्य के मुस्लिम समुदाय का कहना है कि योगी की पुलिस ने जिस प्रकार मुसलमानों के खिलाफ नफरत दिखाई है उस समय उन्हें अखिलेश की जरूरत थी लेकिन अखिलेश मैदान छोड़ गए। इस प्रकार कहा जा सकता है कि फिलहाल का समय अखिलेश के लिए भी नुकसानदेह साबित हो सकता है।

आंदोलन में सबसे ज्यादा फायदे मे रही कांग्रेस। जब उत्तर प्रदेश में पुलिस मुसलमानों के खिलाफ कार्रवाई कर रही थी और लोगों में दहशत बढ़ रही थी तब प्रियंका गांधी ने बहादुरी के साथ सरकार के खिलाफ लखनऊ जाकर बयान दिये। बिजनौर में पुलिस द्वारा हुई हत्या का मुकदमा एक एसओ समेत छह पुलिस वालों पर कराना बहुत बड़ा कारनामा करार दिया जा रहा है। मुसलमानों और दलितों में इसका अच्छा संदेश गया। दोनों वर्गों का कहना है कि प्रियंका गांधी के रूप में एक मज़बूत नेता राज्य को मिल गया है। यदि प्रियंका गांधी

को मिलने वाला यह समर्थन वोटरों में तब्दील हो गया तो दूसरे राजनीतिक संगठनों के वजूद को खतरा पैदा हो सकता है। आगे देखना ये है कि समय क्या क्या रुख बदलता है।

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Majid Ali Khan

Majid Ali Khan

Political Editor of Special Coverage News.


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