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झारखंड की हार करती है इस और इशारा, आदिवासियों ने BJP को को क्यों नकारा?

झारखंड चुनाव बताता है कि बीजेपी से दूर हो रहा आदिवासी समाज

 Shiv Kumar Mishra |  29 Dec 2019 3:49 AM GMT  |  रांची

झारखंड की हार करती है इस और इशारा, आदिवासियों ने BJP को को क्यों नकारा?
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झारखंड में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के खराब प्रदर्शन के बाद आदिवासियों में पार्टी की स्वीकार्यता को लेकर बहस छिड़ी हुई है. झारखंड में 26 सीटें ऐसी हैं जो आदिवासी बहुल हैं और कुल 81 सीटों वाली विधानसभा में 28 सीटें अनुसूचित जनजाति (STs) के लिए आरक्षित हैं.

बीजेपी ने 2014 में यहां 11 एसटी सीटें जीती थीं, लेकिन इस बार आदिवासी बहुल सीटों पर बीजेपी का प्रदर्शन बेहद खराब रहा. इस चुनाव में वह सिर्फ दो सीटों पर सिमट गई.

इंडिया टुडे की डाटा इंटेलीजेंस यूनिट (DIU) ने झारखंड विधानसभा चुनाव परिणाम का विश्लेषण किया है. इस दौरान यह पाया गया कि आदिवासी समाज, बीजेपी से दू​री बना रहा है.

DIU ने 20 राज्यों में एसटी वर्ग के लिए आरक्षित 522 सीटों के चुनाव परिणामों का अध्ययन किया. अशोका यूनिवर्सिटी के त्रिवेदी सेंटर फॉर पॉलिटिकल डाटा के आंकड़ों के मुताबिक, बीजेपी के पास इनमें से सिर्फ 144 यानी 27.59 सीटें हैं.

आदिवासियों पर बीजेपी का प्रभाव

आंकड़ों को क्षेत्रों के आधार पर बांट कर देखने पर DIU ने पाया कि मध्य भारत के राज्यों जैसे- झारखंड, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में बीजेपी के पास कुल 20 आदिवासी सीटें हैं.

पश्चिमी भारत में बीजेपी की स्थिति तुलनात्मक रूप से बेहतर है, लेकिन यहां भी उसका प्रतिशत कम हुआ है. गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान में एसटी वर्ग के लिए आरक्षित 77 सीटों में से बीजेपी के पास सिर्फ 26 (34 फीसदी) सीटें ही हैं.

पूर्वी तटीय राज्यों, ओडिशा और पश्चिम बंगाल में बीजेपी ने लोकसभा चुनाव में अपने ​प्रदर्शन से विरोधियों को चौंका दिया था. वहां पर एसटी के लिए कुल रिजर्व सीटों में से बीजेपी के पास सिर्फ 24 फीसदी सीटें हैं.

दिलचस्प बात यह है कि देश के उत्तरपूर्वी राज्यों में बीजेपी के पास सबसे ज्यादा एसटी सीटें हैं. जैसे अरुणाचल प्रदेश में 59 सीटें एसटी वर्ग के लिए आरक्षित हैं. जिनमें से बीजेपी के पास 41 यानी 69.5 फीसदी सीटें हैं. वहीं असम में 16 एसटी सीटों में से 62.5 और त्रिपुरा में 47 फीसदी एसटी सीटें बीजेपी के पास है.

हालांकि, यह ध्यान देना अहम है कि अरुणाचल प्रदेश के मौजूदा मुख्यमंत्री पेमा खांडू कांग्रेस के 43 विधायकों के साथ बीजेपी की सहयोगी पीपुल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल ज्वाइन कर चुके हैं. इसके बाद 2019 विधानसभा चुनाव में बीजेपी से 41 विधायक चुन कर आए. हमारे विश्लेषण में पता चला है कि बीजेपी में 19 विधायक ऐसे हैं जो पहले किसी अन्य दल से विधायक थे.

केंद्र में मोदी का जादू

राज्य से अलग, अगर लोकसभा की बात करें तो तस्वीर एकदम अलग है. 2014 आम चुनाव में बीजेपी ने एसटी वर्ग के लिए आरक्षित 47 सीटों में से 27 सीटें जीती थीं. 2019 में यह बढ़कर 31 हो गई. पूर्वी तटीय राज्यों में बीजेपी, एसटी वर्ग के आरक्षित 57 फीसदी सीटें जीतने में कामयाब रही. मध्य भारत में बीजेपी ने 80 फीसदी स्ट्राइक रेट के साथ 15 एसटी सीटों में से 12 सीटें जीत लीं.

पश्चिमी भारत की बात करें तो गुजरात और राजस्थान में बीजेपी ने सभी आदिवासी सीटें जीत लीं. महाराष्ट्र समेत इस पट्टी में बीजेपी का औसत 91 फीसदी रहा.

पूर्वोत्तर राज्यों में बीजेपी बड़ी शक्ति के रूप में उभरी है. यहां की एसटी सीटों पर विधानसभा और लोकसभा चुनावों में बीजेपी के प्रदर्शन में ज्यादा अंतर देखने को नहीं मिला. पूर्वोत्तर राज्यों आरक्षित कुल सात लोकसभा सीटों में बीजेपी बमुश्किल दो यानी 29 फीसदी सीटें जीत सकी.

विशेषज्ञों की राय

सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के सीनियर फेलो नीलांजन सरकार का मानना है कि स्थानीय मुद्दे आदिवासियों के लिए प्रासंगिक हैं. ये राज्य विधानसभा चुनावों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जिससे उनकी वोटिंग प्राथमिकताएं प्रभावित होती हैं.

वे कहते हैं, "राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर होने वाले चुनावों के मुद्दे अलग-अलग होते हैं. स्थानीय मुद्दों के चुनाव में झारखंड के आदिवासी क्षेत्र में बीजेपी की बड़ी हार हुई. बीजेपी ने भूमि अधिकार के नियमों में बदलाव का प्रयास किया जो आदिवासियों की जमीन के अधिग्रहण को आसान बना देगा. इसे आदिवासी समुदाय ने पसंद नहीं किया."

नीलांजन सरकार ने कहा, "हालांकि, राष्ट्रीय स्तर पर होने वाले चुनाव में आदिवासी मतदाताओं के पास ज्यादा विकल्प नहीं थे, इसलिए उन्होंने नरेंद्र मोदी के लिए वोट किया. लेकिन राज्यों के चुनाव स्थानीय नेताओं द्वारा स्थानीय मुद्दों पर लड़े गए, ऐसे में मतदाताओं के पास ज्यादा विकल्प मौजूद थे."

सेंटर फॉर डेवलपमेंट स्टडीज के निदेशक संजय कुमार का मानना है कि आदिवासी सीटों के माध्यम से आदिवासी मतदाताओं को समझना विश्लेषकों को गुमराह कर सकता है.

संजय कुमार कहते हैं, "उत्तर-पूर्वी राज्यों को छोड़कर, आदिवासी वोटिंग पैटर्न को समझने के लिए आदिवासी सीटें बहुत अच्छा उदाहरण नहीं हैं. इन सीटों पर आदिवासी शायद ही कभी बहुमत में हों. यदि बीजेपी कोई आदिवासी सीट हार गई, तो इसका मतलब यह नहीं है कि आदिवासियों ने बीजेपी को वोट नहीं दिया. ऐसा भी हो सकता है कि आदिवासियों ने बीजेपी को वोट दिया हो, लेकिन गैर-बीजेपी मतदाताओं ने उन्हें पछाड़ दिया. इसके बजाय सर्वेक्षणों के माध्यम से आदिवासियों की नब्ज को जांचा जा सकता है."

संजय ने आगे समझाते हुए कहा, "उत्तर-पूर्वी राज्यों में जनजातीय वर्ग का वोटिंग पैटर्न बाकी भारत से अलग है. वहां पर आदिवासी पार्टी के ऊपर नेता को तवज्जो देते हैं, इसीलिए आप देख सकते हैं हालिया चुनाव में कई दलबदलू नेताओं को फायदा हुआ."

हालांकि, सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के फेलो राहुल वर्मा, आदिवासी वोटिंग पैटर्न के पीछे के दो संभावित व्याख्याएं पेश करते हैं.

पहली व्याख्या के मुताबिक वो कहते है, "हमें एक राजनीतिक अर्थव्यवस्था की व्याख्या पर विचार करना चाहिए. आम तौर पर आदिवासी बहुल क्षेत्र ग्रामीण और गरीब होते हैं, और खराब अर्थव्यवस्था सत्ताधारी दलों के लिए मुसीबत खड़ी कर सकती है. आम मतदाता आर्थिक मंदी से प्रभावित हो रहे हैं और इसलिए वे राज्य स्तर पर सत्ताधारी पार्टी को अस्वीकार करने का विकल्प चुनते हैं."

वहीं दूसरी व्याख्या के आधार पर उनका कहना है, "नेतृत्व और लामबंदी के कारण यह उतार चढ़ाव होने की संभावना है. कुछ समय से बीजेपी, विधानसभा चुनावों में हार रही है और विपक्ष जिसने लोकसभा चुनावों के दौरान खराब प्रदर्शन किया था, वे बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं. इस तरह राष्ट्रीय चुनावों के दौरान बीजेपी और नरेंद्र मोदी को वोट देने वाले आदिवासियों का एक बड़ा वर्ग विधानसभा चुनावों के दौरान कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के लिए मतदान कर रहा है."

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