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इंदिरा के नक्शेकदम पर चलीं प्रियंका गांधी, दादी ने 23 जनवरी 1966 को संभाली थी ये महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी

इसी के बीच नेहरू के वफादारों ने इंदिरा का नाम भी आगे कर दिया, जो लाल बहादुर शास्त्री के मंत्रिमंडल में सूचना-प्रसारण मंत्री थीं. चुपचाप रहती थीं. कांग्रेस संगठन के लोगों की नजरों में वह 'गुड़िया' थीं.

 शिव कुमार मिश्र |  2019-01-24T11:54:22+05:30  |  दिल्ली

इंदिरा के नक्शेकदम पर चलीं प्रियंका गांधी, दादी ने 23 जनवरी 1966  को संभाली थी ये महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी

23 जनवरी 1966 को एक चार्टेड विमान चेन्नई से दिल्ली के लिए उड़ा. उस पर दो लोग सवार थे. एक कांग्रेस के अध्यक्ष के. कामराज और दूसरे उनके दुभाषिए आर. वेंकटरमन. विमान के हवा में आते ही कामराज ने अपनी आंखें बंद कीं और खर्राटे लेने लगे. विमान के दिल्ली पहुंचने से मुश्किल से 15 मिनट पहले उन्होंने आंखें खोलीं और कहा, मैने फैसला कर लिया कौन पीएम बनेगा.

11 जनवरी 1966 में ताशकंद में प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री का निधन हो चुका था. गुलजारी लाल नंदा कार्यवाहक प्रधानमंत्री बनाए गए थे. मोरारजी देसाई, जगजीवन राम, गुलजारी लाल नंदा पीएम पद के दावेदारों में थे. इसी के बीच नेहरू के वफादारों ने इंदिरा का नाम भी आगे कर दिया, जो लाल बहादुर शास्त्री के मंत्रिमंडल में सूचना-प्रसारण मंत्री थीं. चुपचाप रहती थीं. कांग्रेस संगठन के लोगों की नजरों में वह 'गुड़िया' थीं.

'इंदिरा पीएम होंगी'

कुलदीप नैयर अपनी किताब "बियांड द लाइंसः एन आटोबायोग्राफी" में लिखते हैं, "लालबहादुर शास्त्री की अचानक मृत्यु से प्रधानमंत्री के चयन की जिम्मेदारी कांग्रेस के ताकतवर अध्यक्ष कामराज के कंधों पर आ गई. उस दिन जब वह चार्टेड विमान पर सवार हुए तो यही सोच रहे थे कि किसके नाम पर मुहर लगाई जाए. दिल्ली एयरपोर्ट पर जहाज उतरने से 15 मिनट पहले जब उनकी आंखें खुलीं तो बोले, इंदिरा गांधी पीएम होंगी. मानो सोते समय इस सवाल का जवाब खोज लिया हो. जब वेंकटरमन ने जानना चाहा कि वो फैसले पर कैसे पहुंचे तो उन्होंने कहा, उन्हें केवल गुलजारी लाल नंदा और इंदिरा गांधी में किसी एक को चुनना था."

'मैने तो उसको मूक गुड़िया समझा था'

कांग्रेस के ज्यादातर नेता नंदा के फेवर में थे. सभी ने कामराज को सुझाव दिया कि इंदिरा पर भरोसा नहीं करना चाहिए. इसके बावजूद कामराज ने इंदिरा को ही चुना. जवाहर लाल नेहरू के विशेष सचिव एमओ मथाई अपनी किताब "रेमनिसन्सिज़ ऑफ द नेहरू एज" में लिखा, " कामराज को लगा था कि वो एक गुड़िया को चुन रहे हैं, जो उन लोगों के मनमुताबिक चलेगी." बाद में जब इंदिरा ने सरकार और पार्टी दोनों पर पकड़ बनानी शुरू की तो कामराज एक दिन कहीं मथाई से मिल गए. तब उन्होंने झुंझलाते हुए कहा, "मैने तो उसे मूक गुड़िया समझा था लेकिन वो कुछ ज्यादा ही आगे जा रही है."

तब इंदिरा ने कांग्रेस में दोफाड़ कर दी

जब कांग्रेस के पुराने दिग्गज नेताओं के सिंडिकेट ने इंदिरा पर शिकंजा कसना चाहा तो उन्होंने 1969 में पार्टी ही तोड़ दी. इंदिरा युग की शुरुआत हो चुकी थी. उन्होंने राजाओं का प्रिविपर्स बंद किया. प्राइवेट बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर वाहवाही लूट ली. कई ऐसे कदम उठाए, जिससे आम जनता को लगने लगा कि उनमें वाकई दम है. रही सही कसर 1971 में बांग्लादेश को अलग देश बनाकर पूरी कर दी. इसके बाद तो वो वाकई दुर्गा और लौहमहिला बन गईं. इंदिरा की शख्सियत ऐसी थी कि कटु आलोचक भी कई मामलों में तारीफ किए बगैर नहीं रह पाते थे.

पाकिस्तानी भी ऐसा सोचते थे

80 के दशक में 'टाइम्स ऑफ इंडिया' के संपादक गिरिलाल जैन उनके बारे में अक्सर एक बात कहा करते थे. पाकिस्तान में सैनिक तख्तापलट के बाद प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो को फांसी दी जाने वाली थी. इंदिरा चुनाव हार चुकी थीं. जनता पार्टी का शासन था. बकौल गिरिलाल, "पाकिस्तानी अक्सर कहा करते थे कि अगर इंदिरा सत्ता में होतीं तो कमांडो भेजकर भुट्टो को छुड़वा लेतीं." बेशक इंदिरा ऐसा नहीं करतीं लेकिन उनके बारे में पाकिस्तानी कम से कम ऐसा ही सोचते थे.

वैसा शायद दूसरा प्रधानमंत्री नहीं कर पाता

अक्सर विदेश नीति और प्रशासन को लेकर पिता जवाहर लाल नेहरू से उनकी तुलना की जाती थी. लेकिन दोनों मामलों में वो पिता से कहीं आगे कही जा सकती हैं. देशहित के लिए कभी कोई समझौता नहीं किया. बांग्लादेश के खिलाफ वर्ष 1971 के युद्ध में उन्होंने दुनिया की दो महाशक्तियों को जिस तरह आमने-सामने खड़ा कर बेधड़क सैन्य कार्रवाई कर बांग्लादेश को आजादी दिलाई, वैसा शायद ही दूसरा कोई प्रधानमंत्री कर पाता. वर्ष 1971 में जब पूर्वी पाकिस्तान में दमन काफी बढ़ गया तो उसका असर भारत पर पड़ने लगा. कार्रवाई अवश्यंभावी हो गई.

निक्सन उन्हें नापसंद करते थे

पाकिस्तानी शासक जनरल याहया खान अमेरिका के आंख के तारे थे. तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन उन्हें पसंद करते थे. वजह कई थीं, एक ये भी कि अमेरिका एशिया में चीन से पींगें बढाने की कोशिश कर रहा था, याहया बीच की कड़ी बने हुए थे. अमेरिकी प्रशासन इंदिरा गांधी को कतई पसंद नहीं करता था. 1971 में जब ऐसा लगने लगा कि भारत पूर्वी पाकिस्तान में कोई सैन्य कार्रवाई करके पाकिस्तान को दो टुकड़ों में बांट देगा, तभी इंदिरा गांधी नवंबर महीने में अमेरिका पहुंचीं.

इंदिरा ने निक्सन की चेतावनी को अनसुना कर दिया

मुलाकात से पहले की शाम राष्ट्रपति निक्सन और विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर की बातचीत में इंदिरा के लिए अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया गया. निक्सन ने उन्हें 'ओल्ड विच' कहा तो किसिंजर ने भारतीयों को 'बास्टर्ड'. अगले दिन की मुलाकात में इंदिरा को कड़ी चेतावनी दी जाने वाली थी. मुलाकात की शुरुआत ही गड़बड़ रही. निक्सन ने हावभाव से जैसी शुरुआत की, उसका वैसा ही जवाब इंदिरा से मिला. इंदिरा ने पूरी मुलाकात में कुछ ऐसा ठंडा रुख अख्तियार कर लिया, मानो उन्हें निक्सन की कोई परवाह ही नहीं हो. निक्सन ने चेतावनी दी, ''अगर भारत ने पूर्वी पाकिस्तान में सैन्य कार्रवाई की हिम्मत की तो परिणाम अच्छे नहीं होंगे. भारत को पछताना होगा.'' किसी और देश के लिए ये चेतावनी पसीने-पसीने कर देने वाली होती लेकिन इंदिरा किसी और मिट्टी की बनी थीं. उन्होंने निक्सन के साथ वैसा ही बर्ताव किया जैसा कोई समान पद वाला करता है.

इंदिरा की विदेश नीति के सटीक पांसे

इंदिरा न केवल गर्वीली थीं बल्कि सम्मान से कोई समझौता नहीं करने वाली. अमेरिका दौरे से पहले सितंबर में वह सोवियत संघ भी गई थीं. भारत को सैन्य आपूर्ति के साथ मास्को के राजनीतिक समर्थन की सख्त जरूरत थी. जब वह पहुंचीं तो पहले दिन प्रधानमंत्री किशीगन से मुलाकात कराई गई. उन्होंने साफ जता दिया कि वह जो बात करने आईं हैं, वह देश के असली राष्ट्रप्रमुख ब्रेझनेव से ही करेंगी. अगले दिन ब्रेझनेव से बातचीत हुई. वर्ष 1971 में इंदिरा ने अमेरिका और सोवियत संघ के लिए जैसे पांसे फेंके, वो बेहद नपी-तुली और समझदारी वाली विदेशनीति थी.

इंदिरा तय कर चुकी थीं कि क्या करना है

अमेरिका से लौटते हुए इंदिरा जी पक्का कर चुकी थीं कि अब करना क्या है. तीन दिन बाद ही दिसंबर के पहले हफ्ते में भारतीय फौजों ने पूर्वी पाकिस्तान में कार्रवाई शुरू कर दी. पाकिस्तानी सेनाओं के पैर उखड़ने लगे. खबर वाशिंगटन पहुंची तो निक्सन बिलबिला गए. उन्हें उम्मीद भी नहीं थी कि उनकी चेतावनी के बाद भी भारत ऐसा करेगा. कुंठित निक्सन ने चीन से संपर्क साधा कि क्या वह भारत के खिलाफ कार्रवाई कर सकता है, चीन तैयार नहीं हुआ, क्योंकि उसे भी लगता था कि पूर्वी पाकिस्तान की स्वतंत्रता ही एकमात्र हल है. अब सीधे इंदिरा पर संघर्ष विराम का दबाव डाला गया. दो-टूक जवाब मिला-नहीं ऐसा नहीं हो सकता. अमेरिका ने अपने सातवें बेडे को हिन्द महासागर में पहुंचने का आर्डर दिया तो सोवियत संघ तुरंत सामने आकर खड़ा हो गया. भारत ने संघर्ष विराम तो किया लेकिन 17 दिसंबर को तब, जबकि पाकिस्तान की हार के बाद भारतीय फौजों ने ढाका में फ्लैग मार्च किया.

इंदिरा ने बदली दी भारत की इमेज

ये ऐसा समय था जब भारतीय फौजें चाहतीं तो पश्चिम में पाकिस्तानी सीमा के अंदर तक जाकर उसके इलाके को हड़प सकती थीं, लेकिन इंदिरा ने ऐसा नहीं किया. उन्होंने मास्को के जरिए वाशिंगटन को संदेश भिजवाया कि पाकिस्तानी सीमाओं को हड़पने का उनका कोई इरादा नहीं है. उन्हें जो करना था, वो उन्होंने कर दिया. बांग्लादेश बनने के एक महीने के अंदर संयुक्त राष्ट्र के ज्यादातर देशों ने बांग्लादेश को मान्यता दे दी. इस जीत और सैन्य अभियान ने यकायक इंदिरा और भारत की छवि पूरी दुनिया में बदलकर रख दी.

चुनाव हारीं लेकिन राष्ट्रप्रमुख सरीखा सम्मान मिला

इंदिरा इस कदर दुनियाभर के नेताओं में लोकप्रिय थीं कि वर्ष 1977 का चुनाव हारने के बाद जब उन्होंने लंदन का दौरा किया तो उन्हें वैसा ही सम्मान , जो एक राष्ट्रप्रमुख को मिलता है। लेकिन ठीक उसी तारीख को कांग्रेस में सक्रिय राजनीति में नातिन प्रियंका गांधी ने चलकर क्या यही संदेश देने का प्रयास किया है।

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