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आज है नवरात्र का नौवा दिन, 'मां सिद्धिदात्री' को ऐसे करें प्रसन्न

 Special News Coverage |  21 Oct 2015 6:14 AM GMT

maa sidhidatri


जगतजननी मां जगदम्बा का नवां स्वरुप मां सिद्धिदात्री का है। मां भगवती का नौवें स्वरूप सिद्धिदात्री देवी के नाम से जाना जाता है।भगवान “शंकर द्वारा प्राप्त सभी सिद्धियां इनमें निहित है। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार अणिमा, महिमा, गरिमा, लहिमा, प्राप्ति, प्राकाम्या, इषक, वषित्र आठ मूख्य सिद्धियां हैं।देवी पुराण के अनुसार भगवान “शंकर का अर्द्धनारिश्वर स्वरूप देवी सिद्धिदात्रि का ही है।

देवी सिद्धिदात्री का स्वरुप का दिव्य मांगलिक व अत्यन्त मनोहारी है।इनकी चार भुजाएं हैं,जिनमें क्रमश: चक्र,शंख, गदा और कमल पुष्प सुशोभित हैं।अचूक संग्राम के उपरान्त देवी ने दुर्गम नामक दैत्य का वध किया था।इसी कारण ये मां दुर्गा के नाम से भी विख्यात हैं।मंत्र-तंत्र यंत्र की अधिष्ठात्री देवी सिद्धिदात्री की उपासना से साधक को समस्त सिद्धियां प्राप्त हो जाती हैं।माता अपने भक्तों के संपूर्ण मनोरथ को पूर्ण करती हैं।मां भगवती के परम पद को पाने के उपरान्त अन्य किसी भी वस्तु को पाने की लालसा नहीं रह जाती है।


मां दुर्गा की नौवीं शक्ति सिद्धिदात्री हैं।नवरात्र-पूजन के नौवें दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा का विधान है।नवमी के दिन सभी सिद्धियों की प्राप्ति होती है। दुर्गा मईया जगत के कल्याण हेतु नौ रूपों में प्रकट हुईं और इन रूपों में अंतिम रूप है देवी सिद्धिदात्री का।मां सिद्धिदात्री कमल आसन पर विराजमान रहती हैं।मां की सवारी सिंह हैं।देवी ने सिद्धिदात्री का यह रूप भक्तों पर अनुकम्पा बरसाने के लिए धारण किया है।देवताग,ऋषि-मुनि, असुर,नाग,मनुष्यगण सभी मां के भक्त हैं।देवी जी की भक्ति जो भी हृदय से करता है।मां उसी पर अपना स्नेह लूटाती हैं।

मां सिद्धिदात्री का मंत्र :
या देवी सर्वभू‍तेषु माँ सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।


नवदुर्गाओं में सबसे श्रेष्ठ और सिद्धि और मोक्ष देने वाली दुर्गा को सिद्धिदात्री कहा जाता है।यह देवी भगवान विष्णु की प्रियतमा लक्ष्मी के समान कमल के आसन पर विराजमान हैं और इनके हाथों में कमल , शंख , गदा और सुदर्शन चक्र हैं। देव,यक्ष,किन्नर,दानव ऋषि-मुनि,साधक,विप्र और संसारीजन सिद्धिदात्री की पूजा नवरात्र के नौवें दिन करके जीवन में यश,बल और धन की प्राप्ति करते हैं।

सिद्धिदात्री देवी मां सरस्वती का भी स्वरूप हैं जो श्वेत वस्त्रालंकार से युक्त महाज्ञान और मधुर स्वर से अपने भक्तों को सम्मोहित करती हैं। नौवें दिन सभी नवदुर्गाओं के सांसारिक स्वरूप की गंगा, नर्मदा कावेरी या समुद्र जल में विसर्जित करने की परंपरा भी है। नवदुर्गा के स्वरूप में साक्षात पार्वती और भगवती विघ्नविनाशक गणपति को भी सम्मानित किया जाता है। देवी मां के लिए बनाए नैवेद्य की थाली में भोग का सामान रखकर मां से प्रार्थना करनी चाहिए-

सिद्धगंधर्वयक्षाद्यैरसुरैररमरैरपि ।
सेव्यमाना सदा भूयात सिद्धिदा सिद्धिदायिनी ॥


मां सिद्धीदात्री का ध्यान मन्त्र :
वन्दे वांछित मनोरथार्थ चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
कमलस्थितां चतुर्भुजा सिद्धीदात्री यशस्वनीम्॥
स्वर्णावर्णा निर्वाणचक्रस्थितां नवम् दुर्गा त्रिनेत्राम्।
शख, चक्र, गदा, पदम, धरां सिद्धीदात्री भजेम्॥
पटाम्बर, परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥
प्रफुल्ल वदना पल्लवाधरां कातं कपोला पीनपयोधराम्।
कमनीयां लावण्यां श्रीणकटि निम्ननाभि नितम्बनीम्॥


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